महातल लोक: प्रामाणिक हिंदू शास्त्रों के आधार पर एक विस्तृत और गहन अन्वेषण
ब्रह्मांडीय संरचना में चतुर्दश भुवनों का स्वरूप और महातल का स्थान
सनातन हिंदू धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, विशेषकर पुराणों और स्मृतियों में ब्रह्मांड (ब्रह्मांडीय अंड) की संरचना का अत्यंत सूक्ष्म, गणितीय और व्यवस्थित वर्णन प्राप्त होता है। वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत संपूर्ण सृष्टि को मुख्य रूप से चौदह लोकों (चतुर्दश भुवन) में विभाजित किया गया है । 'लोक' शब्द संस्कृत की 'लोक्' (दर्शने) धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका तात्पर्य उस विशिष्ट आयाम या चेतना के स्तर से है जहाँ जीवात्माएं अपने संचित और प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जीवन का अनुभव करती हैं । इन चौदह लोकों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है: ऊर्ध्व लोक (ऊपर के सात लोक) और अधोलोक (नीचे के सात लोक) । पृथ्वी (भूर्लोक) को इस ब्रह्मांडीय संरचना का मध्य बिंदु माना गया है, जहाँ जीवात्मा को कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है, जबकि अन्य लोक मुख्य रूप से पूर्व जन्मों के विशिष्ट कर्मों का फल भोगने के विशुद्ध स्थान हैं ।
पृथ्वी से ऊपर के सात लोकों को 'व्याहृतियां' कहा जाता है, जिनमें क्रमशः भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सर्वोच्च सत्यलोक (ब्रह्मलोक) आते हैं । इसके विपरीत, पृथ्वी के नीचे सात अधोलोक स्थित हैं, जिन्हें पुराणों में 'पाताल' या 'बिल-स्वर्ग' (भूमिगत स्वर्ग) की संज्ञा दी गई है । ये सात अधोलोक क्रमशः इस प्रकार हैं: अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल । इस विस्तृत ब्रह्मांडीय पदानुक्रम में, 'महातल' नीचे से तीसरा और पृथ्वी से नीचे की ओर जाने पर पांचवां लोक है । महातल एक अत्यंत रहस्यमय, भौतिक रूप से अत्यधिक समृद्ध और शक्तिशाली नागों का निवास स्थान है, जो अपनी अद्वितीय संरचना और ब्रह्मांडीय भूमिका के लिए शास्त्रों में विख्यात है।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण शास्त्रीय तथ्य को स्पष्ट करना आवश्यक है कि पुराणों में इन अधोलोकों (पातालों) को 'नरक' (दण्ड भोगने का स्थान) से सर्वथा भिन्न बताया गया है । श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, नरक लोक पाताल से भी नीचे, गर्भोदक सागर के ठीक ऊपर और दक्षिण दिशा में पितृलोक के समीप स्थित हैं, जहाँ घोर पापी जीवात्माएं यमराज के कठोर दंड का विधान भुगतती हैं । श्रीमद्भागवत पुराण (5.26.) में अट्ठाईस प्रकार के नरकों का स्पष्ट वर्णन है, जैसे तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, कुम्भीपाक, असिपत्रवन आदि, जो विशुद्ध रूप से यातना के स्थान हैं । इसके विपरीत, महातल सहित सभी सात पाताल 'बिल-स्वर्ग' हैं, जहाँ के निवासियों को स्वर्ग के देवताओं से भी अधिक भौतिक सुख, संपदा, विलासिता और ऐश्वर्य उपलब्ध है । महातल की यह विशेषता इसे ब्रह्मांड के सबसे अद्भुत लोकों में से एक बनाती है, जहाँ भौतिक सुखों की चरम सीमा है, किंतु आध्यात्मिक मुक्ति या ईश्वरीय प्रेम का नितांत अभाव है ।
