वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान में चतुर्दश भुवनों का पदानुक्रम
सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, विशेषकर पुराणों, स्मृतियों और वेदांत दर्शन में ब्रह्मांड की संरचना का अत्यंत सूक्ष्म, खगोलीय और आध्यात्मिक विवेचन प्राप्त होता है। वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, यह संपूर्ण चराचर जगत एक विशाल ब्रह्मांडीय अंड (ब्रह्मांड) के भीतर स्थित है, जिसे चौदह लोकों (भुवनों) में विभाजित किया गया है । इन चौदह लोकों को दो मुख्य श्रेणियों में विभक्त किया गया है: सात ऊर्ध्व लोक (व्याहृतियाँ या उच्चतर लोक) और सात अधोलोक (पाताल या निम्नतर लोक)। ऊर्ध्व लोकों में भूर्लोक (पृथ्वी), भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक आते हैं, जहाँ क्रमशः बढ़ती हुई आध्यात्मिक चेतना, दिव्यता और पवित्रता वाले प्राणी निवास करते हैं । पृथ्वी के ठीक नीचे सात अधोलोक स्थित हैं, जिन्हें 'बिल-स्वर्ग' (भूमिगत स्वर्ग) की श्रेणी में रखा जाता है। इन सात अधोलोकों के नाम शास्त्रों में इस क्रम में वर्णित हैं: अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल ।
इस ब्रह्मांडीय पदानुक्रम में 'रसातल' पृथ्वी के नीचे स्थित छठा अधोलोक है । यह एक अत्यंत विशाल, रहस्यमयी और भौतिक ऐश्वर्य से परिपूर्ण लोक है। यद्यपि इसे अधोलोक कहा जाता है, परंतु पुराणों में इसे 'नरक' नहीं माना गया है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार नरक लोक इन सातों पाताल लोकों से भी नीचे, गर्भोदक सागर के ठीक ऊपर और दक्षिण दिशा में पितृलोक के समीप स्थित हैं, जहाँ पापी जीवात्माएं अपने कर्मों का दंड भोगती हैं। इसके विपरीत, रसातल सहित सभी सातों अधोलोक 'बिल-स्वर्ग' कहलाते हैं। 'बिल' का अर्थ है छिद्र या गुफा, और 'स्वर्ग' का अर्थ है सुख-सुविधाओं का स्थान। अर्थात्, ये ऐसे भूमिगत लोक हैं जहाँ स्वर्ग से भी अधिक भौतिक सुख, संपदा, विलासिता और ऐश्वर्य उपलब्ध हैं ।
भगवान विष्णु के विराट स्वरूप (विराट पुरुष) के अंगों के ध्यान के वर्णन में, इन चौदह लोकों को उनके दिव्य शरीर का हिस्सा बताया गया है। श्रीमद्भागवत पुराण के खगोलीय आख्यानों के अनुसार, रसातल विराट पुरुष के दोनों पैरों के गुल्फ (टखनों) और तलवों के मध्य का भाग है । यह लोक देवों के चिरंतन शत्रुओं का आश्रय स्थल है, जहाँ वे अपनी मायावी शक्तियों और असीम भौतिक संपदा के बीच निवास करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, रसातल भौतिक आसक्ति, शक्ति के अहंकार और ईश्वरीय सत्ता के प्रति विद्रोही चेतना का प्रतीक है, जहाँ प्राणी ईश्वर के आध्यात्मिक आनंद के स्थान पर नितांत भौतिक भोगों में लिप्त रहते हैं ।
| ऊर्ध्व लोक (सप्त व्याहृति) | सत्यलोक | शीर्ष (मस्तक) | ब्रह्मा एवं मुक्त जीवात्माएं |
| ऊर्ध्व लोक | तपोलोक | ललाट (माथा) | वैराज आदि महान तपस्वी |
| ऊर्ध्व लोक | जनलोक | मुख | सनकादि मुनि |
| ऊर्ध्व लोक | महर्लोक | वक्षस्थल | भृगु आदि महर्षि |
| ऊर्ध्व लोक | स्वर्लोक (स्वर्ग) | हृदय | देवराज इंद्र एवं देवगण |
| ऊर्ध्व लोक | भुवर्लोक | नाभि | सिद्ध, चारण, विद्याधर |
| मध्य लोक | भूर्लोक (पृथ्वी) | कटि (कमर) | मनुष्य एवं साधारण जीव |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | अतल | जंघा | मय दानव के पुत्र बल का निवास |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | वितल | घुटने | हाटकेश्वर शिव और उनके गण |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | सुतल | पिंडलियां | राजा बलि का निवास |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | तलातल | गुल्फ (टखने) का ऊपरी भाग | मय दानव का निवास |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | महातल | टखने (गुल्फ) | कद्रू के पुत्र महानाग |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | रसातल | तलवों के ऊपरी भाग | दैत्य, दानव, पणि, निवातकवच |
| अधोलोक (बिल-स्वर्ग) | पाताल (नागलोक) | चरण-तल (तलवे) | वासुकि, शंख, अनंत शेष |
रसातल का भौगोलिक और खगोलीय स्थान
