विस्तृत उत्तर
गणेश जी के गजमुख (हाथी सिर) की कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता (कुमार खंड) में विस्तार से वर्णित है। यह हिंदू पुराणों की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाओं में से एक है।
कथा (शिव पुराण अनुसार)
- 1गणेश की उत्पत्ति — पार्वती जी ने स्नान से पहले अपने शरीर के मैल (उबटन/चंदन लेप) से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाले। उन्होंने उसे द्वारपाल नियुक्त किया — 'किसी को भी अंदर मत आने देना।'
- 1शिव का आगमन — शिव जी तपस्या/भ्रमण से लौटे और अंदर जाना चाहा। बालक गणेश ने रोक दिया — 'माता ने मना किया है।' गणेश शिव को नहीं जानते थे।
- 1शिव का क्रोध — शिव के गणों ने बालक से युद्ध किया परंतु हार गए। अंततः क्रोधित शिव ने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया।
- 1पार्वती का क्रोध — पार्वती ने देखा तो अत्यंत क्रोधित हुईं और प्रलय करने को तैयार हो गईं। ब्रह्मा और विष्णु ने शांत किया।
- 1शिव का प्रायश्चित — शिव ने गणों को आदेश दिया — 'उत्तर दिशा में जाओ, जो भी प्राणी सबसे पहले मिले जो अपनी माता की ओर पीठ करके सोया हो, उसका सिर लाओ।' एक हाथी का बच्चा मिला (कुछ पाठों में बूढ़ा हाथी)। उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर जोड़ा गया।
- 1पुनर्जीवन और वरदान — शिव ने बालक को पुनर्जीवित किया, अपना पुत्र स्वीकार किया, और वरदान दिया — 'तू सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होगा — किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले तेरी पूजा होगी।'
आध्यात्मिक व्याख्या
- ▸मानव सिर कटना = अहंकार (ego) का नाश।
- ▸गज सिर लगना = ज्ञान (बड़ा सिर = विशाल बुद्धि), श्रवण शक्ति (बड़े कान = बहुत सुनो), विवेक (छोटी आंखें = सूक्ष्म दृष्टि)।
- ▸हाथी = बल, बुद्धि, शांति और धैर्य का प्रतीक।
- ▸प्रथम पूज्य = अहंकार नष्ट होने पर ही सच्ची पूज्यता प्राप्त होती है।
ध्यान दें: इस कथा के अनेक संस्करण विभिन्न पुराणों में मिलते हैं। कुछ में गणेश का निर्माण शिव करते हैं, कुछ में केवल पार्वती। मूल कथा सार एक ही है।





