विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत (२.२.२७) में एक अत्यंत रहस्यमयी और गूढ़ वर्णन है। सत्यलोक में न शोक है, न जरा है, न मृत्यु है, न पीड़ा है — फिर भी यहाँ के निवासियों के हृदय में एक प्रकार का उद्वेग रहता है। और वह है — अज्ञान में फंसे हुए भौतिक जगत के उन जीवों के प्रति अथाह करुणा जो भगवान की भक्ति और परम ज्ञान से विमुख होकर इन्द्रिय तृप्ति में लगे हैं। यह करुणा किसी भौतिक अभाव के कारण नहीं बल्कि पूर्ण चेतना और अद्वैत ज्ञान की जागृति के कारण उत्पन्न होती है। जब चेतना इतनी विकसित हो जाती है कि समस्त जीवों में स्वयं को देखा जाए तब दूसरों की पीड़ा स्वयं की पीड़ा बन जाती है। सत्यलोक के निवासी परम तृप्त होते हुए भी करुणा से द्रवित रहते हैं।
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