श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध और विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में ब्रह्मांड के स्थानिक विस्तार का अत्यंत गणितीय और सटीक वर्णन मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, भूर्लोक (पृथ्वी) के नीचे सत्तर हजार योजन की कुल गहराई में ये सातों अधोलोक एक के नीचे एक स्थित हैं । पृथ्वी के तल से नीचे जाने पर प्रत्येक लोक की ऊँचाई या गहराई दस-दस हजार योजन बताई गई है। एक योजन की आधुनिक गणना लगभग बारह से पंद्रह किलोमीटर के बीच मानी जाती है ।
इस अवरोही क्रम में, पृथ्वी से ठीक नीचे दस हजार योजन की गहराई में 'अतल' लोक आता है। उसके दस हजार योजन नीचे 'वितल', उसके पश्चात 'सुतल', तदुपरांत 'तलातल', और उसके नीचे 'महातल' स्थित हैं। महातल के दस हजार योजन नीचे छठा लोक 'रसातल' स्थित है । रसातल के भी दस हजार योजन नीचे अंतिम लोक 'पाताल' (या नागलोक) स्थित है, जहाँ नागराज वासुकि और ब्रह्मांड का भार वहन करने वाले भगवान अनंत शेष निवास करते हैं । इस प्रकार, पृथ्वी से रसातल की कुल गहराई लगभग साठ हजार योजन नीचे है। ब्रह्मांड पुराण के प्रक्रिया पाद में भी इस गहराई और विस्तार की पूर्ण पुष्टि की गई है। वहाँ महर्षि व्यास यह स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक अधोलोक का विस्तार दस हजार योजन है और यह पूर्ण रूप से एक ठोस और विस्तृत भूभाग है ।
इन लोकों का विस्तार न केवल गहराई में है, बल्कि चौड़ाई में भी ये पृथ्वी के ही समान विशाल हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि इन सातों अधोलोकों की लंबाई और चौड़ाई पृथ्वी (भूमंडल) के ही समान है । ये लोक अंतरिक्ष में तैरते हुए साधारण ग्रह नहीं हैं, बल्कि भूमंडल के भीतर स्थित एक बहु-आयामी भूमिगत क्षेत्र हैं। रसातल की यह भौगोलिक स्थिति इसे एक ऐसा अभेद्य दुर्ग बनाती है, जो गर्भोदक सागर की अथाह जलराशि के अत्यधिक समीप है। इसके नाम में 'रस' (जल या रस) शब्द का प्रयोग इसी जलीय आधार की निकटता को दर्शाता है। यह ब्रह्मांड के उस असीम जल-स्तर के भीतर का वह क्षेत्र है, जहाँ से ब्रह्मांड का जल-मग्न आधार प्रारंभ होता है ।
रसातल का स्वरूप, संरचना और भू-प्रकृति
रसातल का स्वरूप और वहाँ की संरचना सामान्य मानवीय कल्पना और पृथ्वी के भौतिक नियमों से सर्वथा भिन्न है। वायु पुराण, ब्रह्मांड पुराण और विष्णु पुराण में इन सातों अधोलोकों की मिट्टी (भूमि) के रंगों और प्रकृति का अत्यंत स्पष्ट वर्णन किया गया है। ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण के अनुसार, अतल लोक की भूमि काली है, वितल की भूमि पीत-श्वेत (हल्की सफेद) है, सुतल की भूमि नीली है, तलातल की भूमि पीली है, महातल की भूमि चट्टानी है, पाताल की भूमि पूर्णतः स्वर्णमयी है और रसातल की भूमि पथरीली (कंकड़-पत्थर युक्त) है । विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के पंचम अध्याय में महर्षि पराशर मैत्रेय को बताते हैं कि इन सातों पाताल लोकों की भूमियाँ क्रमशः श्वेत, कृष्ण, अरुण (लाल), पीत (पीली), शर्करा (कंकरीली), अश्ममयी (पथरीली), और सुवर्णमयी हैं । इस प्रकार रसातल का धरातल कठोर और अश्ममयी है, जो वहाँ निवास करने वाले असुरों की कठोर, निष्ठुर और युद्धप्रिय प्रकृति के सर्वथा अनुकूल है।
| श्रीमद्भागवत पुराण | छठा | बिल-स्वर्ग (भव्य गुफाएं) | दैत्य, दानव, पणि, निवातकवच |
| विष्णु पुराण | छठा (गभस्तिमत्/महातल के संदर्भ में) | अश्ममयी (पथरीली) / कंकरीली | दानव, नाग, राक्षस |
| ब्रह्मांड पुराण | छठा | पथरीली / कंकड़ युक्त | कालेय, पणि |
| वायु पुराण | छठा | पथरीली | पुलोमा, वासुकि (कुछ वर्णनों में) |
यद्यपि रसातल का धरातल कठोर है, तथापि वहाँ का स्वरूप अत्यंत मायावी और भव्य है। महान असुर वास्तुकार 'मय दानव' ने इन अधोलोकों में अत्यंत भव्य नगरों, गगनचुंबी महलों, विस्तृत प्रांगणों और स्वर्ण जड़ित मंदिरों का निर्माण किया है । रसातल के महल मूल्यवान रत्नों, स्फटिकों और स्वर्ण से निर्मित हैं। वहाँ के उद्यान अत्यंत सुंदर हैं, जिनमें ऐसे कल्पवृक्ष लगे हैं जो संकल्प करते ही मनचाहा फल प्रदान करते हैं। वहाँ की झीलें और सरोवर दिव्य कमलों से भरे रहते हैं और कोकिलों की मधुर ध्वनि से गूंजते रहते हैं । महर्षि नारद ने एक बार इन लोकों का भ्रमण करने के पश्चात देवलोक में जाकर देवराज इंद्र और अन्य देवताओं के समक्ष स्वीकार किया था कि पाताल और रसातल का सौंदर्य, संपदा और विलासिता देवराज इंद्र के स्वर्ग से भी कहीं अधिक बढ़कर है । वहाँ रहने वाली असुर कन्याओं और दानव रमणियों का सौंदर्य इतना सम्मोहक है कि वह महान तपस्वियों के मन को भी विचलित कर सकता है।
