शास्त्रप्रमाणित द्वादशी श्राद्ध: स्वरूप, अधिकार, विधि एवं माहात्म्य
1. प्रस्तावना तथा श्राद्ध कर्म की शास्त्रीय मीमांसा
सनातन धर्मशास्त्रों, गृह्यसूत्रों, एवं अष्टादश पुराणों के विशाल वाङ्मय में 'श्राद्ध' कर्म को मनुष्य के सर्वाधिक अनिवार्य कर्तव्यों—नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों—में सर्वोच्च और पवित्रतम स्थान प्राप्त है। महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि पराशर, तथा गरुड़, विष्णु, एवं वायु आदि प्रामाणिक पुराणों के गहन अनुशीलन से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि श्राद्ध केवल कोई सामान्य कर्मकाण्ड अथवा रूढ़िवादी प्रथा नहीं है, अपितु यह पितृ-ऋण से उऋण होने तथा परलोकगत आत्माओं को उनके पारलौकिक मार्ग पर ऊर्ध्वगति प्रदान करने का एक अत्यंत सूक्ष्म, पारमार्थिक और वैज्ञानिक शास्त्रीय विधान है।
ब्रह्म पुराण तथा श्राद्ध तत्त्व में श्राद्ध की परिभाषा को अत्यंत स्पष्ट करते हुए कहा गया है, "श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्"—अर्थात् जो कुछ भी पितरों के उद्देश्य से, शास्त्र-निर्दिष्ट देश (स्थान), काल (समय), और पात्र (सुपात्र ब्राह्मण) के अनुसार पूर्ण श्रद्धा एवं वैदिक मन्त्रों के साथ दिया जाता है, वही श्राद्ध कहलाता है।
हिन्दू धर्म के कर्मकाण्ड विधान में यह मान्यता है कि प्रत्येक शुभ कार्य के आरम्भ में माता-पिता और पूर्वजों को प्रणाम करना हमारा शाश्वत कर्तव्य है, क्योंकि हमारी वंश परम्परा और वर्तमान जीवन उन्हीं की देन है। सृष्टि के कालचक्र में ऋषियों ने वर्ष के एक विशिष्ट पक्ष को 'पितृ पक्ष' या 'महालय' की संज्ञा दी है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक के 15 दिनों को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है। इन 15 दिनों में ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का प्रवाह कुछ इस प्रकार होता है कि परलोक (पितृलोक) में स्थित सूक्ष्म आत्माएँ अपने वंशजों के निकट आती हैं और उनसे जल (तर्पण) तथा अन्न (पिण्ड) की अपेक्षा करती हैं।
इस पवित्र काल-खण्ड की विभिन्न तिथियों में किए जाने वाले श्राद्धों में "द्वादशी श्राद्ध" का अपना एक अत्यंत विशिष्ट, गूढ़, और पारमार्थिक महत्त्व है। इस तिथि का शास्त्र-सम्मत विधान केवल सामान्य मृत आत्माओं के लिए ही नहीं, अपितु विशेष रूप से संन्यासियों, यतियों और वैरागियों के निमित्त निर्धारित किया गया है। प्रस्तुत शोध-प्रबंध में हम गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति तथा श्राद्ध तत्त्व (रघुनन्दन आदि निबन्धकारों) के प्रमाणों के आधार पर द्वादशी श्राद्ध की शास्त्रीय मीमांसा, उसके उद्देश्य, अधिकारी, विधि एवं उससे प्राप्त होने वाले अनन्त फलों का अत्यंत गहन एवं विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।
2. "द्वादशी श्राद्ध" का शास्त्रीय आधार एवं अधिष्ठाता देव
काल-विज्ञान और हिन्दू ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार प्रत्येक तिथि का अपना एक अधिष्ठाता देवता होता है, जो उस विशेष दिन की ऊर्जा और उसके पारलौकिक प्रभावों का नियन्त्रण करता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि (चन्द्र मास का 12वाँ दिन) के साक्षात् अधिष्ठाता स्वयं भगवान श्रीहरि (विष्णु) हैं। चूँकि भगवान विष्णु ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के पालनकर्ता और मोक्ष के परम प्रदाता हैं, अतः द्वादशी तिथि का सीधा और अटूट सम्बन्ध मोक्ष, वैराग्य, और पारलौकिक शान्ति से स्थापित होता है। जब कोई श्राद्ध कर्म इस शुभ तिथि पर सम्पन्न किया जाता है, तो उसमें भगवान विष्णु की प्रत्यक्ष कृपा और ऊर्जा समाहित हो जाती है।
श्राद्ध-मीमांसा के अनुसार, यद्यपि पितृलोक के अधिपति धर्मराज यम हैं और आत्माओं का न्याय उनके कर्मों के आधार पर होता है, किन्तु परलोक में सूक्ष्म शरीरों की तृप्ति और उनकी ऊर्ध्वगति पूर्णतः भगवान विष्णु की कृपा पर ही अवलम्बित है। गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख मिलता है कि मृत्यु के उपरांत जीवात्मा का मार्ग, उसका क्लेश निवारण और वैतरणी जैसी भयंकर नदी को पार करने की क्षमता भगवान विष्णु के निमित्त किए गए कर्मों और दानों (यथा गोदान) पर निर्भर करती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया है कि श्राद्ध के साक्षात् देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं ("वसवो रुद्रा आदित्याः पितरो ज्ञेयाः")। श्राद्धकर्ता का पिता वसु रूप माना गया है, पितामह रुद्र रूप माना गया है, और प्रपितामह आदित्य रूप माने गए हैं। ये देवगण ही श्राद्ध के समय उन पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये देवगण श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और शास्त्रोक्त विधि से सम्पन्न किए गए कर्म से तृप्त होकर अपने वंशधरों को सपरिवार सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। जब द्वादशी (विष्णु की स्वयंसिद्ध तिथि) पर इन देवस्वरूप पितरों का आह्वान किया जाता है, तो श्राद्ध का फल अनंत गुना हो जाता है तथा पितरों को सीधे नारायण-सायुज्य की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्राप्त होता है। भागवत पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति भगवान विष्णु के चरणों की शरण ले लेता है, उसके पितरों को स्वतः ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है ("सर्वात्मनाय शरणं शरण्यम्")।
3. द्वादशी तिथि के अधिकारी: किन पितरों का श्राद्ध विहित है?
