विस्तृत उत्तर
भक्त प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण (स्कंध 7) में वर्णित है। यह भक्ति की शक्ति और अधर्म के विनाश की सबसे प्रेरक कथा है।
कथा सार
हिरण्यकशिपु (दैत्य राजा) ने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया — न दिन में मरूं न रात, न अंदर न बाहर, न भूमि पर न आकाश, न मनुष्य से न पशु से, न शस्त्र से न अस्त्र से। वरदान से अहंकारी होकर उसने स्वयं को ईश्वर घोषित किया।
उसका पुत्र प्रह्लाद (5 वर्ष) विष्णु भक्त था। पिता ने अनेक बार मारने का प्रयास किया — विष दिया, हाथी से कुचलवाया, अग्नि में डाला (होलिका दहन), पहाड़ से गिराया — प्रह्लाद हर बार बच गया।
अंत में हिरण्यकशिपु ने पूछा — 'तेरा भगवान कहां है?' प्रह्लाद ने कहा — 'सर्वव्यापी है, इस खंभे में भी।' हिरण्यकशिपु ने खंभा तोड़ा — नरसिंह भगवान (आधा नर, आधा सिंह) प्रकट हुए और संध्या काल में, द्वार की चौखट पर, गोद में रखकर, नाखूनों से हिरण्यकशिपु को मारा — वरदान की हर शर्त पूरी करते हुए।
शिक्षाएं
- 1भक्ति सर्वशक्तिमान — 5 वर्ष के बालक की सच्ची भक्ति ने स्वयं भगवान को प्रकट किया। शक्ति, धन, सत्ता — कुछ भी भक्ति से बड़ा नहीं।
- 1अहंकार का विनाश अवश्यंभावी — हिरण्यकशिपु की अपार शक्ति और वरदान भी उसे नहीं बचा सके। अहंकार अंततः विनाश लाता है।
- 1भगवान सर्वव्यापी — 'खंभे में भी हैं' — भगवान कण-कण में हैं। प्रह्लाद का विश्वास सिद्ध हुआ।
- 1धर्म की विजय — कितना भी अन्याय हो, अंततः धर्म जीतता है।
- 1नवधा भक्ति (7.5.23) — प्रह्लाद ने भक्ति के 9 रूप बताए — श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन।
- 1संकट में भी अटल — कठिनतम परिस्थिति में भी धर्म और विश्वास न छोड़ो।