महातल लोक की भौगोलिक स्थिति एवं योजन आधारित मापन
शास्त्रों में ब्रह्मांड की दूरियों, ग्रहीय कक्षाओं और लोकों के विस्तार का मापन 'योजन' नामक इकाई से किया गया है । एक योजन को आधुनिक गणना के अनुसार लगभग 8 मील या 13 किलोमीटर के समकक्ष माना जाता है । श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवें स्कंध के चौबीसवें अध्याय में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को पाताल लोकों की भौगोलिक स्थिति का अत्यंत सटीक और गणितीय वर्णन देते हुए कहते हैं कि पृथ्वी के नीचे सात भू-विवर (बिल या विशाल गुफाएं) हैं, जो एक दूसरे के ठीक नीचे समानांतर रूप से स्थित हैं ।
इस संस्कृत श्लोक का शब्दशः अन्वय और अर्थ इस प्रकार है: शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि हे राजन्! जिस प्रकार मैंने पहले पृथ्वी (भूमंडल) के विस्तार और स्थिति का वर्णन किया है, उसी प्रकार इस पृथ्वी के नीचे (अवनेः अपि अधस्तात्) सात भू-विवर (भूमिगत क्षेत्र) हैं। ये सातों विवर एक-दूसरे से दस-दस हजार योजन (योजनायुतान्तरेण) की दूरी पर स्थित हैं। इन सभी लोकों की लंबाई और चौड़ाई (आयाम-विस्तारेण) समान रूप से कल्पित (उपकॢप्ता) है। इनके नाम अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं ।
इस शास्त्रीय गणना के क्रम के अनुसार, पृथ्वी की सतह से नीचे की ओर जाने पर 10,000 योजन की गहराई पर अतल लोक आता है। अतल से 10,000 योजन नीचे (अर्थात पृथ्वी से 20,000 योजन नीचे) वितल लोक है। वितल के 10,000 योजन नीचे सुतल लोक है, जहाँ दैत्यराज बलि निवास करते हैं। सुतल से 10,000 योजन नीचे तलातल लोक है। और तलातल लोक से 10,000 योजन नीचे (अर्थात पृथ्वी की सतह से ठीक 50,000 योजन की अगाध गहराई पर) 'महातल' नामक यह रहस्यमय लोक स्थित है । महातल के नीचे 10,000 योजन पर रसातल और उसके भी 10,000 योजन नीचे अंतिम लोक पाताल (जिसे नागलोक भी कहा जाता है) स्थित है 1। इस प्रकार, इन सात पाताल लोकों की कुल गहराई 70,000 योजन (लगभग 5,60,000 मील) है, और महातल इस क्रम में पांचवें स्थान पर विद्यमान है ।
विष्णु पुराण (अंश 2, अध्याय 5) के द्वितीय श्लोक में महर्षि पराशर भी इसी मापन की पुष्टि करते हुए मैत्रेय मुनि से कहते हैं: अर्थात, हे मुनिश्रेष्ठ! ये सातों पाताल एक-दूसरे से दस-दस हजार योजन के विस्तार वाले हैं, जिनमें अतल, वितल, नितल, गभस्तिमत्, महातल, सुतल और सातवां पाताल सम्मिलित हैं ।
इस प्रकार, महातल ब्रह्मांड के निचले हिस्से के मध्य में एक अत्यंत सुरक्षित, सुदृढ़ और विशाल विवर के रूप में विद्यमान है। इसकी विशालता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी लंबाई और चौड़ाई पृथ्वी मंडल के ही समान दस हजार योजन विस्तृत है । यह लोक भौतिक ब्रह्मांड के उस अगाध और अंधकारमय आवरण के भीतर है जहाँ अंतरिक्ष के सूर्य की किरणें प्रवेश नहीं कर सकतीं, फिर भी इसकी अपनी एक विशिष्ट दीप्ति, ऊर्जा और अलौकिक वातावरण है जो इसे निरंतर प्रकाशमान रखता है।
