विस्तृत उत्तर
गरीब आदमी के लिए विष्णु पुराण में अत्यंत करुणामय विकल्प प्रस्तुत किए गए हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार विष्णु पुराण में निर्धन व्यक्तियों के लिए एक अत्यंत करुणापूर्ण और दार्शनिक विकल्प प्रस्तुत किया गया है।
निर्धन व्यक्ति के लिए तीन क्रमिक विकल्प हैं। पहला विकल्प है तिल और जल का दान। यदि किसी श्राद्धकर्ता के पास पिण्डदान करने या ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए धन और सामग्री का सर्वथा अभाव हो, तो उसे विचलित नहीं होना चाहिए। वह केवल थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल अंजलि में जल के साथ लेकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान कर दे। अर्थात् छोटी सी सामग्री से भी श्राद्ध हो सकता है।
दूसरा विकल्प है गाय को चारा खिलाना। यदि वह इतना भी करने में असमर्थ हो, तो वह कहीं से एक दिन का चारा लाकर श्रद्धापूर्वक गाय को खिला दे। अर्थात् गाय को चारा खिलाने मात्र से भी श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है। यह विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि गाय सनातन धर्म में पवित्रता का प्रतीक है, और उसे चारा खिलाना भी एक पुण्य कर्म है।
तीसरा और अंतिम विकल्प है केवल श्रद्धा से प्रार्थना। यदि वह इसके लिए भी अक्षम हो, तो विष्णु पुराण कहता है कि वह एकांत वन में जाकर, अपनी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाकर दिक्पालों और सूर्य देव की ओर देखते हुए ऊंचे स्वर में कहे, हे पितृगण, मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न कोई धन है, न सामग्री। मैं केवल आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरी इस भक्ति और अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही तृप्ति लाभ करें।
इस तीसरे विकल्प की महिमा सबसे विशेष है। इसमें कोई सामग्री नहीं है, कोई धन नहीं है, केवल श्रद्धा और भक्ति है। एकांत वन में जाकर भुजाएं आकाश की ओर उठाना और पितरों से प्रार्थना करना ही पर्याप्त है। अश्रुपूर्ण श्रद्धा अर्थात् आँसुओं से भरी श्रद्धा से ही पितर तृप्त हो जाते हैं।
इन तीनों विकल्पों का गहरा अर्थ है। ये सिद्ध करते हैं कि सनातन धर्म में श्राद्ध केवल धन और सामग्री से नहीं, बल्कि श्रद्धा और भावना से होता है। विष्णु पुराण का यह उद्घोष सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में भौतिक सामग्री से अधिक श्रद्धा और आंतरिक भावना का मूल्य है।
यह करुणामय विधान निर्धन व्यक्तियों के लिए महान सहारा है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो, अपने पितरों का श्राद्ध कर सकता है। शास्त्रों ने ऐसे अनेक विकल्प दिए हैं ताकि कोई भी पितृ ऋण से वंचित न रहे। यह सनातन धर्म की पूर्णता और करुणा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
इसके विपरीत बेईमानी के धन से श्राद्ध करना सर्वथा वर्जित है। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं। इसलिए धनवान व्यक्ति यदि अशुद्ध धन से श्राद्ध करे, तो वह निर्धन व्यक्ति की सच्ची श्रद्धा से कमतर है।
श्राद्ध की मूल भावना श्रद्धा है। श्राद्ध शब्द का अर्थ ही है श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्, अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी अन्न, जल, पिण्ड अथवा तर्पण पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। इसमें श्रद्धा प्रमुख है, धन नहीं।
निर्धन व्यक्ति की प्रार्थना का आवाहन भी विशेष है। दिक्पाल अर्थात् दिशाओं के देवता और सूर्य देव सब साक्षी होते हैं, जब कोई निर्धन व्यक्ति आकाश की ओर भुजाएं उठाकर पितरों से प्रार्थना करता है। उसकी अश्रुपूर्ण श्रद्धा से ही पितर तृप्त हो जाते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः गरीब आदमी श्राद्ध तीन तरीकों से कर सकता है। पहला तरीका है थोड़ा सा कच्चा धान या एक मुट्ठी तिल जल के साथ ब्राह्मण को दान। दूसरा तरीका है गाय को चारा खिलाना। तीसरा तरीका है एकांत वन में आकाश की ओर भुजाएं उठाकर पितरों से अश्रुपूर्ण श्रद्धा से प्रार्थना करना।
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