विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध (२.२.२७) में सत्यलोक के निवासियों की स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन है — न यत्र शोको न जरा न मृत्युर्नार्तिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित्। अर्थात सत्यलोक में न तो किसी बात का शोक है, न बुढ़ापा है, न मृत्यु का भय है और न ही किसी प्रकार की शारीरिक या मानसिक पीड़ा और उद्वेग का कोई अस्तित्व है। वहाँ भौतिक जगत के स्वाभाविक क्लेशों और त्रितापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक दुखों) का पूर्णतया अभाव है। परंतु इस सर्वोच्च लोक में रहने वाले सिद्ध आत्माओं के हृदय में केवल एक ही प्रकार की पीड़ा होती है और वह है अज्ञान में फंसे भौतिक जगत के जीवों के प्रति अथाह करुणा।
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