महातल का भौतिक स्वरूप, पर्यावरण एवं वास्तुकला
महातल और अन्य बिल-स्वर्गों के भौतिक स्वरूप और पर्यावरण का वर्णन करते हुए देवर्षि नारद ने इसे देवराज इंद्र के स्वर्ग से भी अधिक सुंदर, आकर्षक और सुखदायक बताया है । विष्णु पुराण (अंश 2, अध्याय 5) के अनुसार, जब देवर्षि नारद एक बार पाताल लोकों का पूर्ण भ्रमण करके स्वर्ग लौटे, तो उन्होंने देवताओं की भरी सभा में यह उद्घोष किया कि पाताल लोक स्वर्ग से भी अधिक मनोहर हैं। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा कौन सा लोक होगा जो पाताल की तुलना कर सके, जहाँ मणियों की चमक से परिपूर्ण नाग निवास करते हैं और जहाँ दैत्यों तथा दानवों की अत्यंत सुंदर कन्याएं विचरण करती हैं ।
महातल की मिट्टी और धरातल का स्वरूप पृथ्वी से सर्वथा भिन्न और अत्यंत विशिष्ट है। विष्णु पुराण के उसी अध्याय में वर्णन आता है कि इन सातों पातालों की भूमि क्रमशः सफेद (श्वेत), काली (कृष्ण), लाल (अरुण), पीली (पीत), रेतीली (शर्करा), पथरीली (अश्म) और स्वर्णमयी (कांचन) है । शिव पुराण की उमा संहिता और अन्य ग्रंथों के अनुसार महातल का धरातल स्वर्ण और मणियों से जटित है, जो इसकी भव्यता को कई गुना बढ़ा देता है ।
चूंकि महातल पृथ्वी से 50,000 योजन नीचे स्थित है, इसलिए यहाँ हमारे सौर मंडल के सूर्य, चंद्र या तारों का प्रकाश किसी भी परिस्थिति में नहीं पहुँचता । किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि महातल अंधकारमय है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण स्पष्ट करते हैं कि महातल में रहने वाले विशाल नागों के फनों पर जो अलौकिक और दिव्य मणियां (नागमणि) सुशोभित हैं, उनकी तीव्र और निर्मल चमक से महातल का संपूर्ण अंधकार नष्ट हो जाता है और वहाँ निरंतर एक सुखद, शीतल प्रकाश फैला रहता है । विष्णु पुराण कहता है कि यह प्रकाश सूर्य की भांति संताप (गर्मी) या ग्रीष्म उत्पन्न नहीं करता, और न ही यह चंद्रमा की भांति शीतलता देता है, बल्कि यह एक ऐसा समशीतोष्ण और आनंददायक प्रकाश है जो निवासियों को असीम सुख प्रदान करता है ।
महातल की संरचनात्मक सुंदरता दानवों के महान वास्तुकार 'मय दानव' (मयासुर) के उत्कृष्ट शिल्प कौशल का परिणाम है । यद्यपि मयासुर का मुख्य निवास तलातल लोक में है, किंतु उसने संपूर्ण बिल-स्वर्गों में अद्वितीय मणि-जटित महलों, अलंकृत भवनों, स्वर्ण और रत्नों से निर्मित विशाल परकोटों, सुंदर उद्यानों और सरोवरों का निर्माण किया है । महातल के सरोवरों का जल अत्यंत निर्मल है और उनमें खिले हुए कल्हार और अन्य कमलों की दिव्य सुगंध पूरे लोक के वातावरण को सुवासित करती है । यहाँ कोकिल आदि पक्षियों का मधुर कलरव सदैव गूंजता रहता है, जो इस लोक को एक स्थायी वसंत ऋतु जैसा अनुभव प्रदान करता है ।