श्राद्ध कर्म में यह अत्यंत सूक्ष्मता से विचार किया गया है कि किस तिथि पर किन पितरों का श्राद्ध होना चाहिए। सभी आत्माओं का श्राद्ध किसी भी दिन कर देने से शास्त्रोक्त फल की प्राप्ति नहीं होती। 'श्राद्ध तत्त्व', गृह्यसूत्रों एवं 'निर्णय सिन्धु' जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर द्वादशी श्राद्ध के मुख्य रूप से 3 प्रकार के अधिकारी होते हैं, जिनका विस्तृत वर्णन शास्त्रों में प्राप्त होता है:
3.1. द्वादशी तिथि को दिवंगत आत्माएँ (तिथि-आधारित पार्वण)
श्राद्ध का सामान्य और सर्वमान्य नियम यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि पर होती है, महालय (पितृ पक्ष) में उसका श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है। अतः जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी मास के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को हुई हो, उसका 'पार्वण श्राद्ध' आश्विन कृष्ण द्वादशी को ही सम्पन्न किया जाता है। यह विधान मुख्य रूप से उन सामान्य गृहस्थों के लिए है, जिन्होंने जीवन भर गार्हपत्य अग्नि की उपासना की है और जो अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए द्वादशी को मृत्यु को प्राप्त हुए हैं।
3.2. यति, संन्यासी एवं वैरागी (यति महालय / संन्यासी श्राद्ध)
द्वादशी श्राद्ध का सबसे महत्वपूर्ण, रहस्यमयी और अनिवार्य पहलू "यति श्राद्ध" है। शास्त्रों के अनुसार, जिन व्यक्तियों ने मृत्यु से पूर्व गृहस्थ जीवन का पूर्णतः त्याग कर 'संन्यास आश्रम' ग्रहण कर लिया हो अथवा जो दण्ड धारण कर यति बन गए हों, उनका श्राद्ध अनिवार्य रूप से केवल और केवल द्वादशी तिथि को ही किया जाता है। भले ही उस संन्यासी की मृत्यु किसी भी अन्य तिथि (यथा द्वितीया, पंचमी या नवमी) को क्यों न हुई हो, पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध द्वादशी को ही विहित है। इसी कारण से शास्त्रों और परम्पराओं में इस दिन को 'यति महालय', 'बारस श्राद्ध', 'यतीनां महालयम्', अथवा 'संन्यासी श्राद्ध' भी कहा गया है।
संन्यासियों का श्राद्ध उनकी वास्तविक मृत्यु तिथि पर न कर द्वादशी को ही करने का शास्त्रीय कारण अत्यंत गम्भीर और दार्शनिक है। जब कोई व्यक्ति संन्यास ग्रहण करता है, तो वह 'प्रैषोच्चारण' के साथ अपने तीनों सांसारिक ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण) से मुक्त हो जाता है तथा वह अपनी लौकिक गार्हपत्य अग्नि को आत्मसात् कर लेता है। संन्यास लेते समय वह व्यक्ति स्वयं अपना 'जीवच्छ्राद्ध' (जीवित अवस्था में ही अपना श्राद्ध) कर चुका होता है। अतः मृत्यु के उपरांत उसकी 'प्रेत' संज्ञा नहीं होती। गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड के अनुसार, सामान्य आत्मा मृत्यु के बाद 10 दिनों तक प्रेत रूप में रहती है और वंशजों द्वारा दिए गए 10 पिण्डों से उसका सूक्ष्म शरीर (पिण्डज शरीर) निर्मित होता है, जिसमें भूख-प्यास की अनुभूति होती है। किन्तु संन्यासी चूँकि लौकिक कर्मों से परे हो चुके हैं, वे मृत्यु के उपरांत सीधे नारायण-स्वरूप हो जाते हैं। उनकी आत्मा प्रेतलोक में नहीं भटकती। चूँकि भगवान विष्णु की तिथि द्वादशी है, अतः साक्षात् नारायण-स्वरूप हो चुके यतियों का महालय श्राद्ध विष्णु की ही तिथि पर सम्पन्न करने का विधान है।
3.3. गृह-त्यागी, अज्ञात मृत्यु एवं गुमनाम साधु
ऐसे पूर्वज जो वैराग्य धारण कर जीवन के अंतिम काल में घर से निकल गए, किसी तीर्थ में जा बसे, और जिनकी मृत्यु का समय, स्थान अथवा तिथि परिवार के लिए सर्वथा अज्ञात हो, उनका श्राद्ध भी द्वादशी तिथि को ही करने का शास्त्र-निर्देश है। ऐसे गुमनाम साधु-संन्यासी और घर से चले गए पितृजन, जिनका कोई अता-पता न हो, उनका तर्पण और पिण्डदान इसी दिन किया जाता है। इसे परम्परा में 'नदका श्राद्ध' भी कहा जाता है। यह महान शास्त्रीय विधान यह सुनिश्चित करता है कि वंश का कोई भी पूर्वज, जिसने ईश्वर की खोज में वैराग्य लिया हो, वह तर्पण और श्राद्ध-भाग से कभी वंचित न रहे।
| तिथि-आधारित पार्वण श्राद्ध |
