विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत (२.२.२७) में सत्यलोक के निवासियों की करुणा का वर्णन अत्यंत गहरे दार्शनिक अर्थ को वहन करता है। यह करुणा किसी भौतिक अभाव या अपनी किसी अपूर्णता के कारण नहीं अपितु पूर्ण चेतना और अद्वैत ज्ञान की जागृति के कारण उत्पन्न होती है। जब चेतना इतनी विकसित और विस्तृत हो जाती है कि जीव समस्त ब्रह्माण्ड के जीवों में अपने आपको देखे, तो दूसरों की पीड़ा उसकी अपनी पीड़ा बन जाती है। यह उपनिषदों के 'सर्वम् खल्विदं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है) और 'अहम् ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) की अनुभूति का व्यावहारिक प्रकटीकरण है। यह करुणा स्वयं परमानन्द से ओतप्रोत होते हुए भी समस्त प्राणियों के प्रति उत्पन्न होती है — यही उच्चतम करुणा है जो स्वयं की पूर्णता से उपजती है न कि अपूर्णता से।
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