रसातल का वातावरण: प्रकाश, काल और मायावी ऐश्वर्य
रसातल का वातावरण अत्यंत रहस्यमयी और भौतिक आनंद की पराकाष्ठा है। चूँकि यह लोक भूमंडल के अत्यंत नीचे स्थित है, अतः वहाँ सूर्य या चंद्रमा की किरणें प्रवेश नहीं कर सकतीं। परंतु सूर्य और चंद्र के प्रकाश का अभाव होने पर भी वहाँ रत्ती भर भी अंधकार नहीं है । श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को बताते हैं कि इन बिल-स्वर्गों में सूर्य का प्रकाश न पहुँचने के कारण समय का प्राकृतिक विभाजन (दिन और रात) नहीं होता ।
दिन और रात न होने के कारण वहाँ काल (समय) से उत्पन्न होने वाला भय भी नहीं रहता। वहाँ प्रकाश का मुख्य स्रोत उन महानागों के फनों पर सुशोभित भव्य और दिव्य मणियां हैं, जिनकी असीम और अलौकिक चमक रसातल और पाताल के संपूर्ण अंधकार को नष्ट कर देती है । यह प्रकाश सूर्य के प्रकाश की भांति तीक्ष्ण, चुभने वाला या ताप उत्पन्न करने वाला नहीं होता, बल्कि यह एक अत्यंत शीतल, सुखदायक और मनोहारी प्रकाश होता है जो वहाँ के निवासियों को सर्वदा आनंदित रखता है। विष्णु पुराण में भी यह वर्णित है कि रसातल में मणियों के प्रकाश के कारण दिन में सूर्य की ऊष्मा कष्ट नहीं देती और रात्रि में चंद्रमा की शीतलता का अनुभव नहीं होता, अपितु एक समशीतोष्ण और सर्वदा सुखद तापमान बना रहता है ।
सबसे आश्चर्यजनक विशेषता यह है कि रसातल में रहने वाले असुरों और दानवों को कभी बुढ़ापा नहीं आता । उनके शरीर में कभी झुर्रियां नहीं पड़तीं, उनके बाल कभी सफेद नहीं होते, और उनके शरीर से पसीने की दुर्गंध नहीं आती। वे बुढ़ापे के कारण होने वाली शारीरिक थकान, व्याधि या ऊर्जा की कमी से सर्वथा मुक्त रहते हैं। उन्हें मृत्यु का कोई साधारण भय नहीं होता। उनकी मृत्यु केवल भगवान श्री हरि के सुदर्शन चक्र या उनके द्वारा निर्धारित काल के आने पर ही होती है । यह स्थिति रसातल को स्वर्ग से भी अधिक भोग-विलास का केंद्र बनाती है, जहाँ असुर सुरा और उत्तम व्यंजनों का भोग करते हुए समय की गति को भी भूल जाते हैं । वहाँ के निवासी पूर्णतः भौतिकतावादी हैं, जो असीम संपदा के स्वामी होने पर भी आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वरीय भक्ति से नितांत शून्य हैं। उनकी चेतना केवल अपनी शारीरिक शक्ति और भौतिक ऐश्वर्य तक ही सीमित रहती है।
रसातल के प्रमुख निवासी: दैत्य, दानव और पणि
रसातल मुख्य रूप से उन असुरों, दैत्यों और दानवों का आश्रय स्थल है, जो जन्म से ही देवताओं के कट्टर शत्रु (विबुध-प्रत्यनीक) हैं । श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में रसातल के निवासियों का अत्यंत विशद और स्पष्ट वर्णन किया गया है। यहाँ दिति के पुत्र (दैत्य) और दनु के पुत्र (दानव) निवास करते हैं । शास्त्रों में विशेष रूप से चार अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली असुर प्रजातियों का उल्लेख रसातल के निवासियों के रूप में किया गया है: पणि, निवातकवच, कालेय, और हिरण्यपुरवासी ।
पणि वह असुर प्रजाति है जिसका उल्लेख अत्यंत प्राचीन ऋग्वेद से लेकर परवर्ती पुराणों तक में मिलता है। वे अपनी मायावी शक्तियों, धन-संपदा के संचय और देवताओं के साथ निरंतर शत्रुता के लिए प्रसिद्ध हैं । निवातकवच (जिनका कवच इतना अभेद्य है कि वायु भी जिसे पार नहीं कर सकती) कश्यप और दिति के वंशज हैं। महाभारत और अन्य पुराणों के अनुसार इनकी संख्या तीन करोड़ के लगभग बताई गई है और ये रसातल के महासागरों की गहराइयों में स्थित 'हिरण्यपुर' नामक स्वर्णमयी और मायावी नगर में निवास करते हैं । कालेय भी अत्यंत क्रूर दानव हैं जो युद्ध कला में निपुण हैं और निवातकवचों के प्रबल सहयोगी हैं। हिरण्यपुरवासी वे महादानव हैं जो ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर हिरण्यपुर नामक उस अजेय नगर में रहते हैं, जिसे स्वयं मय दानव या ब्रह्मा ने निर्मित किया था ।
