विस्तृत उत्तर
वशीकरण का वर्णन और उसके विषय में शास्त्र का स्पष्ट मत:
षट्कर्म में वशीकरण
तंत्र शास्त्र में षट्कर्म (छः कर्म) का उल्लेख है:
- 1शांति — रोग और बाधा निवारण
- 2वशीकरण — आकर्षण
- 3स्तंभन — रोकना
- 4विद्वेषण — शत्रुता उत्पन्न करना
- 5उच्चाटन — स्थान से उखाड़ना
- 6मारण — विनाश
इनमें शांति (प्रथम कर्म) ही एकमात्र सात्विक और शास्त्रसम्मत है।
शास्त्र का स्पष्ट मत — वशीकरण के विषय में
कुलार्णव तंत्र में कहा गया है —
परेच्छया यः साधयति स पापी नरकं व्रजेत्।
— जो दूसरे की इच्छा के विरुद्ध उसे वश में करने का प्रयत्न करता है, वह पापी है और नरक को प्राप्त होता है।
देवी भागवत पुराण का मत
देवी भागवत में स्पष्ट कहा गया है — जो देवी की शक्ति का उपयोग दूसरों को वश में करने, हानि पहुँचाने या स्वार्थ के लिए करता है, उस पर देवी का क्रोध होता है।
नैतिक दृष्टिकोण
वशीकरण दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा (free will) का हरण है — यह मूल रूप से अधार्मिक कृत्य है। हिंदू धर्म में 'अहिंसा परमो धर्मः' और 'परस्परं भावयन्तः' (एक दूसरे को पोषित करो) — ये मूल सिद्धांत वशीकरण के विपरीत हैं।
सच्ची साधना का मार्ग
यदि कोई किसी व्यक्ति का प्रेम या सहयोग चाहता है — उसका उपाय है: अपने गुणों का विकास, सत्य व्यवहार और ईश्वर पर भरोसा। तंत्र शास्त्र का सच्चा उद्देश्य आत्मोद्धार है, दूसरों का शोषण नहीं।





