विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के 'ब्रह्मोत्तर खंड' में राजकुमार धर्मगुप्त की कथा है। विदर्भ देश का राजा मारा गया और रानी अपने पुत्र धर्मगुप्त के साथ वन में भटकने लगी। शांडिल्य ऋषि ने रानी को 'प्रदोष व्रत' का उपदेश देते हुए कहा कि त्रयोदशी को निराहार रहकर प्रदोष काल में शिव पूजा करने से खोया हुआ राज्य मिलेगा। रानी और राजकुमार ने यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से धर्मगुप्त की भेंट गंधर्व राज की कन्या अंशुमती से हुई। गंधर्व राज ने अपनी पुत्री का विवाह धर्मगुप्त से कर अपनी सेना दी, जिससे धर्मगुप्त ने शत्रुओं का नाश कर अपना पैतृक राज्य विदर्भ पुनः प्राप्त कर लिया। यह कथा स्थापित करती है कि यह व्रत दरिद्रता नाश और राजयोग प्राप्ति का अचूक उपाय है।





