विस्तृत उत्तर
इस व्रत की महिमा का विशद वर्णन 'भविष्य पुराण' में मिलता है। कथा के अनुसार, मगध देश में इन्दुमती नाम की एक अति-सुंदर गणिका (वेश्या) थी। उसने जीवन भर कोई धर्म-कर्म नहीं किया था। बुढ़ापे में मृत्यु और पारलौकिक गति की चिंता से व्याकुल होकर वह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम गई। महर्षि के उपदेश से उसने विधिपूर्वक 'अचला सप्तमी' (रथ सप्तमी) का व्रत, अर्क-पत्र स्नान और उपवास किया। इस एक व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद उसे मोक्ष और 'सूर्य-लोक' की प्राप्ति हुई।





