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भुजाएं उठाकर श्राद्ध कैसे करें?

विष्णु पुराण के अनुसार भुजाएं उठाकर श्राद्ध इस प्रकार करना चाहिए।

संक्षिप्त उत्तर

विष्णु पुराण के अनुसार भुजाएं उठाकर श्राद्ध इस प्रकार करना चाहिए। एकांत वन में जाकर, दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर, दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए, ऊंचे स्वर में पुकारें, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।

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विस्तृत उत्तर

भुजाएं उठाकर श्राद्ध करने की विधि विष्णु पुराण में अत्यंत स्पष्ट रूप से वर्णित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार और यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में कहे, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।

इस विधि के चरणों को विस्तार से देखें। पहला चरण है एकांत वन में जाना। एकांत वन अर्थात् जहाँ कोई न हो, ऐसा निर्जन और शांत स्थान। यह स्थान इसलिए चुना जाता है क्योंकि वहाँ ध्यान केंद्रित होता है, और बाहरी बाधाएं नहीं होतीं।

दूसरा चरण है दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाना। दोनों भुजाएं अर्थात् दोनों हाथ, और आकाश की ओर उठाना अर्थात् ऊपर की दिशा में। यह क्रिया शरणागति, समर्पण और पुकार का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि व्यक्ति पितरों से प्रार्थना कर रहा है।

तीसरा चरण है दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखना। दिक्पाल अर्थात् दिशाओं के देवता। ये पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, और चार उप-दिशाओं के देवता हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड के साक्षी हैं। सूर्य देव अर्थात् सूर्य भगवान, जो प्रत्यक्ष देव हैं। इन सब को साक्षी बनाकर प्रार्थना की जाती है।

चौथा चरण है ऊंचे स्वर में पुकारना। ऊंचे स्वर में अर्थात् मन में नहीं, बल्कि ऊंची आवाज में। यह इसलिए कि पितरों तक आवाज पहुँचे, और दिक्पाल भी सुन सकें। यह सच्ची भावना का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है।

पाँचवाँ चरण है प्रार्थना का उच्चारण। प्रार्थना का सम्पूर्ण रूप यह है, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें। इस प्रार्थना में तीन बातें हैं। पहली, अपनी असमर्थता का स्वीकार। दूसरी, पितरों को नमस्कार। तीसरी, अपनी भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से तृप्ति की प्रार्थना।

यह विधि कब अपनाई जाती है। यह तब अपनाई जाती है जब व्यक्ति किसी भी अन्य प्रकार से श्राद्ध करने में असमर्थ हो। पहले विकल्प में थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ ब्राह्मण को दान। दूसरे विकल्प में गाय को चारा खिलाना। और जब इन दोनों के लिए भी व्यक्ति अक्षम हो, तब यह तीसरा और अंतिम विकल्प।

इस विधि का दार्शनिक आधार सच्ची श्रद्धा है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। इसमें श्रद्धा प्रमुख है, सामग्री नहीं। इसलिए जब व्यक्ति के पास सामग्री नहीं है, परंतु श्रद्धा है, तो वह केवल श्रद्धा से ही श्राद्ध कर सकता है।

इस विधि का व्यापक प्रभाव यह है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी निर्धन हो, अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर सकता है। यह सनातन धर्म की महान करुणा है। विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है।

अश्रुपूर्ण श्रद्धा का महत्व विशेष है। अश्रुपूर्ण अर्थात् आँसुओं से भरी हुई। जब व्यक्ति अपने पितरों के लिए कुछ न कर पाने के दुख में रोता है, और सच्चे मन से प्रार्थना करता है, तो उसकी अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्त हो जाते हैं। यह दिखावे की श्रद्धा नहीं है, बल्कि सच्ची, हृदय से उत्पन्न श्रद्धा है।

यह विधि सिद्ध करती है कि सनातन धर्म में सच्ची भक्ति का सबसे बड़ा महत्व है। पितर अपने वंशज की सच्ची भावना देखते हैं, न कि उसकी सामग्री या आडंबर। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः भुजाएं उठाकर श्राद्ध करने की विधि यह है कि व्यक्ति एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाए, दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में पितरों को नमस्कार करे, और प्रार्थना करे कि उसकी भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्ति लाभ करें।

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