इस लोक का सबसे आश्चर्यजनक और वैज्ञानिक पहलू यहाँ का काल-प्रभाव (समय का प्रभाव) है। चूँकि महातल में सूर्य और चंद्रमा का उदय और अस्त नहीं होता, इसलिए यहाँ दिन और रात का विभाजन पृथ्वी की भांति नहीं होता । फलस्वरूप, यहाँ समय के बीतने का कोई भान नहीं होता। यहाँ के निवासियों को बुढ़ापा (जरा), शारीरिक कमजोरी, पसीना, थकान, दुर्गंध या किसी भी प्रकार का रोग नहीं सताता । वे विशेष दिव्य औषधियों, जड़ी-बूटियों और रसायनों का पान करते हैं, जिससे उनका शरीर सदैव युवा, निरोगी और असीम बलवान बना रहता है । महातल में मृत्यु केवल एक ही रूप में आती है, और वह है भगवान का काल-रूप या उनके वाहन गरुड़ का आक्रमण। जब ब्रह्मांड के महाप्रलय का समय आता है और पाताल के भी नीचे स्थित भगवान संकर्षण (शेषनाग) के मुख से प्रलय की अग्नि उत्पन्न होती है, तभी इन निवासियों के मन में वास्तविक मृत्यु का भय उत्पन्न होता है, अन्यथा वे चिरकाल तक भौतिक सुखों में मग्न रहते हैं ।
महातल के प्रमुख निवासी: क्रोधवश गण के काद्रवेय नाग
महातल मुख्य रूप से अत्यंत विशाल, शक्तिशाली और बहु-फनों वाले नागों (सर्पों) का निवास स्थान है । इन नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप की पत्नी 'कद्रू' से हुई है, इसलिए इन्हें शास्त्रों में 'काद्रवेय' कहा जाता है । श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवें स्कंध के चौबीसवें अध्याय का उन्तीसवां श्लोक महातल के निवासियों का अत्यंत सजीव, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक चित्रण प्रस्तुत करता है:
इस श्लोक का अत्यंत सूक्ष्म और शब्दशः अन्वय इस प्रकार है: तलातल लोक के नीचे (ततोऽधस्तात्) महातल में (महातले) कद्रू के वंशज (काद्रवेयाणां) सर्पों का निवास है। ये सर्प अनेक सिरों या फनों वाले (नैकशिरसां) हैं और 'क्रोधवश' नामक गण या समूह (क्रोधवशो नाम गण:) के अंतर्गत आते हैं। इनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं (कुहकतक्षककालियसुषेणादिप्रधाना)। ये अत्यंत विशाल शरीर वाले और महान भौतिक भोगों में लिप्त रहने वाले (महाभोगवन्त:) हैं। अपनी असीम शक्ति के बावजूद, ये भगवान श्री विष्णु के वाहन (पुरुषवाहाद्), पक्षियों के अधिपति गरुड़ (पतत्त्रिराजाधिपते:) से निरंतर और अनवरत उद्विग्न या भयभीत रहते हैं (अनवरतमुद्विजमाना:)। गरुड़ के इस स्थाई और प्राणघातक भय के बावजूद, ये नाग अपनी पत्नियों, संतानों, मित्रों और कुटुंबियों के संग (स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बसङ्गेन) कभी-कभी अत्यंत प्रमत्त या उन्मत्त होकर (क्वचित्प्रमत्ता) इस लोक में विहार करते हैं (विहरन्ति) ।
इस श्लोक में प्रयुक्त 'क्रोधवश' शब्द का एक बहुत गहरा शास्त्रीय और वंशावलीय अर्थ है। पुराणों और वाल्मीकि रामायण के अनुसार, क्रोधवशा महर्षि कश्यप की एक अन्य पत्नी का भी नाम था, जो दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं । उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी और तीक्ष्ण था, और उनसे उत्पन्न वंशज स्वभाव से अत्यंत उग्र, तीक्ष्ण दांतों वाले और हिंसक माने गए हैं, जिनमें कई प्रकार के राक्षस, मांसाहारी पशु और पक्षी शामिल हैं । महातल में रहने वाले ये काद्रवेय नाग इसी उग्र और क्रोधी स्वभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं । उनका मूल स्वभाव क्रोध, ईर्ष्या और भौतिक आसक्ति से परिपूर्ण होने के कारण ही उनके विशिष्ट समूह को 'क्रोधवश गण' कहा जाता है ।
महातल का यह श्लोक एक महान विरोधाभास को भी उजागर करता है। यद्यपि ये नाग महातल के अतुलनीय ऐश्वर्य, मणियों और सुख का उपभोग करते हैं, तथापि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा निरंतर भय में व्यतीत होता है। वे 'पतत्रिराज' (पक्षियों के राजा) गरुड़ से सदैव उद्विग्न रहते हैं । गरुड़, जो परब्रह्म भगवान विष्णु के नित्य पार्षद और वाहन हैं, सर्पों के प्राकृतिक और ईश्वरीय शत्रु हैं । शास्त्रों का यह दार्शनिक संकेत है कि चाहे प्राणी कितनी भी भौतिक संपत्ति और परिवार के सुख में लिप्त क्यों न हो, यदि उसका स्वभाव 'क्रोधवश' (अहंकार और क्रोध से भरा) है और उसमें ईश्वरीय शरणागति का अभाव है, तो साक्षात् काल या मृत्यु (गरुड़ के रूप में) का भय उसे सदैव सताता रहेगा । यह महातल के जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
महातल के विशिष्ट नाग: तक्षक, कालिय, कुहक और सुषेण का विस्तृत वर्णन
महातल के जिन प्रमुख नागों का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण में शुकदेव गोस्वामी ने किया है, उनका विवरण विभिन्न पौराणिक आख्यानों और इतिहास (महाभारत) में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है:
तक्षक नाग: तक्षक महातल का एक अत्यंत प्रमुख, कुटिल और असीमित शक्तिशाली नागराज है । महाभारत के आदि पर्व के विस्तृत आख्यान के अनुसार, तक्षक का देवराज इंद्र के साथ घनिष्ठ मित्रता का संबंध था और वह प्रारंभ में पृथ्वी पर खांडव वन (वर्तमान दिल्ली के समीप) में अपने परिवार के साथ निवास करता था । जब अग्निदेव की तृप्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन का दाह किया, तो देवराज इंद्र ने तक्षक को बचाने का प्रयास किया। तक्षक उस समय कुरुक्षेत्र गया हुआ था, किंतु उसकी पत्नी की मृत्यु उसी वन-दाह में हो गई । अपने परिवार के विनाश का प्रतिशोध लेने के लिए तक्षक ने अवसर की प्रतीक्षा की। जब अर्जुन के पौत्र, कुरुवंश के महान राजा परीक्षित को एक ऋषि द्वारा सात दिन में तक्षक नाग द्वारा डंसे जाने का शाप मिला, तो तक्षक ने एक ब्राह्मण का वेश धरकर राजा परीक्षित को डसा, जिससे उनकी मृत्यु हो गई ।
इस जघन्य कृत्य के प्रतिशोध स्वरूप राजा परीक्षित के पुत्र, राजा जनमेजय ने 'सर्पसत्र' नामक एक अत्यंत भयंकर महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें मंत्रों की शक्ति से पूरे ब्रह्मांड के सर्प खिंच-खिंच कर अग्नि कुंड में गिरने लगे । तक्षक भयभीत होकर इंद्र के सिंहासन से लिपट गया, किंतु यज्ञ के प्रभाव से इंद्र भी सिंहासन सहित खिंचने लगे। अंततः आस्तीक मुनि (जो माता मनसा देवी के पुत्र थे) ने आकर इस महायज्ञ को रुकवाया और तक्षक के प्राणों की रक्षा की । शास्त्रों के अनुसार, इस घटना के पश्चात नागों और कुरुवंशियों में शांति स्थापित हुई और तक्षक अपनी बची हुई विशाल जाति और परिवार के साथ पृथ्वी छोड़कर महातल लोक में चला गया, जहाँ वह आज भी शांति और समृद्धि के साथ निवास करता है ।
