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दान और साधुधर्म📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 20-21⏱ 1 मिनट पठन

दान का सही लक्षण क्या है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

न्यायपूर्वक अर्जित प्रिय द्रव्य को गुणी पात्र को देना दान का लक्षण है।

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विस्तृत उत्तर

दान का सही लक्षण न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य को गुणी पात्र को देना है। पाठ में कहा गया है कि दाता द्वारा दिया गया दान इसी प्रकार होना चाहिए। दान तीन प्रकार का बताया गया है: कनिष्ठ, मध्यम और श्रेष्ठ। करुणापूर्वक सभी प्राणियों के निमित्त धन का विभाग करना मध्यम दान कहा गया है। इसलिए दान में धन की शुद्ध कमाई, पात्रता और करुणा तीनों महत्त्वपूर्ण हैं।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 20-21
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

दान का सही लक्षण क्या है को संदर्भ सहित समझें

दान का सही लक्षण क्या है का सबसे सीधा सार यह है: न्यायपूर्वक अर्जित प्रिय द्रव्य को गुणी पात्र को देना दान का लक्षण है।

दान और साधुधर्म जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 20-21 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 10, PDF पृष्ठ 59, श्लोक 20-21 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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