ततोऽधस्ताद्रसातले दैतेया दानवा: पणयो नाम निवातकवचा: कालेया हिरण्यपुरवासिन इति विबुधप्रत्यनीका उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो भगवत: सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसा प्रतिहतबलावलेपा बिलेशया इव वसन्ति ये वै सरमयेन्द्रदूत्या वाग्भिर्मन्त्रवर्णाभिरिन्द्राद्बिभ्यति ॥ 30 ॥
इस श्लोक (5.24.30) का शास्त्रीय अर्थ इस प्रकार है: महातल नामक लोक के नीचे 'रसातल' स्थित है। इस लोक में दिति के पुत्र (दैत्य) और दनु के पुत्र (दानव) निवास करते हैं। इन असुरों के विशेष नाम पणि, निवातकवच, कालेय, और हिरण्यपुरवासी हैं। 'विबुधप्रत्यनीका:' अर्थात् ये सभी असुर जन्म से ही देवताओं के घोर विरोधी और जन्मजात शत्रु हैं। 'उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो' अर्थात् ये अपनी उत्पत्ति से ही अत्यंत बलवान (महौजस) और अत्यधिक क्रूर तथा दुस्साहसी (महासाहसी) हैं। यद्यपि ये अत्यंत शक्तिशाली हैं और अपने बल पर अत्यधिक गर्व करते हैं, परंतु 'भगवत: सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसा प्रतिहतबलावलेपा' अर्थात् जो भगवान समस्त लोकों के लिए मंगलकारी हैं, उन श्री हरि विष्णु के सुदर्शन चक्र के अत्यंत उग्र तेज के द्वारा इनके शारीरिक बल का घमंड और शक्ति हमेशा कुचल दी जाती है।
अपने इसी टूटे हुए अहंकार और भगवान के सुदर्शन चक्र के डर के कारण ये 'बिलेशया इव वसन्ति' अर्थात् सर्पों के समान बिलों (गहरी गुफाओं) में छिपकर रहने को विवश हैं । इसके अतिरिक्त, 'ये वै सरमयेन्द्रदूत्या वाग्भिर्मन्त्रवर्णाभिरिन्द्राद्बिभ्यति' अर्थात् देवराज इंद्र की दूती 'सरमा' नामक स्त्री जब एक विशेष मंत्र के वर्णों से युक्त वाक्यों (शाप) का उच्चारण करती है, तो ये महापराक्रमी असुर भी इंद्र से अत्यंत भयभीत हो जाते हैं । यह श्लोक रसातल की संपूर्ण भू-राजनीति को स्पष्ट करता है कि यह लोक बलवानों का लोक है, परंतु ईश्वरीय सत्ता और उनके अस्त्रों के समक्ष वे महाबलवान असुर भी भयभीत सर्पों के समान छिपकर रहने को विवश हैं।
रसातल का अधिपति और प्रशासकीय व्यवस्था
रसातल की प्रशासकीय व्यवस्था अन्य लोकों की भांति किसी एक केंद्रीकृत शासक के अधीन नहीं है। जहाँ सुतल लोक में भगवान विष्णु के परम भक्त राजा बलि का निर्विवाद शासन है , और पाताल लोक में नागराज वासुकि नागों पर शासन करते हैं , वहीं रसातल में कोई एक सर्वमान्य अधिपति नहीं है। यह लोक स्वतंत्र, उग्र और युद्धप्रिय असुर कबीलों का निवास है, जो अपनी-अपनी मायावी नगरियों (जैसे हिरण्यपुर) के अधिपति हैं। ये निवातकवच, पणि और कालेय किसी देवता या शासक के अधीन रहना स्वीकार नहीं करते।
तथापि, कुछ पुराणों, विशेषकर वायु पुराण और शिव पुराण में कल्प भेद के कारण रसातल के शासकों का अलग रूप प्रस्तुत किया गया है। वायु पुराण के अनुसार, रसातल के कुछ क्षेत्रों पर प्रह्लाद और हेमका जैसे महान असुरों का आधिपत्य भी रहा है । शिव पुराण में तारकासुर और उसके वंशजों को भी रसातल के विशिष्ट क्षेत्रों का स्वामी बताया गया है । परंतु श्रीमद्भागवत पुराण स्पष्ट करता है कि इन असुरों की स्वच्छंदता पर एकमात्र अंकुश भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का है । सुदर्शन चक्र का तेज इस लोक में निरंतर एक ईश्वरीय प्रशासक का कार्य करता है, जो इन असुरों को रसातल की सीमाओं से बाहर जाकर ब्रह्मांडीय व्यवस्था को भंग करने से रोकता है।
रसातल से संबंधित महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं और प्रसंग
रसातल का उल्लेख सनातन शास्त्रों की कई प्रमुख घटनाओं और कथाओं में एक केंद्रीय स्थल के रूप में हुआ है। इनमें से चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण कथाएं नीचे विस्तार से प्रस्तुत की गई हैं:
देवशुनी सरमा और पणियों का संवाद (ऋग्वेद एवं पुराण)
रसातल के वर्णन में देवराज इंद्र की दूती 'सरमा' और 'पणि' असुरों का प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका मूल स्रोत ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 108) है और जिसे बाद में श्रीमद्भागवत, वराह पुराण, जैमिनीय ब्राह्मण और बृहद्देवता जैसे ग्रंथों में विस्तार दिया गया है । कथा के अनुसार, प्राचीन काल में 'पणि' नामक असुर प्रजाति, जो रसातल में निवास करती थी और धन-संपदा संचय करने में निपुण थी, ने देवलोक पर आक्रमण कर देवताओं की दिव्य गौओं (गायों) का अपहरण कर लिया। इन असुरों ने उन गौओं को रसा नदी के पार, रसातल की एक अत्यंत गुप्त, दुर्गम और अंधकारमयी गुफा में छिपा दिया ।
