विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में आडंबर करना उचित नहीं है। शास्त्रीय आधार के अनुसार भागवत यह भी उपदेश देता है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए, अत्यधिक विस्तार या आडंबर करने से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है।
भागवत के इस उपदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं। पहला बिंदु है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए। अर्थात् कर्ता को अपने धन और सामर्थ्य पर गर्व करते हुए श्राद्ध नहीं करना चाहिए। दूसरा बिंदु है कि अत्यधिक विस्तार नहीं करना चाहिए। अर्थात् श्राद्ध को बहुत बड़ा और भव्य आयोजन नहीं बनाना चाहिए। तीसरा बिंदु है कि आडंबर नहीं करना चाहिए। अर्थात् दिखावा और तामझाम से बचना चाहिए।
इस आडंबर से जो हानि होती है वह विशेष रूप से वर्णित है। आडंबर से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। श्रद्धा का अर्थ है पवित्र भावना, पात्र का अर्थ है उचित प्राप्तकर्ता, और देश-काल का अर्थ है सही स्थान और समय। आडंबर करने से ये तीनों संतुलन बिगड़ जाते हैं, और श्राद्ध की पवित्रता खो जाती है।
श्राद्ध की मूल भावना सरलता और श्रद्धा है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी अन्न, जल, पिण्ड अथवा तर्पण पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। इसमें श्रद्धा प्रमुख है, आडंबर नहीं।
श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान विशेष व्यक्तियों को ही देना चाहिए। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। यह भी आडंबर के विरुद्ध है, क्योंकि साधारण और दिखावे वाले लोगों को नहीं, बल्कि वास्तव में सद्गुणी ब्राह्मणों को ही देना चाहिए।
श्राद्ध में सरलता का महत्व विशेष है। विष्णु पुराण में निर्धन व्यक्तियों के लिए एक अत्यंत करुणापूर्ण और दार्शनिक विकल्प प्रस्तुत किया गया है। यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो उसे विचलित नहीं होना चाहिए। वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे।
यह सिद्ध करता है कि श्राद्ध में मात्रा या भव्यता नहीं, बल्कि श्रद्धा और भाव की प्रमुखता है। यदि किसी के पास इतना भी न हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे। यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में कहे, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।
विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। यह आडंबर के विरुद्ध सबसे बड़ा प्रमाण है। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः नहीं, श्राद्ध में आडंबर नहीं करना चाहिए। भागवत के अनुसार श्राद्ध में धन का अहंकार और अत्यधिक विस्तार से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। श्राद्ध सरलता और सच्ची श्रद्धा से ही पूर्ण होता है।
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