विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में पशु हिंसा पूर्णतः वर्जित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है।
इस निषेध का स्रोत श्रीमद्भागवत महापुराण है। श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कन्ध के 14वें और 15वें अध्याय में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को गृहस्थ धर्म और मोक्ष धर्म का उपदेश देते हुए श्राद्ध के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। इन्हीं अध्यायों में पशु-हिंसा का स्पष्ट निषेध है।
देवर्षि नारद का स्पष्ट निर्देश इस प्रकार है। देवर्षि नारद स्पष्ट करते हैं कि धर्म का वास्तविक मर्म जानने वाला पुरुष श्राद्ध में भूलकर भी मांस का अर्पण न करे और न ही स्वयं उसका भक्षण करे। यह निर्देश पशु-हिंसा को भी पूर्णतः वर्जित कर देता है, क्योंकि मांस के लिए ही पशु-हिंसा होती है।
पशु-हिंसा का निषेध का कारण भी स्पष्ट है। पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल से जो अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है, वह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती। अर्थात् पशु-हिंसा से प्राप्त भोजन पितरों को तृप्ति नहीं देता, बल्कि सात्त्विक भोजन ही उन्हें प्रसन्न करता है।
यहाँ पशुबलि या किसी जीव की हत्या शब्द विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। पशुबलि अर्थात् किसी पशु को बलि देना, और किसी जीव की हत्या अर्थात् किसी भी प्राणी को मारना। दोनों ही पूर्णतः वर्जित हैं। श्राद्ध जैसे पवित्र अनुष्ठान में हिंसा का कोई स्थान नहीं है।
इस निषेध के पीछे सनातन धर्म का अहिंसा सिद्धांत है। सनातन धर्म में अहिंसा परम धर्म माना जाता है, और श्राद्ध जैसे पुण्य कार्य में हिंसा का प्रयोग धर्म-विरुद्ध है। पितर सात्त्विक और पवित्र भोजन से ही प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वे स्वयं भी सूक्ष्म स्वरूप में हैं, और स्थूल हिंसा से उन्हें कोई लाभ नहीं होता।
श्राद्ध में सात्त्विक भोजन का ही विधान है। पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल देना चाहिए। ये सब अहिंसक भोजन हैं, अर्थात् जिनके लिए किसी जीव की हत्या नहीं होती। चावल, गेहूँ, दूध, घी, फल, कंद-मूल आदि सब सात्त्विक और अहिंसक हैं।
श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भी विशेष व्यक्तियों को देना चाहिए। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। ऐसे ब्राह्मण भी सात्त्विक जीवन जीते हैं, और मांस-मदिरा से दूर रहते हैं। इसलिए वे श्राद्ध के अन्न को ग्रहण करने के योग्य होते हैं।
पशु-हिंसा का निषेध न केवल भागवत में है, बल्कि अन्य शास्त्रों में भी है। विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण भी सात्त्विक भोजन की ही महिमा गाते हैं। पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः नहीं, श्राद्ध में पशु हिंसा पूर्णतः वर्जित है। भागवत पुराण और देवर्षि नारद का स्पष्ट उपदेश है कि श्राद्ध में पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि पितर केवल सात्त्विक हविष्यान्न से ही प्रसन्न होते हैं।
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