देवताओं ने अपनी चुराई गई गौओं की खोज के लिए सबसे पहले 'सुपर्ण' (गरुड़ या सूर्य-पक्षी) को भेजा। परंतु रसातल पहुँचने पर पणियों ने सुपर्ण को धन और दूध-दही का लालच देकर भ्रष्ट कर दिया, जिसके कारण वह बिना कोई सूचना दिए वापस लौट आया। देवराज इंद्र ने क्रोधित होकर सुपर्ण का गला घोंट दिया जिससे उसने पणियों द्वारा दिया गया दूध और दही उगल दिया । तत्पश्चात, इंद्र ने अपनी परम विश्वासपात्र दूती और कुत्तों की आदि माता 'सरमा' (देवशुनी) को इस कार्य के लिए नियुक्त किया ।
सरमा ने अत्यंत दुर्गम मार्गों और रसा नदी की भयंकर जलधाराओं को पार कर रसातल में प्रवेश किया। वहाँ उसने पणियों के गुप्त ठिकानों और छिपी हुई गौओं को खोज निकाला। जब पणियों ने सरमा को देखा, तो उन्होंने उसे भी गायों के दूध और अपार धन-संपत्ति का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया । पणियों ने सरमा से प्रस्ताव किया कि वह इंद्र को छोड़कर रसातल में उनके साथ बहन बनकर रहे और उस अपार संपदा का उपभोग करे। परंतु सरमा अत्यंत निष्ठावान और कर्तव्यपरायण थी। उसने पणियों के सभी भौतिक प्रस्तावों को दृढ़तापूर्वक ठुकरा दिया (ऋग्वेद 10.108.10 - नाहं वेद भ्रातृत्वं नो स्वसृत्वमिन्द्रो विदुरङ्गिरसश्च घोराः) और उन्हें चेतावनी दी कि वे शीघ्र ही गौओं को मुक्त कर दें, अन्यथा इंद्र और अंगिरस ऋषि आकर उनका समूल विनाश कर देंगे ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, सरमा ने जिन मंत्र-रूपी वाक्यों का प्रयोग कर पणियों को शाप दिया, उससे पणियों के भीतर देवराज इंद्र का ऐसा भीषण भय बैठ गया जो आज भी रसातल के निवासियों के मन में व्याप्त है । रसातल के पणि और अन्य सर्प-समान असुर आज भी सरमा की उसी गूँजती हुई मंत्रमयी आवाज़ से खौफ खाते हैं, और इसी कारण वे अपनी गुफाओं से बाहर निकलने का दुस्साहस नहीं कर पाते ।
यज्ञ-वराह द्वारा रसातल से भू-उद्धार (मत्स्य एवं वराह पुराण)
रसातल का सबसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय प्रसंग भगवान विष्णु के तृतीय अवतार 'वराह अवतार' से जुड़ा है। मत्स्य पुराण, वराह पुराण, भागवत पुराण और विष्णु पुराण में इस घटना का अत्यंत विशद और रोमांचक वर्णन मिलता है। सृष्टि के आरंभ में, हिरण्याक्ष नामक महापराक्रमी दैत्य ने ब्रह्मांडीय व्यवस्था को भंग कर दिया। उसने पृथ्वी (भूमि देवी) को उसके मूल खगोलीय स्थान से च्युत कर दिया और उसे ब्रह्मांडीय जल के भीतर 'रसातल' की घोर गहराइयों में ले जाकर छिपा दिया । पृथ्वी रसातल के कीचड़ और असीम जलराशि में डूबने लगी और एक अत्यंत दुर्बल गाय की भांति असहाय हो गई। जब पृथ्वी पूर्णतः जलमग्न होने लगी, तब उसने भगवान नारायण की स्तुति की ।
शत योजन विस्तीर्णमुच्छ्रितं द्विगुणं ततः। नील जीमूत संकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥ गिरिसंहननं भीमं श्वेत तीक्ष्णाग्र दंष्ट्रिणम्। विद्युदग्नि प्रतीकाशं आदित्यसम तेजसम्॥ पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्त शार्दूलगामिनम्। पीनोन्नत कटीदेशे वृषलक्षण पूजितम्। रूपमास्थाय विपुलं वाराहमजितो हरिः॥
अर्थात्, वह वराह रूप सौ योजन चौड़ा और दो सौ योजन ऊँचा था। वे एक विशाल नीले पर्वत के समान थे, उनकी गर्जना बादलों की गड़गड़ाहट के समान थी, और उनके श्वेत दांत अत्यंत तीक्ष्ण थे। उनका तेज सूर्य, अग्नि और विद्युत (बिजली) के समान चकाचौंध करने वाला था। उनके कंधे अत्यंत पुष्ट थे और उनकी चाल एक उन्मत्त बाघ (शार्दूल) या वृषभ के समान थी।
पुराणों में इस वराह रूप को 'यज्ञ-वराह' कहा गया है, क्योंकि उनके शरीर का प्रत्येक अंग वैदिक यज्ञ के विभिन्न तत्वों का भौतिक स्वरूप था। 'वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चुतिभूषणः' - अर्थात् उनके चार पैर चारों वेदों के प्रतीक थे, उनके तीक्ष्ण दांत यज्ञ के स्तंभ (यूप) थे, उनका मुख यज्ञ कुंड था, उनकी जिह्वा अग्नि थी, उनके शरीर के बाल कुशा घास थे, उनकी आंखें दिन और रात थीं, उनके कान के आभूषण छह वेदांग थे, उनके द्वारा किया गया घूंट घी की आहुति (घृताहुति) था, और उनकी गंभीर गर्जना सामवेद के मंत्रों के समान थी । उनके कंधे वेदों की वेदी थे और उनका हृदय यज्ञ की दक्षिणा था।