वे सभी पूर्वज जिनकी मृत्यु किसी भी मास के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की द्वादशी को हुई हो। |
"यस्य यस्यां तिथौ मृत्युः..." के आधार पर मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करने का सर्वमान्य विधान। |
| यति श्राद्ध (संन्यासी महालय) |
यति, संन्यासी, वैरागी (जिन्होंने दण्ड धारण किया हो और गृहस्थ का त्याग किया हो)। |
संन्यासी मृत्यु के उपरांत प्रेत नहीं होते, वे साक्षात् 'नारायण' स्वरूप हो जाते हैं, अतः विष्णु तिथि (द्वादशी) विहित है। |
| अज्ञात मृत्यु / नदका श्राद्ध |
जो पूर्वज वैराग्यवश घर छोड़ गए और अज्ञात अवस्था में दिवंगत हुए, जिनकी तिथि अज्ञात है। |
स्मृति ग्रन्थों के अनुसार वैरागियों और संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को सिद्ध है। |
4. यति श्राद्ध का विशिष्ट विधान एवं सामान्य पार्वण से भेद
गृह्यसूत्रों और रघुनन्दन आदि के 'श्राद्ध तत्त्व' के आलोक में संन्यासियों (यतियों) के श्राद्ध की विधि सामान्य गृहस्थों के श्राद्ध से कतिपय मायनों में भिन्न होती है। सामान्य श्राद्ध में 3 पीढ़ियों (पिता, पितामह, प्रपितामह) को लक्ष्य कर 'पार्वण श्राद्ध' किया जाता है। किन्तु यति श्राद्ध में निम्नलिखित शास्त्रीय भेद दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें समझना एक धर्मशास्त्र विश्लेषक के लिए अनिवार्य है:
- प्रथम भेद यह है कि यतियों के लिए मरणोत्तर 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' (जो सामान्यतः मृत्यु के 11वें दिन प्रेतत्व निवृत्ति के लिए होता है) और 'सपिण्डीकरण' नहीं किया जाता, क्योंकि उन पर प्रेतत्व का कोई आवरण नहीं होता। उनका सीधे पार्वण रूप में महालय श्राद्ध होता है।
- द्वितीय भेद यह है कि 'नारायण-बुद्धि' की प्रधानता होती है। सामान्य श्राद्ध में पितरों को वसु, रुद्र और आदित्य के रूप में पूजा जाता है, किन्तु संन्यासी के श्राद्ध में ब्राह्मण भोज कराते समय अथवा तर्पण करते समय, संन्यासी पितर को साक्षात् 'श्रीनारायण' के रूप में ध्यान किया जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार, जो साधक ज्ञानमार्ग (संन्यास) में स्थित हैं, वे परब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त होते हैं।
- तृतीय भेद मन्त्रों के प्रयोग में है। यतियों के पिण्डदान में परम्परागत प्रेत-मन्त्रों का उपयोग न होकर, नारायण-सूक्त एवं भगवान विष्णु से सम्बद्ध वैदिक ऋचाओं का अधिक प्रयोग शास्त्रों द्वारा अनुमोदित है, क्योंकि यह आत्मा की ऊर्ध्वगति का उत्सव है, न कि उसके वियोग का शोक।
5. अन्य तिथियों की तुलना में द्वादशी का विशिष्ट महत्व
पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथि का अपना एक विशेष प्रयोजन है, किन्तु द्वादशी का स्थान उनमें अत्यंत विलक्षण है। यदि हम अन्य तिथियों से इसकी तुलना करें तो इसका महात्म्य और अधिक स्पष्ट हो जाता है। उदाहरण के लिए, नवमी तिथि (मातृ नवमी) माता और सुहागिन स्त्रियों के श्राद्ध के लिए आरक्षित है। एकादशी तिथि मोक्षदा है किन्तु उसका प्रभाव भिन्न है। त्रयोदशी तिथि उन पूर्वजों के लिए विहित है जिनकी मृत्यु शैशवावस्था (बच्चों) में हुई हो, अथवा जो अस्त्र-शस्त्र से मारे गए हों। इसी प्रकार, चतुर्दशी (घटा चतुर्दशी) उन व्यक्तियों के लिए निर्धारित है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो—यथा दुर्घटना, विष, आत्महत्या, या किसी हिंसक प्राणी के द्वारा मारे गए हों। और अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) उन सभी पितरों के लिए है जिनकी तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो।
इन सबके विपरीत, द्वादशी तिथि अकाल मृत्यु या शोक का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि यह ज्ञान, वैराग्य, संन्यास और परम मोक्ष का प्रतिनिधित्व करती है। चतुर्दशी का श्राद्ध जहाँ अकाल मृत्यु की पीड़ा को शांत करने বয়স है, वहीं द्वादशी का श्राद्ध सांसारिक जीवन को स्वेच्छा से त्यागने वाले सिद्ध यतियों के सम्मान में है। यह तिथि शुद्ध सात्त्विकता से परिपूर्ण है और यह सिद्ध करती है कि सनातन धर्म में वैराग्य को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।
