विस्तृत उत्तर
काम्य कर्म वह कर्म है जो किसी विशेष इच्छा या कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध केवल एक कर्तव्य या नित्य कर्म ही नहीं है, अपितु इसे काम्य कर्म यानी इच्छा पूर्ति हेतु किया जाने वाला कर्म के रूप में भी शास्त्रों में मान्यता प्राप्त है।
काम्य कर्म का शाब्दिक अर्थ देखें तो काम का अर्थ है इच्छा या कामना, और काम्य का अर्थ है कामना से सम्बन्धित। इसलिए काम्य कर्म वह कर्म है, जो किसी कामना यानी इच्छा को पूरा करने के लिए किया जाए। यह एक विशेष प्रकार का कर्म है, जो सामान्य नित्य कर्मों से अलग है।
श्राद्ध के तीन मुख्य प्रकार के कर्म होते हैं। पहला प्रकार है नित्य कर्म। यह वह कर्म है जो प्रतिदिन या नियमित रूप से किया जाना चाहिए। यह कर्तव्य के रूप में होता है। दूसरा प्रकार है नैमित्तिक कर्म। यह वह कर्म है जो किसी विशेष निमित्त यानी अवसर पर किया जाता है, जैसे ग्रहण के समय। तीसरा प्रकार है काम्य कर्म। यह वह कर्म है जो किसी विशेष कामना से किया जाता है।
श्राद्ध तीनों प्रकार का हो सकता है। नित्य रूप में, श्राद्ध हर वंशज का कर्तव्य है, जो उसे पितृ ऋण से मुक्त करता है। नैमित्तिक रूप में, श्राद्ध विशेष अवसरों जैसे ग्रहण, संक्रान्ति आदि पर किया जाता है। काम्य रूप में, श्राद्ध किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है।
काम्य श्राद्ध की विशेषता तिथि-वार फलों से है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय यानी श्राद्ध प्रकरण में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों पर श्राद्ध करने से मिलने वाले विशिष्ट फलों यानी काम्य फलों का अत्यंत विशद और प्रमाणिक वर्णन किया है।
हर तिथि का अपना काम्य फल है। प्रतिपदा को श्राद्ध करने से उत्तम कन्याओं की प्राप्ति होती है। द्वितीया को श्राद्ध करने से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशू वै यानी प्रचुर पशु-धन की प्राप्ति होती है। तृतीया को अश्व यानी घोड़े आदि वाहनों की प्राप्ति होती है। चतुर्थी को क्षुद्र पशु यानी भेड़, बकरी आदि की प्राप्ति होती है। पञ्चमी को उत्तम पुत्रों की प्राप्ति होती है। षष्ठी को द्यूत यानी क्रीड़ा या आमोद-प्रमोद में विजय होती है। सप्तमी को कृषि में अभूतपूर्व सफलता मिलती है। अष्टमी को वाणिज्य यानी व्यापार में अत्यधिक लाभ होता है।
काम्य कर्म का वैज्ञानिक आधार है। प्रत्येक तिथि का अपना अधिष्ठाता देवता और काम्य प्रभाव है। उस तिथि पर श्राद्ध करने से उस देवता का विशेष प्रभाव कर्ता पर पड़ता है, और उस तिथि का काम्य फल मिलता है। यह एक सूक्ष्म ऊर्जा-सम्बन्ध है।
काम्य श्राद्ध और नित्य श्राद्ध का अंतर है। नित्य श्राद्ध में कर्ता का उद्देश्य पितरों को तृप्ति देना और पितृ ऋण से मुक्त होना होता है। काम्य श्राद्ध में कर्ता का उद्देश्य उपर्युक्त के साथ-साथ किसी विशेष कामना की पूर्ति भी होता है। दोनों ही शास्त्र-सम्मत हैं।
काम्य श्राद्ध का दार्शनिक आधार भी विशेष है। शास्त्रों में स्पष्ट है कि व्यक्ति की इच्छाएँ धर्म के अनुसार होनी चाहिए, और उन्हें शास्त्र-सम्मत मार्ग से ही पूरा करना चाहिए। काम्य श्राद्ध एक ऐसा शास्त्र-सम्मत मार्ग है, जिससे कर्ता अपनी धार्मिक इच्छाओं को पूरा कर सकता है।
द्वितीया का काम्य फल विशेष महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में द्वितीया तिथि के श्राद्ध के फल का निरूपण करते हुए कहा गया है। श्लोक है कन्यां कन्यावेदिनश्च पशून् वै सुसतानपि। द्यूतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफं चैकशफं तथा। इसका अर्थ है कि द्वितीया को श्राद्ध करने से कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है।
इसके अतिरिक्त, द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है। कृषि प्रधान और गौ-आधारित वैदिक समाज में पशु-धन को सर्वोच्च सम्पत्ति माना जाता था। अतः याज्ञवल्क्य स्मृति का यह उद्घोष कि द्वितीया श्राद्ध से पशु-धन और सुयोग्य दामाद की प्राप्ति होती है, इस तिथि के श्राद्ध को पारिवारिक सुख, सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है।
काम्य श्राद्ध के साथ सामान्य फल भी मिलते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 में श्राद्ध के सामान्य फल का उद्घोष करते हुए महर्षि कहते हैं आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पितः। श्राद्ध से तृप्त पितर वंशज को आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य का आशीर्वाद देते हैं। द्वितीया श्राद्ध करने वाले साधक को ये सभी सामान्य फल तो प्राप्त होते ही हैं, साथ ही उसे द्वितीया का विशिष्ट काम्य फल भी स्वतः प्राप्त हो जाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264, याज्ञवल्क्य स्मृति 1.270 और नृसिंह प्रसाद-श्राद्धसारः इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः काम्य कर्म वह कर्म है जो किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए किया जाता है। श्राद्ध को काम्य कर्म के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। तिथि के अनुसार विशिष्ट काम्य फल मिलते हैं, जैसे द्वितीया श्राद्ध से कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशु-धन की प्राप्ति।
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