भगवान यज्ञ-वराह ने ब्रह्मांडीय जल को चीरते हुए रसातल की असीम गहराइयों में प्रवेश किया। रसातल के घोर अंधकार और कीचड़ में उन्होंने अपनी तीक्ष्ण घ्राण शक्ति से पृथ्वी का पता लगाया। रसातल में ही उनका सामना हिरण्याक्ष और उसके दैत्य सैनिकों से हुआ। भगवान ने अपने थूथन और खुरों के प्रहार से रसातल में उपस्थित उन लाखों दैत्यों को कुचल डाला जो पृथ्वी को बंधक बनाए हुए थे। एक अत्यंत भयंकर युद्ध के पश्चात भगवान ने हिरण्याक्ष का वध किया । तत्पश्चात, उन्होंने रसातल के पंक में फंसी हुई पृथ्वी (भू-देवी) को अपने विशाल और श्वेत दांतों (दंष्ट्रा) के अग्रभाग पर धारण किया और एक ही विशाल छलांग में रसातल से ऊपर उठकर ब्रह्मांडीय जल के पृष्ठ पर उसे पुनः स्थापित कर दिया । यह घटना सिद्ध करती है कि रसातल वह निम्नतम ब्रह्मांडीय आधार है जहाँ पृथ्वी जैसी विशाल खगोलीय संरचना भी विलीन हो सकती है।
माता सुरभि और क्षीर सागर की उत्पत्ति (महाभारत, उद्योग पर्व)
महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व (अध्याय 102) में रसातल का एक अत्यंत भव्य, शांतिपूर्ण और पवित्र वर्णन प्राप्त होता है, जो इसे केवल उग्र असुरों का निवास न मानकर एक दिव्य स्थल के रूप में भी स्थापित करता है। यह प्रसंग तब आता है जब देवराज इंद्र के सारथी 'मातलि' अपनी अत्यंत रूपवती पुत्री 'गुणकेशी' के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश में देवर्षि नारद के साथ स्वर्गलोक से नीचे की ओर प्रस्थान करते हैं । वे विभिन्न लोकों और महासागरों को पार करते हुए पृथ्वी के नीचे सातवें स्तर (यहाँ रसातल को निचले स्तरों के क्रम में वर्णित किया गया है) पर पहुँचते हैं ।
देवर्षि नारद मातलि को रसातल का परिचय देते हुए बताते हैं कि यह पृथ्वी के नीचे का अत्यंत रहस्यमयी और अलौकिक लोक है। इसी रसातल में समस्त गौओं (गायों) की आदि माता 'सुरभि' निवास करती हैं । कथा के अनुसार, जब प्रजापति ब्रह्मा ने अमृत का अत्यधिक पान कर लिया, तो तृप्ति के पश्चात उनके मुख से जो दिव्य स्राव (अमृत का झाग) निकला, उसी से माता सुरभि की उत्पत्ति हुई । सुरभि माता रसातल में रहकर निरंतर उस दिव्य दूध का स्राव करती हैं जो पृथ्वी की सभी श्रेष्ठ वस्तुओं का सार है और जिसमें छहों प्रकार के रसों का अद्वितीय स्वाद समाहित है ।
माता सुरभि के उसी अथाह दूध की एक विशाल धारा रसातल के धरातल पर गिरी, जिससे उस परम पवित्र 'क्षीर सागर' (दूध के महासागर) का निर्माण हुआ । क्षीर सागर के चारों ओर अत्यंत कठोर तपस्या करने वाले 'फेनप' (केवल झाग पीने वाले) नामक महर्षि निवास करते हैं। ये मुनि किसी भी अन्य अन्न या जल का ग्रहण नहीं करते, अपितु केवल उस दूध के झाग (फेन) पर ही जीवित रहते हैं। उनका तप इतना उग्र और पवित्र है कि स्वयं देवता भी उनके तेज से भयभीत रहते हैं ।
नारद जी मातलि को यह भी बताते हैं कि रसातल में ही माता सुरभि के अंश से चार अन्य दिव्य गौओं का जन्म हुआ, जो ब्रह्मांड की चारों दिशाओं का भार वहन करती हैं (इन्हें दिक्पाली कहा जाता है)। पूर्व दिशा का भार वहन करने वाली गौ 'सुरूपा' (या सौरभी) कहलाती है, दक्षिण दिशा में 'हंसिका' स्थित है, पश्चिम दिशा में (वरुण के क्षेत्र में) 'सुभद्रा' स्थित है, और उत्तर दिशा में (कुबेर के क्षेत्र में) 'सर्व-कामदुघा' (धनु) नामक गौ ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखती है । समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों ने जब मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया था, तो महासागर के जल में माता सुरभि और उनकी इन कन्याओं का दूध भी मिला हुआ था, जिसके प्रभाव से ही अमृत और अन्य दिव्य रत्नों की उत्पत्ति संभव हो सकी ।
रसातल की इस अद्भुत भौतिक सुंदरता, शांति और ऐश्वर्य का गुणगान करते हुए स्वयं रसातल के निवासी एक प्राचीन श्लोक का गान करते हैं, जिसे नारद जी मातलि को सुनाते हैं: "न तो नागों के लोक में, न स्वर्ग में, न विमानों में, और न ही त्रिविष्टप (इंद्र के उच्चतम लोक) में निवास करने में वह सुख और आनंद है, जो इस रसातल में निवास करने में है" । यह विवरण स्पष्ट करता है कि रसातल का केवल एक तामसिक या असुर-बहुल पक्ष ही नहीं है, बल्कि इसका एक अत्यंत दिव्य और पवित्र पक्ष भी है जहाँ सुरभि जैसी देवियाँ और फेनप जैसे तपोनिष्ठ ऋषि निवास करते हैं।