6. श्राद्ध का काल-निर्णय एवं शास्त्रोक्त विशिष्ट मुहूर्त
श्राद्ध कर्म में देश (स्थान) और काल (समय) की शुद्धता सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानी गई है। महर्षि याज्ञवल्क्य और महर्षि पराशर दोनों ने श्राद्ध के लिए दिन के विशिष्ट प्रहरों को ही उपयुक्त माना है। काल-निर्णय के बिना किया गया श्राद्ध निष्फल हो जाता है।
6.1. अपराह्न व्यापिनी तिथि का नियम
महालय (पितृ पक्ष) के श्राद्ध सामान्यतः 'अपराह्न व्यापिनी' तिथि में किए जाते हैं। अर्थात् दिन के उस भाग में जब सूर्य का ताप ढलने लगता है। यदि द्वादशी तिथि 2 दिन अपराह्न का स्पर्श कर रही हो, तो शास्त्रोक्त नियमों और पंचांग (यथा युग्म-वाक्य) से उसका निर्णय किया जाता है।
6.2. कुतुप, रौहिण एवं अपराह्न मुहूर्त
द्वादशी श्राद्ध के लिए शास्त्रों में 3 अति-विशिष्ट मुहूर्तों का निर्देश है, जिनका पालन करना श्राद्धकर्ता के लिए अनिवार्य है: 1. कुतुप मुहूर्त: हिन्दू काल-गणना में दिन के 15 मुहूर्तों में से 8वें मुहूर्त को 'कुतुप' कहते हैं (सामान्यतः यह प्रातः 11:50 से दोपहर 12:40 तक रहता है)। संस्कृत व्युत्पत्ति के अनुसार 'कु' का अर्थ है पाप, और 'तुप' का अर्थ है नष्ट करना। अर्थात् जो मुहूर्त पापों को नष्ट कर दे और पितरों को अक्षय फल प्रदान करे, वह कुतुप है। इस समय सूर्य की रश्मियाँ सीधी होती हैं, और वस्तुओं की छाया न्यूनतम होती है, जिसे पितरों के आगमन के लिए सर्वोत्कृष्ट माना गया है। 2. रौहिण मुहूर्त: कुतुप के ठीक बाद का 9वाँ मुहूर्त रौहिण कहलाता है (लगभग 12:40 से 01:30 बजे अपराह्न तक)। यह काल पिण्डदान के लिए अत्यंत प्रशस्त है। 3. अपराह्न काल: रौहिण के पश्चात अपराह्न काल आरम्भ होता है (01:30 अपराह्न से 03:55 अपराह्न तक), जो पिण्डदान और तर्पण के सम्पूर्ण अनुष्ठान के समापन के लिए शास्त्र-निर्धारित है।
6.3. राहुकाल का कठोर निषेध
श्राद्ध कर्म में पूर्ण सात्त्विकता और आसुरी प्रवृत्तियों से बचाव अत्यंत आवश्यक है। अतः शास्त्रों में स्पष्ट और कठोर चेतावनी है कि राहुकाल में भूलकर भी तर्पण या पिण्डदान नहीं करना चाहिए। यदि द्वादशी के दिन राहुकाल पूर्वाह्न में हो (यथा प्रातः 10:30 से 12:00 बजे के मध्य), तो उस अवधि को पूर्णतः त्याग देना चाहिए। राहुकाल में किया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुँचता, अतः अपराह्न 12 बजे के पश्चात् (कुतुप वेला आरम्भ होने पर) ही श्राद्ध कर्म आरम्भ करना शास्त्र-सम्मत है।
| कुतुप मुहूर्त |
11:50 पूर्वाह्न - 12:40 अपराह्न |
दिन का अष्टम भाग, पाप-नाशक, सूर्य की पूर्ण ऊष्मा, पितरों के आह्वान हेतु सर्वोत्कृष्ट। |
| रौहिण मुहूर्त |
12:40 अपराह्न - 01:30 अपराह्न |
कुतुप के पश्चात् श्राद्ध क्रिया के मध्य भाग हेतु उत्तम। |
| अपराह्न काल |
01:30 अपराह्न - 03:55 अपराह्न |
पिण्डदान, तर्पण एवं पञ्चबलि की पूर्णाहुति का शास्त्र-सम्मत काल। |
7. पार्वण श्राद्ध की शास्त्र-सम्मत विधि
द्वादशी श्राद्ध अनिवार्य रूप से एक 'पार्वण श्राद्ध' है। गृह्यसूत्रों (यथा आश्वलायन एवं पारस्कर गृह्यसूत्र) और रघुनन्दन के 'श्राद्ध तत्त्व' के अनुसार इसकी विधि अत्यंत गूढ़, प्रतीकात्मक और वैज्ञानिक है। इसमें निम्नलिखित चरणों का कठोरता से पालन अनिवार्य है:
7.1. शारीरिक शुद्धि, सङ्कल्प एवं वेशभूषा
श्राद्धकर्ता को प्रातःकाल पवित्र नदी या शुद्ध जल से स्नान कर स्वयं को पवित्र करना चाहिए। तदनन्तर शुद्ध (अधिमानतः श्वेत) वस्त्र—धोती और उत्तरीय—धारण करने चाहिए। श्राद्ध कर्म में जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करना अनिवार्य है। दाहिने हाथ की अनामिका अँगुली में 'कुशा' (पवित्र दूर्वा घास) की अंगूठी (जिसे पवित्री कहा जाता है) पहनकर ही कर्म आरम्भ किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार कुशा के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में शिव का वास माना गया है। कुशा श्राद्ध कर्म को राक्षसों और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है।
7.2. विश्वेदेव आह्वान
पार्वण श्राद्ध में पितरों से पूर्व 'विश्वेदेवों' का आह्वान किया जाता है। पितृपक्ष (महालय) के श्राद्ध में 'पुरूरवा' और 'आर्द्रव' नामक विश्वेदेवों का पूजन होता है, जो पितरों के रक्षक माने गए हैं। देव-कार्य सदैव पूर्वाभिमुख (पूर्व दिशा की ओर मुख करके) और यज्ञोपवीत को 'सव्य' (बाएं कंधे पर रखकर दाहिने हाथ के नीचे) रखकर किया जाता है।
7.3. पितृ आह्वान एवं अर्घ्यदान
इसके पश्चात् श्राद्धकर्ता दक्षिणाभिमुख (दक्षिण दिशा की ओर मुख) होता है। दक्षिण दिशा यमराज और पितरों की दिशा है। इस समय यज्ञोपवीत को 'अपसव्य' (दाहिने कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे) कर लिया जाता है। पृथ्वी पर 3 कुशाओं को बिछाकर उन पर काला तिल और जल छिड़कते हुए अपने पितरों (पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह आदि) का आह्वान किया जाता है। काले तिल में आसुरी शक्तियों को दूर भगाने की क्षमता होती है और यह भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न होने के कारण पितरों को अत्यंत प्रिय है। तर्पण सामग्री में कुशा, चन्दन, अक्षत, जौ, तिल, दूब, तुलसी के पत्ते और सफेद फूल अवश्य होने चाहिए।
7.4. अग्नौकरण एवं पिण्डदान
पिण्डदान श्राद्ध का हृदय और मुख्य अंग है। पके हुए चावल, गोघृत (गाय का घी), गाय का दूध, शहद (मधु), और शर्करा (चीनी) को मिलाकर गोलाकार 'पिण्ड' का निर्माण किया जाता है। पिण्डदान का शास्त्रीय मर्म गरुड़ पुराण के प्रेतखण्ड में प्राप्त होता है। जब पिण्ड समर्पित किए जाते हैं, तो पितर अपने सूक्ष्म शरीर को पोषण प्राप्त करते हैं। जो अन्न के कण पृथ्वी पर गिरते हैं, उनसे पशु-पक्षी की योनि में पड़े हुए पितरों की तृप्ति होती है। पिण्डों को कुशा पर स्थापित करते समय ऋग्वेद के पितृ-सूक्त और यजुर्वेदीय मन्त्रों का पाठ किया जाता है, जैसे: "असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञाः ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु" (अर्थात्: जो हमारे पूर्वज सत्य को जानने वाले हैं और जो स्वर्गलोक में हैं, वे हमारे आह्वान पर हमारी रक्षा करें)।
7.5. पञ्चबलि विधान
श्राद्ध की पूर्णता पञ्चबलि के बिना कदापि नहीं होती। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवों के प्रति कृतज्ञता और उन्हें पितृ-स्वरूप मानकर भोजन का अंश दिया जाता है: 1. गो-बलि: गाय को (पूर्व दिशा में)। गाय में सभी देवताओं का वास है। 2. श्वान-बलि: कुत्ते को (भैरव के वाहन और यमराज के श्वान के रूप में)। 3. काक-बलि: कौवे को (यम के दूत के रूप में)। कौवे को दिया गया अन्न साक्षात् पितरों को प्राप्त होता है। 4. पिपीलिका-बलि: चींटियों और कीट-पतंगों को। 5. देव-बलि: देवताओं के निमित्त। यह कर्म पूर्णतः सात्त्विक अन्न से किया जाता है। लहसुन और प्याज का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।
7.6. ब्राह्मण भोजन एवं तर्पण
विष्णु पुराण (3.16.16) और वराह पुराण (14.32) के अनुसार, श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर, मधुर और सात्त्विक भोजन तैयार कर ब्राह्मणों को आमंत्रित करना चाहिए। ब्राह्मणों के भोजन करते समय यह उच्चकोटि की भावना रखनी चाहिए कि "इन ब्राह्मणों के शरीरों में स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज भोजन से तृप्त हो जाएँ"। द्वादशी श्राद्ध में कम से कम 12 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विशेष शास्त्र-विधान है। श्राद्ध के अंत में तर्पण किया जाता है, जिसमें काला तिल मिश्रित जल दोनों हाथों की अंजलि द्वारा अंगूठे के मूल भाग (पितृ तीर्थ) से पितरों को अर्पित किया जाता है।
8. द्वादशी श्राद्ध के पारलौकिक एवं ऐहिक फल
विभिन्न पुराणों और स्मृतियों में तिथिवार श्राद्ध करने के भिन्न-भिन्न फल बताए गए हैं। द्वादशी तिथि पर श्राद्ध करने का फल लौकिक (सांसारिक) और पारलौकिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत विस्तृत और ऐश्वर्यशाली है।
8.1. राष्ट्र लाभ एवं राजनैतिक विजय
वायु पुराण एवं गरुड़ पुराण के वचनों के सन्दर्भ में एक अत्यंत अद्भुत और स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जिस घर में द्वादशी का श्राद्ध होता है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र (देश या राज्य) की उन्नति में सहायक होता है। शास्त्र का वचन है कि "द्वादशी तिथि को श्राद्ध करने पर राष्ट्र की उन्नति होती है" और "जिस देश में द्वादशी का श्राद्ध होता है, उस देश को दुश्मन जीत नहीं सकता" ("द्वादश राष्ट्र लाभ तु...")। यह 'राष्ट्र लाभ' द्वादशी श्राद्ध का सबसे अद्वितीय फल है। ग्रंथों में यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति द्वादशी का श्राद्ध करता है, वह राष्ट्र को घाटा नहीं देता, वह कर की चोरी या बिजली की चोरी जैसे कर्म नहीं करता, जिससे राजकोष में वृद्धि होती है और राष्ट्र का उत्थान होता है।
8.2. कृषि एवं अन्न की रक्षा
कृषकों के लिए द्वादशी श्राद्ध विशेष वरदान स्वरूप है। गरुड़ पुराण की मीमांसा के आधार पर, द्वादशी को श्राद्ध करने से "किसानों की फसल नष्ट नहीं होती" और अन्न की मात्रा में विपुल वृद्धि होती है। यह अन्न-सुरक्षा का प्रत्यक्ष शास्त्रीय फल है। चाहे व्यक्ति किसान हो या शहर में रहने वाला कोई उद्योगपति, यदि उसके यहाँ द्वादशी का श्राद्ध होता है, तो पूरे राष्ट्र की फसल और अन्न सुरक्षित रहता है।
8.3. संतति, बुद्धि एवं दीर्घायु की प्राप्ति
श्राद्ध तत्त्व एवं याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, पितर संतुष्ट होकर श्राद्धकर्ता को अनेक वरदान देते हैं। विशेष रूप से द्वादशी के श्राद्ध से संतति (योग्य संतान), उत्तम बुद्धि, शारीरिक व मानसिक शक्ति, पुष्टि, ऐश्वर्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। ऋग्वेद के मन्त्रों द्वारा पितरों से यह प्रार्थना की जाती है कि वे अश्विनी कुमारों के समान सुंदर, स्वस्थ और देवों व मनुष्यों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले पुत्र (संतान) प्रदान करें।
8.4. पितृदोष का शमन एवं मोक्ष की प्राप्ति
चूँकि द्वादशी मोक्ष-प्रदाता भगवान विष्णु की तिथि है, अतः इस दिन श्राद्ध करने से पितरों को नीच योनियों (प्रेत योनि) से तत्काल मुक्ति मिल जाती है तथा वे ऊर्ध्व लोकों में गमन करते हैं। यदि वंश में कोई पितृदोष हो—जिसके कारण परिवार में लंबे समय से बीमारी, आर्थिक अस्थिरता (धन का संचय न होना), या अनसुलझे पारिवारिक विवाद उत्पन्न हो रहे हों—तो द्वादशी का तर्पण और पिण्डदान उन रूठे हुए पितरों को पूर्णतः शांत कर देता है।
9. विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों में द्वादशी श्राद्ध का विवेचन
विभिन्न धर्मशास्त्रों ने द्वादशी श्राद्ध और श्राद्ध-कर्म के अन्य पहलुओं को अपने-अपने दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है। एक विश्लेषक के रूप में इन सभी मतों का सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है।
9.1. विष्णु पुराण के आलोक में श्राद्ध तत्त्व
विष्णु पुराण का तृतीय अंश श्राद्ध कर्म की मीमांसा के लिए एक अत्यंत प्रामाणिक और उच्च-स्तरीय स्रोत है। विष्णु पुराण (तृतीय अंश, अध्याय 15 और 16) में महर्षि और्व और राजा सगर के मध्य श्राद्ध विषयक अति-गम्भीर संवाद प्राप्त होता है। महर्षि और्व राजा सगर को उपदेश देते हुए कहते हैं: "हे राजन्! जो साधक श्राद्ध करता है, उससे पितर, समस्त देवता, और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संतुष्ट हो जाता है। पितरों का आधार चन्द्रमा है और चन्द्रमा का आधार 'योग' है; अतः श्राद्ध में योगियों (संन्यासियों) को आमंत्रित करने का विशेष महत्त्व है"। यहाँ विष्णु पुराण भी द्वादशी (यति श्राद्ध की तिथि) पर संन्यासियों के सत्कार की पुष्टि कर रहा है। अध्याय 16 में विभिन्न अन्नों और हविष्यों (जैसे गोदुग्ध, घृत, मधु आदि) से पितरों की तृप्ति की अवधि का वर्णन है। विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्ध में यदि मधु (शहद) का प्रयोग किया जाए, तो वह पितरों को अनंत काल तक तृप्ति प्रदान करता है। इस ग्रन्थ में यह भी उद्घोष किया गया है कि गया तीर्थ में श्राद्ध करने से, तथा भाद्रपद/आश्विन की त्रयोदशी या मघा नक्षत्र में मधु युक्त पायस (खीर) देने से वंश में उत्तम संतति उत्पन्न होती है। यह सत्य है कि विष्णु पुराण त्रयोदशी का उल्लेख एक विशिष्ट नक्षत्र योग के लिए करता है, किन्तु द्वादशी के यति श्राद्ध के साथ यह तथ्य जुड़ता है कि भगवान विष्णु की तिथि पर अर्पित 'मधु' और 'घृत' से पितर सायुज्य को प्राप्त होते हैं।
9.2. गरुड़ पुराण का दृष्टिकोण
गरुड़ पुराण मुख्य रूप से मृत्युपरान्त यात्रा (प्रेत खण्ड) पर केंद्रित है। इसमें वैतरणी नदी और प्रेत योनि का डरावना वर्णन है। गरुड़ पुराण का यह दर्शन स्थापित करता है कि सामान्य मनुष्यों को अपने पाप कर्मों के कारण यमराज की यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। किन्तु द्वादशी श्राद्ध, विशेषकर जब वह संन्यासियों के लिए किया जाता है, तो यह दर्शाता है कि वैराग्य और विष्णु-भक्ति आत्मा को इन यातनाओं से पूरी तरह बचा लेती है। गरुड़ पुराण यह भी निर्देशित करता है कि अयोग्य ब्राह्मणों (रोगी, अंगहीन, या दुराचारी) को श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए।
9.3. याज्ञवल्क्य एवं पराशर स्मृतियों में दार्शनिक गहराई
याज्ञवल्क्य स्मृति के 'आचाराध्याय' में श्राद्ध के देवताओं (वसु, रुद्र, आदित्य) का विशद वर्णन है। याज्ञवल्क्य के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए श्राद्ध आवश्यक है। दूसरी ओर, महर्षि पराशर द्वारा प्रणीत 'पराशर स्मृति' (जो विशेष रूप से कलियुग के लिए मान्य है—"कलौ पराशरः स्मृतः") सदाचार, पवित्रता और दान पर सर्वाधिक बल देती है। पराशर स्मृति में स्पष्ट है कि जो लोग गोदान करते हैं, नदियों में स्नान कर पितरों का तर्पण करते हैं, और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उनके लिए यह मृत्युलोक ही बैकुंठ के समान हो जाता है। संन्यासियों के विषय में पराशर स्मृति का दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट है कि उन्होंने लौकिक अग्नियों का त्याग कर दिया है, अतः उनका श्राद्ध केवल और केवल नारायण-स्वरूप मानकर (द्वादशी को) ही सम्पन्न होना चाहिए।
10. द्वादशी श्राद्ध से सम्बद्ध पौराणिक कथा: भीम गया एवं गदाधर प्रसंग
श्राद्ध के लिए सम्पूर्ण भूमण्डल में 'गया' (बिहार) को सर्वोच्च तीर्थ माना गया है। वायु पुराण (गया माहात्म्य) और गरुड़ पुराण में द्वादशी श्राद्ध और गया तीर्थ से जुड़ी एक अत्यंत पवित्र और प्रामाणिक कथा प्राप्त होती है।
10.1. गयासुर और भगवान गदाधर
गरुड़ पुराण और वायु पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में गयासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या की, जिसके तेज से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और देवता भी संतप्त हो गए। तब भगवान विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर को स्थिर किया और उसका वध किया। गयासुर की पवित्रता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि यह सम्पूर्ण क्षेत्र (गया) सर्वदा के लिए परम पवित्र तीर्थ बन जाएगा, और यहाँ श्राद्ध करने से पितरों को साक्षात् मोक्ष प्राप्त होगा। यहाँ भगवान विष्णु 'गदाधर' के रूप में विराजमान हैं।
10.2. भीमसेन द्वारा श्राद्ध एवं 'भीम गया' वेदी
द्वादशी श्राद्ध के प्रसंग में गया तीर्थ की एक विशिष्ट वेदी का उल्लेख शास्त्रों में प्राप्त होता है, जिसे "भीम गया" कहा जाता है। वायु पुराण एवं गया माहात्म्य के अनुसार, जब पाण्डव अपने पितरों (महाराज पाण्डु आदि) के निमित्त पिण्डदान करने आए, तो महाबली भीमसेन ने गया तीर्थ में एक विशेष स्थान पर पिण्डदान किया। यह स्थान वैतरणी नदी के उत्तर-पश्चिम मोड़ पर स्थित है, जहाँ आज भी 'भीमसेन मूर्ति' स्थापित है। शास्त्रों का निर्देश है कि द्वादशी के श्राद्ध के दिन, माँ मंगलागौरी मन्दिर के समीप स्थित 'भीम गया' वेदी पर, 'गो प्रचार' तथा 'गदालोल' तीर्थों में श्राद्ध करने का अनन्त गुना फल प्राप्त होता है। फल्गु नदी में स्नान कर, माँ मंगलागौरी की सीढ़ियों के बगल में स्थित भीम गया वेदी पर पिण्डदान करने से पितर तत्काल मुक्त हो जाते हैं।
वायु पुराण के अनुसार, 'गदालोल सरोवर' वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान विष्णु का 'गदा खण्ड' गिरा था। चूँकि द्वादशी भगवान गदाधर (विष्णु) की ही तिथि है, अतः द्वादशी के दिन भीम गया और गदालोल में किया गया पार्वण या यति श्राद्ध, कर्ता और पितर दोनों के अज्ञान और कर्म-बंधनों को नष्ट कर देता है।
11. द्वादशी श्राद्ध में वर्जित कर्म (शास्त्र-निषेध)
जहाँ शास्त्रों में विधि का विधान है, वहीं कुछ निषेधों का भी अत्यंत कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया गया है। इन निषेधों का उल्लंघन करने से श्राद्ध का फल नष्ट हो जाता है:
- 1. अयोग्य पात्र को दान का निषेध: विष्णु पुराण और गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्ध का अन्न और दान केवल वेदपाठी, श्रोत्रिय, और सदाचारी ब्राह्मणों को ही दिया जाना चाहिए। अयोग्य, रोगी, अंगहीन, या दुराचारी को भोजन कराने से पितर निराश होकर लौट जाते हैं और श्राद्धकर्ता को पाप लगता है।
- 2. अन्यायोपार्जित धन का निषेध: विष्णु पुराण में स्पष्ट किया गया है कि अन्याय, चोरी या बेईमानी से कमाए गए धन से किया गया श्राद्ध चाण्डाल आदि योनियों में पड़े पितरों को ही जाता है, उत्तम पितरों को नहीं। अतः श्राद्ध का द्रव्य पूर्णतः न्यायोपार्जित और शुद्ध होना चाहिए।
- 3. तामसिक वस्तुओं का निषेध: चूँकि द्वादशी साक्षात् भगवान विष्णु की तिथि है, अतः इस दिन सात्त्विकता का चरमोत्कर्ष होना चाहिए। लौकी, बैंगन, मसूर की दाल, लहसुन, और प्याज का प्रयोग श्राद्ध के अन्न में पूर्णतः वर्जित है।
12. उपसंहार
धर्मशास्त्रों, अष्टादश पुराणों (विशेषतः गरुड़ एवं विष्णु पुराण), तथा याज्ञवल्क्य एवं पराशर स्मृतियों के गहन, विस्तृत और सर्वांगीण विश्लेषण से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि "द्वादशी श्राद्ध" पितृ-उपासना और विष्णु-भक्ति का एक अद्वितीय, दार्शनिक और पारमार्थिक समन्वय है।
यह तिथि मात्र उन आत्माओं के लिए निर्धारित नहीं है जिन्होंने संयोगवश द्वादशी को अपना भौतिक शरीर त्यागा, अपितु यह उन समस्त महान आत्माओं (यतियों, संन्यासियों, और वैरागियों) के लिए मोक्ष का एक सुरक्षित द्वार है, जिन्होंने संसार के मोह-बन्धनों को मृत्यु से पूर्व ही ज्ञान रूपी खड्ग से काट दिया था। संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को कर सनातन धर्म यह परम सत्य स्थापित करता है कि वैराग्य की अन्तिम परिणति प्रेतत्व में नहीं, अपितु साक्षात् नारायण में विलय होने में है।
विभिन्न शास्त्रों के प्रामाणिक उद्घोषों के अनुसार, द्वादशी श्राद्ध का पारलौकिक फल जहाँ पितरों को प्रेतत्व से मुक्त कर ब्रह्मलोक या विष्णुलोक की प्राप्ति कराना है, वहीं इसका ऐहिक (लौकिक) फल अत्यंत व्यापक और लोक-कल्याणकारी है। गरुड़ और वायु पुराण के स्पष्ट और विस्मयकारी वचनों के अनुसार, द्वादशी का विधिवत् श्राद्ध सम्पूर्ण राष्ट्र को अजेय बनाता है, कृषकों की फसलों की रक्षा करता है, और श्राद्धकर्ता के परिवार में उत्तम संतति, स्वास्थ्य, उत्कृष्ट ज्ञान और अपार ऐश्वर्य की वृद्धि करता है।
गया तीर्थ के पावन प्रांगण में, विशेष रूप से 'भीम गया' और 'गदालोल' वेदी पर, कुतुप मुहूर्त की पवित्र वेला में, दक्षिणाभिमुख होकर कुशा, काले तिल और मधु मिश्रित पिण्डों का दान; ब्राह्मणों को साक्षात् नारायण और पितृ स्वरूप मानकर कराया गया सात्त्विक भोजन; तथा पञ्चबलि का सूक्ष्म विधान—यही वह सम्पूर्ण, त्रुटिहीन और शास्त्र-सम्मत प्रक्रिया है जो जीवात्मा के जन्म-जन्मान्तर के बन्धनों को छिन्न-भिन्न कर उसे परम शान्ति प्रदान करती है। अतः जो भी श्रद्धावान् और धर्मपरायण मनुष्य इस विशुद्ध शास्त्रोक्त विधि-विधान से द्वादशी का श्राद्ध सम्पन्न करता है, वह वस्तुतः अपने पितरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी परम गति का निर्माण करता है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों का अधिकारी बन जाता है।