विस्तृत उत्तर
अन्याय के धन से किया गया श्राद्ध नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
इस वर्णन में तीन प्रमुख दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। पहला दुष्परिणाम यह है कि अशुद्ध धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता। अर्थात् पितरों की सद्गति और मुक्ति नहीं होती। दूसरा दुष्परिणाम यह है कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है। तीसरा दुष्परिणाम यह है कि पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। क्षुधा का अर्थ है भूख।
नीच योनियाँ क्या हैं तो ये निकृष्ट और हीन योनियाँ होती हैं, जैसे चाण्डाल आदि। चाण्डाल जैसी निम्न योनियों में पड़े जीव अन्याय के धन से अर्पित अन्न को प्राप्त करते हैं, जबकि पितर भूखे रहते हैं। यह श्राद्ध का सबसे विकट परिणाम है, क्योंकि पितरों को तृप्ति देने का उद्देश्य लेकर किया गया श्राद्ध, उन्हें भूख से तड़पाता है।
इस सिद्धांत का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। जब कोई व्यक्ति अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से धन कमाता है, तो उस धन में दूसरे का दुख और आँसू मिले होते हैं। ऐसा अपवित्र धन पितरों को कैसे प्रसन्न कर सकता है? इसलिए वह धन पितरों तक नहीं पहुँचता, बल्कि उन्हीं नीच योनियों के जीवों तक पहुँचता है, जो स्वयं पाप-कर्मों के कारण उन योनियों में पड़े हैं।
पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं इस कथन का अर्थ अत्यंत दुखद है। पितर अपने वंशजों से तृप्ति की आशा करते हैं। श्राद्ध के समय वे अपने वंशजों के द्वार पर वायु रूप में आते हैं, और तर्पण-अन्न की प्रतीक्षा करते हैं। परंतु यदि वंशज अशुद्ध धन से श्राद्ध करता है, तो पितर उस अन्न को ग्रहण नहीं कर सकते, और भूख से तड़पते रहते हैं। यह वंशज का सबसे बड़ा अपराध है।
इस सिद्धांत के पीछे न्याय का सिद्धांत भी है। पाप-कर्मों से अर्जित धन का फल भी पाप ही होता है। अन्याय का धन कभी सद्गति नहीं ला सकता, चाहे वह श्राद्ध जैसे पवित्र कार्य में लगाया जाए। यह कर्म-सिद्धांत के अनुसार है, जिसमें कारण और कार्य दोनों एक ही प्रकृति के होते हैं।
विष्णु पुराण इस बात पर सर्वाधिक बल देता है कि श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही किया जाना चाहिए। यही श्राद्ध की मूल शर्त है। न्याय और ईमानदारी से कमाया गया धन ही पितरों तक पहुँचता है, और उन्हें सद्गति देता है।
निर्धन व्यक्तियों के लिए विष्णु पुराण ने करुणामय विकल्प दिए हैं। यदि किसी के पास धन नहीं है, तो वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे, या गाय को चारा खिला दे, या आकाश की ओर भुजाएं उठाकर श्रद्धा से प्रार्थना करे। यह सिद्ध करता है कि बेईमानी के बड़े धन से अधिक, सच्ची श्रद्धा से किया गया छोटा कार्य श्रेष्ठ है।
यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है। शास्त्रीय आधार के रूप में मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः अन्याय के धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों जैसे चाण्डाल आदि में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा अर्थात् भूख से पीड़ित रहते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक
