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काले तिल की उत्पत्ति कैसे हुई?

काले तिल की उत्पत्ति भगवान वराह के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से हुई।

संक्षिप्त उत्तर

काले तिल की उत्पत्ति भगवान वराह के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से हुई। जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, और उनसे काले तिल उत्पन्न हुए। इसीलिए श्राद्ध में काले तिल अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माने जाते हैं।

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विस्तृत उत्तर

काले तिल की उत्पत्ति भगवान वराह के पसीने की बूंदों से हुई थी। शास्त्रीय आधार के अनुसार तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई।

इस उत्पत्ति का सम्पूर्ण विवरण देखें। तदनंतर शब्द का अर्थ है उसके पश्चात्। यह घटना तब हुई, जब भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध किया, पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, मृदा अंश से तीन पिण्ड बनाए, और उन्हें कुशा पर स्थापित कर पिता, पितामह और प्रपितामह के प्रतीक घोषित किया। उसके बाद यह विशेष घटना हुई।

भगवान वराह की लीला से दो दिव्य उत्पादन हुए। पहला है काले तिल। तदनंतर भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से पृथ्वी पर काले तिल की उत्पत्ति हुई। दूसरा है कुशा। उनके दिव्य रोमों से पवित्र कुशा घास का प्रादुर्भाव हुआ। दोनों ही श्राद्ध में अत्यंत पवित्र और अनिवार्य सामग्री हैं।

काले तिल की उत्पत्ति का स्रोत विशेष है। ये भगवान के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से उत्पन्न हुए। अर्थात् भगवान वराह जब रसातल से पृथ्वी को निकालने का परिश्रम कर रहे थे, तो उनके शरीर पर पसीना आया। वह पसीना जब पृथ्वी पर गिरा, तो उससे काले तिल उत्पन्न हुए। यह तिल का साक्षात् दिव्य उद्भव है।

इसी कारण से तिल श्राद्ध में अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। यही कारण है कि आज तक श्राद्ध कर्म में पिण्ड, काले तिल और कुशा को सबसे अनिवार्य और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति साक्षात् नारायण के शरीर से हुई है। काले तिल की पवित्रता का यह सबसे बड़ा प्रमाण है।

श्राद्ध में काले तिल का व्यापक प्रयोग है। तर्पण में कर्ता अंजलि में शुद्ध जल, कुशा और काले तिल लेकर तर्पण करता है। पिण्डदान में पके हुए चावल, गाय का दूध, घी, शहद, जौ और काले तिल को मिलाकर गोलाकार पिण्ड बनाए जाते हैं। दोनों जगह काले तिल अनिवार्य हैं।

पितरों को काले तिल अत्यंत प्रिय हैं। विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। तिल का यह विशेष प्रिय होना उसके दिव्य उद्भव से ही जुड़ा है, क्योंकि वह साक्षात् नारायण के शरीर से उत्पन्न हुआ है।

निर्धन व्यक्तियों के लिए भी तिल का विशेष महत्व है। विष्णु पुराण कहता है कि यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे। यह सिद्ध करता है कि तिल इतने पवित्र हैं कि एक मुट्ठी तिल से भी श्राद्ध की पूर्ति हो सकती है।

काले तिल का दार्शनिक महत्व भी विशेष है। ये भगवान के पसीने से उत्पन्न हुए, अर्थात् भगवान के परिश्रम का प्रतीक हैं। जब भगवान ने पृथ्वी को बचाने के लिए परिश्रम किया, तब तिल का जन्म हुआ। इसलिए तिल कृतज्ञता और परिश्रम का प्रतीक भी हैं।

श्राद्ध में काले तिल का प्रयोग सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में हर सामग्री का गहरा आध्यात्मिक आधार है। साधारण तिल नहीं, बल्कि काले तिल विशेष हैं। काले तिल नारायण के शरीर से उत्पन्न हैं, इसलिए श्राद्ध में अनिवार्य हैं।

पहले पिण्ड भी मृदा से बने, और कुशा भी भगवान वराह के दिव्य रोमों से उत्पन्न हुई। तीनों, अर्थात् पिण्ड, काले तिल और कुशा, साक्षात् नारायण के शरीर से जुड़े हैं। इसलिए श्राद्ध एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है, क्योंकि उसकी सब सामग्री दिव्य है।

यह कथा सिद्ध करती है कि पिण्डदान केवल कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि साक्षात् नारायण की लीला का साकार रूप है। हर बार जब कोई श्राद्ध में काले तिल का प्रयोग करता है, तो वह भगवान वराह के पसीने की उन बूंदों को याद करता है, जिनसे काले तिल का जन्म हुआ। शास्त्रीय आधार के रूप में महाभारत का शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताएँ इस कथा के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः काले तिल की उत्पत्ति भगवान वराह के शरीर से उत्पन्न पसीने की बूंदों से हुई। जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, और उनसे काले तिल उत्पन्न हुए। यही कारण है कि श्राद्ध में काले तिल अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माने जाते हैं।

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