निवातकवचों का वध और हिरण्यपुर का विनाश (महाभारत, वन पर्व)
रसातल से जुड़ा एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और रोमांचक प्रसंग महाभारत के वन पर्व और उद्योग पर्व के संदर्भों में आता है, जहाँ पांडव वीर अर्जुन का सीधा सामना रसातल के अजेय असुरों से होता है। अर्जुन जब स्वर्ग में अपने पिता देवराज इंद्र के पास दिव्यास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करने गए थे, तो उनके प्रवास के अंत में इंद्र ने अर्जुन से गुरु-दक्षिणा के रूप में एक अत्यंत कठिन कार्य करने को कहा । इंद्र ने बताया कि महासागर के तल के नीचे, रसातल के अतल जल के भीतर 'निवातकवच' और 'कालेय' नामक तीन करोड़ महापराक्रमी असुर रहते हैं । निवातकवच वे असुर थे जिनका कवच अभेद्य था और ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदानों के कारण वे देवताओं, यक्षों और गंधर्वों के लिए अवध्य (न मारे जा सकने वाले) हो चुके थे। यहाँ तक कि रावण ने भी एक बार उन पर आक्रमण किया था, परंतु वह भी उन्हें पराजित नहीं कर सका और अंततः उसे उनके साथ संधि करनी पड़ी थी । उनका निवास स्थान 'हिरण्यपुर' (स्वर्ण नगरी) रसातल के जल के भीतर स्थित था और वह अपने आप में एक अजेय और मायावी दुर्ग था ।
इंद्र की आज्ञा पाकर, अर्जुन देवराज के सारथी मातलि द्वारा संचालित दिव्य रथ पर सवार हुए और महासागर की असीम गहराइयों को चीरते हुए रसातल के धरातल पर पहुँचे । वहाँ उन्होंने दैत्यों के उस अद्भुत, मायावी और सर्वसुविधा संपन्न नगर 'हिरण्यपुर' को देखा, जो चार विशाल द्वारों और गगनचुंबी अट्टालिकाओं से युक्त था। यह नगर रत्नों, स्फटिकों और अद्भुत वृक्षों से सुशोभित था, जहाँ असुर आनंदपूर्वक निवास कर रहे थे । अर्जुन के रथ की भीषण गर्जना सुनकर दानवों को लगा कि स्वयं इंद्र उन पर आक्रमण करने आए हैं। अर्जुन ने अपने देवदत्त शंख की प्रलयंकारी ध्वनि की, जिससे रसातल की गुफाएं गूंज उठीं और दानवों में त्राहि-त्राहि मच गई ।
निवातकवचों ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अर्जुन पर तीक्ष्ण बाणों, लौह अस्त्रों, गदाओं और त्रिशूलों की भारी वर्षा कर दी। उन्होंने रसातल के उस अंधकारमय वातावरण में पाषाण (पत्थर) और मायावी अंधकार उत्पन्न कर दिया, जिससे एक बार तो मातलि भी भ्रमित हो गए । परंतु अर्जुन ने तनिक भी विचलित न होते हुए अपने दिव्यास्त्रों के प्रभाव से उनकी संपूर्ण माया को नष्ट कर दिया। अंततः, इंद्र से प्राप्त वज्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हुए अर्जुन ने एक भीषण संग्राम में उन तीन करोड़ निवातकवचों और कालेयों का समूल नाश कर दिया और हिरण्यपुर की मायावी नगरी को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया । यह प्रसंग यह प्रमाणित करता है कि रसातल वह सुरक्षित भूमिगत आश्रय था जहाँ दैत्य ब्रह्मांड की शक्तियों से बचकर अपनी सेनाएं तैयार करते थे।
रसातल में गमन के शास्त्रीय कारण और दृष्टांत
पुराणों और महाकाव्यों में ऐसे कई दृष्टांत मिलते हैं जहाँ विशेष कर्मों या शापों के कारण किसी व्यक्ति को रसातल में जाना पड़ा। महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 6, श्लोक 34) के अनुसार, महान सत्यवादी राजा उपरिचर वसु को रसातल में गिरना पड़ा था । कथा के अनुसार, एक बार महर्षियों और देवताओं के बीच यज्ञ में पशुबलि को लेकर एक महान विवाद उत्पन्न हो गया। ऋषि पशुबलि के विरुद्ध थे जबकि देवता इसके पक्ष में थे। दोनों पक्षों ने राजा वसु को मध्यस्थ बनाया, क्योंकि वे अत्यंत धर्मज्ञ माने जाते थे। राजा वसु ने पक्षपात करते हुए देवताओं के समर्थन में असत्य निर्णय दे दिया। इस एक झूठ के कारण राजा वसु को ऋषियों का भयंकर शाप मिला और वे अपने दिव्य विमान से सीधे पृथ्वी के नीचे रसातल में जा गिरे । यह घटना स्पष्ट करती है कि धर्म का अतिक्रमण करने पर उच्च लोकों से सीधे अधोलोक (रसातल) में पतन हो सकता है।
एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण खगोलीय और आध्यात्मिक दृष्टांत महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व (अध्याय 5, श्लोक 28) में प्राप्त होता है। जब यदुवंश का विनाश हुआ और श्री कृष्ण ने अवतार लीला समाप्त करने का निर्णय लिया, तब उनके अग्रज भगवान बलराम (बलभद्र) प्रभास तीर्थ में समुद्र तट पर योग समाधि में बैठ गए। बलराम जी स्वयं भगवान अनंत शेष (नागराज) के अवतार थे। समाधि की अवस्था में उनके मुख से एक अत्यंत विशाल और दिव्य श्वेत नाग प्रकट हुआ, जिसने महासागर में प्रवेश किया और सीधे रसातल की ओर प्रस्थान किया । वहाँ वरुण और अन्य प्रमुख नागों ने उनका स्वागत किया। यह घटना सिद्ध करती है कि रसातल और उसके नीचे स्थित पाताल (नागलोक) अनंत शेष का मूल ब्रह्मांडीय निवास है, जहाँ वे अपनी योगनिद्रा में लीन रहते हैं।
विभिन्न पुराणों में रसातल का तुलनात्मक विवेचन
सनातन धर्म के विभिन्न पुराणों में ब्रह्मांड की संरचना का मूल ढांचा पूर्णतः समान होने पर भी, लोकों के क्रम, उनकी भू-प्रकृति, और वहाँ के निवासियों के संबंध में कुछ सूक्ष्म भिन्नताएं पाई जाती हैं। विद्वानों के अनुसार, ये भिन्नताएं विरोधाभासी नहीं हैं, अपितु 'कल्प भेद' (विभिन्न सृष्टिकाल) का परिणाम हैं। प्रत्येक कल्प में ब्रह्मा जी की सृष्टि की व्यवस्था में आंशिक परिवर्तन होते हैं, जो इन ग्रंथों में परिलक्षित होते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, रसातल छठा अधोलोक है और इसका अंतिम या सातवां लोक पाताल है। भागवत के अनुसार रसातल में दिति और दनु के पुत्र (पणि, निवातकवच और कालेय) रहते हैं । यहाँ रसातल और पाताल को स्पष्ट रूप से अलग-अलग लोक माना गया है, जहाँ पाताल विशेष रूप से नागराज वासुकि का निवास है।
विष्णु पुराण (अंश 2, अध्याय 5) में भी पृथ्वी के नीचे सात लोकों का वर्णन है, परंतु वहाँ महर्षि पराशर ने मैत्रेय को जो सूची दी है, उसमें लोकों के नाम इस प्रकार हैं: अतल, वितल, निताल, गभस्तिमत्, महातल, सुतल और पाताल । यद्यपि यहाँ 'रसातल' शब्द का स्पष्ट उल्लेख मूल सूची में नहीं है, परंतु विष्णु पुराण के अन्य अध्यायों और उसके टीकाकारों के अनुसार 'गभस्तिमत्' या 'निताल' ही रसातल के दूसरे नाम हैं। विष्णु पुराण भी यह मानता है कि इन सातों लोकों में दैत्य, दानव और नाग रहते हैं और इनकी भूमि विभिन्न रंगों की है ।
ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण में रसातल को स्पष्ट रूप से छठा लोक माना गया है। वायु पुराण के अनुसार रसातल की मिट्टी कंकड़-पत्थर वाली है । इसके अतिरिक्त, वायु पुराण और शिव पुराण में कुछ विशिष्ट असुरों को रसातल का शासक बताया गया है। वायु पुराण के अनुसार रसातल के कुछ भागों पर प्रह्लाद का अधिकार रहा है, जबकि भागवत में प्रह्लाद के पौत्र बलि को सुतल का राजा बताया गया है ।
| श्रीमद्भागवत पुराण | छठा लोक | बिल-स्वर्ग (रत्नजड़ित गुफाएं) | दैत्य, दानव, पणि, निवातकवच, कालेय |
| विष्णु पुराण | छठा (गभस्तिमत् के समतुल्य) | अश्ममयी (पथरीली) | दानव, यक्ष, महान नाग |
| ब्रह्मांड पुराण | छठा लोक | कंकड़-पत्थर युक्त | कालेय, पणि, असुर |
| वायु पुराण | छठा लोक | पथरीली भूमि | पुलोमा, प्रह्लाद (कुछ वर्णनों में), वासुकि |
| शिव पुराण | छठा लोक | अश्ममयी | तारकासुर के वंशज, दानव |
मत्स्य पुराण रसातल को ब्रह्मांडीय जल के एक हिस्से के रूप में अधिक चित्रित करता है, जहाँ हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को छिपाया था और वराह अवतार ने प्रवेश किया था ।
इस प्रकार, सभी प्रामाणिक पुराण इस बात पर पूर्ण रूप से एकमत हैं कि रसातल एक वास्तविक, भूमिगत, और भौतिक रूप से अति-संपन्न लोक है। यह कोई अमूर्त विचार नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड की वास्तुकला का एक ठोस और विस्तृत खंड है। यह देवताओं की सत्ता को चुनौती देने वाले शक्तिशाली दानवों और महानागों का सुरक्षित घर है, जो सूर्य के प्रकाश से वंचित होने पर भी नागों की मणियों के दिव्य प्रकाश से प्रकाशित रहता है। प्रामाणिक शास्त्रों के ये विशद और सूक्ष्म वर्णन रसातल को ब्रह्मांड की एक अद्भुत, भौतिकता से परिपूर्ण परंतु असीम रहस्यों से भरी दुनिया के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं।