विस्तृत उत्तर
वेदों में, विशेषकर ऋग्वेद और यजुर्वेद की संहिताओं में, भगवान शिव को 'रुद्र' के रूप में ही सर्वाधिक संबोधित किया गया है।
रुद्राष्टाध्यायी और यजुर्वेद के अनुसार 'रुद्र' का शाब्दिक अर्थ है — 'रुत् दूर करने वाला'। 'रुत्' का अर्थ है सांसारिक दुःख, पीड़ा, व्याधि या अज्ञान; अर्थात् जो परमात्मा जीवों के सभी प्रकार के दुखों, कष्टों और जन्म-मृत्यु के चक्र रूपी रुदन का हरण करता है, वही परम करुणामय रुद्र है।
शिव का यह रुद्र स्वरूप दर्शाता है कि ईश्वर की कठोरता के पीछे भी जीवों को उनके कर्म बंधनों से मुक्त करने की परम करुणा छिपी होती है।





