काम्य कर्म वह कर्म है जो किसी विशेष इच्छा या कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। काम का अर्थ है कामना, और काम्य का अर्थ है कामना से सम्बन्धित। श्राद्ध भी एक काम्य कर्म है, क्योंकि याज्ञवल्क्य स्मृति में हर तिथि का अपना विशिष्ट काम्य फल बताया गया है। द्वितीया का काम्य फल कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशु-धन की प्राप्ति है।
विष्णु पुराण के अनुसार भुजाएं उठाकर श्राद्ध इस प्रकार करना चाहिए। एकांत वन में जाकर, दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर, दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए, ऊंचे स्वर में पुकारें, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।
विष्णु पुराण में निर्धनों के लिए अंतिम उपाय यह है कि व्यक्ति एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर, दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में पितरों से प्रार्थना करे कि उसकी अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्ति लाभ करें। यह सिद्ध करता है कि श्रद्धा भौतिक सामग्री से अधिक मूल्यवान है।
हाँ, विष्णु पुराण के अनुसार गाय को चारा खिलाकर भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि किसी के पास तिल-जल जितनी भी सामग्री नहीं है, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे, और इससे श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है। गाय पवित्रता और देवत्व का प्रतीक है।
हाँ, विष्णु पुराण के अनुसार तिल और जल से भी श्राद्ध हो सकता है। यदि किसी के पास पिण्डदान या ब्राह्मण भोजन के लिए धन-सामग्री नहीं है, तो वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे। श्राद्ध श्रद्धा से होता है, मात्रा से नहीं।
विष्णु पुराण में निर्धन व्यक्तियों के लिए तीन करुणामय विकल्प हैं। पहला, थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल जल के साथ ब्राह्मण को दान। दूसरा, गाय को एक दिन का चारा श्रद्धापूर्वक खिलाना। तीसरा, एकांत वन में आकाश की ओर भुजाएं उठाकर पितरों से अश्रुपूर्ण श्रद्धा से प्रार्थना। श्राद्ध श्रद्धा से होता है, धन से नहीं।
मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों जैसे चाण्डाल आदि में पड़े जीवों को प्राप्त होता है। और सबसे दुखद यह कि पितर क्षुधा अर्थात् भूख से पीड़ित रहते हैं।
नहीं, बेईमानी के पैसे से श्राद्ध नहीं कर सकते। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही करना चाहिए। अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। हव्य का अर्थ है देवताओं को अर्पित और कव्य का अर्थ है पितरों को अर्पित पदार्थ। साधारण लोगों को नहीं, बल्कि वास्तव में आध्यात्मिक रूप से सक्षम व्यक्तियों को ही दान मिलना चाहिए।
नहीं, श्राद्ध में आडंबर नहीं करना चाहिए। भागवत का उपदेश है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए, और अत्यधिक विस्तार या आडंबर करने से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। श्राद्ध सरलता और सच्ची श्रद्धा से ही पूर्ण होता है।
पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल चढ़ाने से अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है। यह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती। पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल भी अत्यंत प्रिय हैं।
नहीं, श्राद्ध में पशु हिंसा पूर्णतः वर्जित है। भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है। पितर सात्त्विक हविष्यान्न अर्थात् दूध, घी, कंद-मूल से ही प्रसन्न होते हैं। पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न पितरों को कभी तृप्ति नहीं देता।
नहीं, भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है। देवर्षि नारद का स्पष्ट उपदेश है कि धर्म का मर्म जानने वाला श्राद्ध में मांस का अर्पण और भक्षण दोनों न करे। पितर सात्त्विक हविष्यान्न अर्थात् दूध, घी, कंद-मूल से ही प्रसन्न होते हैं, मांस से कभी नहीं।
सपिण्डीकरण के बाद जीवात्मा प्रेत कोटि से पितृ कोटि में सम्मिलित होकर पितृलोक की यात्रा आरंभ करती है और श्राद्ध का अधिकार प्राप्त करती है। इससे पहले आत्मा प्रेत रूप में भटकती है। गरुड़ पुराण का दर्शन।
सपिण्डीकरण = प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिसमें पके चावल, दूध, काले तिल से बने पिण्डों को मिलाकर जीवात्मा को प्रेत कोटि से पितृ कोटि में सम्मिलित किया जाता है। इसके बाद ही आत्मा पितृलोक जाती है और श्राद्ध की अधिकारी बनती है।
प्रेत योनि = मृत्यु के बाद आत्मा स्थूल शरीर त्यागकर सूक्ष्म शरीर धारण कर जिस अवस्था में जाती है। सपिण्डीकरण संस्कार से पहले आत्मा प्रेत रूप में भटकती है। गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में विस्तृत वर्णन।
सर्प आदि रेंगने वाली योनियों में स्थित पितर को श्राद्ध का अंश 'वायु' बनकर तृप्ति देता है। मंत्र शक्ति से अन्न उनकी योनि के योग्य रूप में रूपांतरित हो जाता है। मत्स्य/स्कंद पुराण का दर्शन।
पशु योनि में स्थित पितर को श्राद्ध का अंश 'तृण' (घास) बनकर मिलता है। पशु अन्न नहीं खा सकते — इसलिए मंत्र शक्ति से अन्न उनके योग्य घास में रूपांतरित हो जाता है। मत्स्य/स्कंद पुराण का दर्शन।
असुर योनि में स्थित पितर को श्राद्ध का अन्न 'विविध भोगों' के रूप में प्राप्त होता है। मंत्र शक्ति + श्रद्धा से अन्न उनकी योनि के योग्य रूप में रूपांतरित हो जाता है। मत्स्य/स्कंद पुराण का दर्शन।
श्रेष्ठ कर्मों से देवत्व प्राप्त पितर को श्राद्ध का अन्न 'अमृत' रूप में मिलता है। मंत्र शक्ति + श्रद्धा से स्थूल अन्न देव योनि के लिए दिव्य अमृत में रूपांतरित हो जाता है। मत्स्य/स्कंद पुराण का दर्शन।
मत्स्य/स्कंद पुराण: पितर की योनि के अनुसार अन्न रूपांतरित होता है — देव योनि = अमृत, असुर योनि = भोग, पशु योनि = तृण (घास), सर्प योनि = वायु। मंत्र शक्ति + श्रद्धा से यह सूक्ष्म रूपांतरण होता है।