कालिय नाग: कालिय नाग का प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (कृष्ण लीला) में सर्वाधिक प्रसिद्ध है । कालिय नाग मूल रूप से रमणक द्वीप का निवासी था, किंतु पक्षीराज गरुड़ के प्रहारों से भयभीत होकर वह पृथ्वी पर वृंदावन के समीप यमुना नदी के एक विशेष कुण्ड (कालिय दह) में आकर छिप गया था। उसे यह ज्ञात था कि महर्षि सौभरि के एक शाप के कारण गरुड़ उस कुण्ड के समीप नहीं आ सकते । कालिय के भयंकर विष के प्रभाव से यमुना का जल उबलने लगा था और उसके आस-पास के सभी जीव, पक्षी और वृक्ष जलकर नष्ट हो गए थे।
भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में यमुना के उस विषैले जल में प्रवेश कर कालिय नाग का कठोर दमन किया और उसके सहस्त्र फनों पर अपना दिव्य नृत्य किया (जिसे शास्त्रों में 'कालिय-मर्दन' कहा जाता है) । जब कालिय मृत्यु के कगार पर पहुँच गया, तब उसकी पत्नियों (नाग-पत्नियों) ने भगवान की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति की। भगवान के श्रीचरणों के स्पर्श से पवित्र होने के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने उसे यमुना छोड़कर सपरिवार वापस पाताल लोकों (महातल) में जाने का आदेश दिया। भगवान ने कालिय को यह अभय वरदान भी दिया कि उसके सिर पर भगवान के श्रीचरणों के दिव्य चिह्न देखकर गरुड़ अब उस पर कभी आक्रमण नहीं करेंगे । इस प्रकार कालिय नाग महातल में ईश्वरीय कृपा का एक अनूठा उदाहरण बन गया।
कुहक और सुषेण नाग: श्रीमद्भागवत और ब्रह्मांड पुराण में उल्लिखित कुहक और सुषेण भी महातल के प्रधान और अत्यंत भयंकर नाग हैं । इन नागों के पास सैकड़ों और हजारों फन हैं, जो दिव्य मणियों से सुसज्जित हैं। सुषेण और कुहक अपनी विपुल संपदा, रत्नों और भौतिक ऐश्वर्य के कारण महातल में अत्यंत वैभवशाली जीवन व्यतीत करते हैं। वे अपने नाग समाज में नायक और रक्षक के रूप में पूजनीय हैं, किंतु गरुड़ के प्रति उनका भय उनके जीवन का एक स्थायी सत्य है ।
वायु पुराण के अनुसार महातल के अन्य शासक: हिरण्याक्ष एवं किर्मीर के नगर
यद्यपि श्रीमद्भागवत पुराण महातल को पूर्णतः नागों (विशेषकर काद्रवेयों) के निवास के रूप में चित्रित करता है, परंतु ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण जैसे अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथों में महातल के स्वामियों और निवासियों के संदर्भ में कुछ अतिरिक्त और महत्वपूर्ण विवरण भी प्राप्त होते हैं, जिन्हें सम्मिलित करना इस अन्वेषण को पूर्णता प्रदान करता है।
वायु पुराण (अध्याय 50) और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, पाताल लोकों के प्रत्येक स्तर पर विशाल और समृद्ध नगर बसे हुए हैं, जो न केवल नागों द्वारा बल्कि महान दैत्यों और दानवों द्वारा भी शासित हैं । वायु पुराण स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है कि पांचवें पाताल (यानी महातल) में केवल नाग ही नहीं, बल्कि 'हिरण्याक्ष' और 'किर्मीर' जैसे महान दैत्यों के भव्य नगर भी स्थित हैं ।
हिरण्याक्ष महर्षि कश्यप और दिति का अत्यंत बलशाली पुत्र था, जिसने अपने बाहुबल के अहंकार में पृथ्वी को उसके अक्ष से विचलित कर रसातल के गहरे जल में डुबो दिया था । पृथ्वी के उद्धार और धर्म की स्थापना के लिए परब्रह्म भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था, और एक भयंकर युद्ध के पश्चात उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया था । इसी प्रकार, किर्मीर एक भयंकर और मायावी राक्षस था जिसका वध महाभारत काल में पांडव श्रेष्ठ भीमसेन द्वारा काम्यक वन में किया गया था । यद्यपि ये दैत्य भगवान के अवतारों या उनके भक्तों द्वारा मारे जा चुके हैं, परंतु वायु पुराण के भौगोलिक वर्णन के अनुसार उनके विशाल वंशज, उनकी दानवी सभ्यताएं और उनके नाम पर स्थापित समृद्ध नगर महातल लोक में आज भी विद्यमान हैं ।
इन सातों पातालों के एक छत्र संप्रभु के रूप में दैत्यराज बलि (विरोचन के पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र) को मान्यता प्राप्त है । यद्यपि राजा बलि मुख्य रूप से सुतल लोक (महातल से दो स्तर ऊपर) में निवास करते हैं, जहाँ स्वयं भगवान वामन उनके द्वारपाल के रूप में उनकी रक्षा और सेवा करते हैं , फिर भी संपूर्ण पाताल और सभी बिल-स्वर्गों पर राजा बलि का संप्रभु अधिकार माना गया है । इस प्रकार महातल में तक्षक, कालिय आदि नागों तथा हिरण्याक्ष के वंशजों का अपना स्थानीय शासन और प्रभुत्व है, जबकि वृहद ब्रह्मांडीय स्तर पर यह दैत्यराज बलि के महान साम्राज्य का ही एक संरक्षित भाग है।
भगवान के विराट रूप में महातल लोक की अवस्थिति
सनातन दर्शन, वेदों और उपनिषदों में संपूर्ण ब्रह्मांड को भगवान श्रीहरि विष्णु के विराट रूप (विश्वरूप या विराट पुरुष) के रूप में कल्पित किया गया है । भगवान के इस विराट रूप में ब्रह्मांड के चौदह लोक उनके शरीर के विभिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह केवल एक काव्यात्मक कल्पना नहीं है, बल्कि यह अद्वैत और विशिष्टाद्वैत दर्शन का वह मूल है जो सिद्ध करता है कि सृष्टि और स्रष्टा में कोई तात्विक भेद नहीं है। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कंध के पांचवें अध्याय में स्वयं ब्रह्मा जी देवर्षि नारद को इस विराट पुरुष की संरचना का उपदेश देते हैं ।
ब्रह्मा जी देवर्षि नारद को समझाते हुए कहते हैं: हे पुत्र नारद! इस विराट पुरुष भगवान की कटि (कमर) में अतल लोक स्थित है। उनकी दोनों उरुओं (जांघों) में वितल लोक, घुटनों में अत्यंत पवित्र सुतल लोक, और जंघाओं (पिंडलियों) में तलातल लोक कल्पित है। तदुपरांत, भगवान के दोनों 'गुल्फ' (टखने) में 'महातल' लोक अवस्थित है । पैरों के अग्रभाग (पंजों के ऊपरी हिस्से) में रसातल और पैरों के तलवों में पाताल (नागलोक) स्थित है ।
इस शास्त्रीय वर्णन का अत्यंत गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है। महातल का भगवान के टखनों के रूप में होना यह दर्शाता है कि यह लोक भौतिक सृष्टि के मूल आधार के अत्यंत निकट है। मानव शरीर रचना विज्ञान में टखने पूरे शरीर का भार वहन करने और संतुलन बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण जोड़ होते हैं। इसी प्रकार, महातल ब्रह्मांडीय संरचना का वह विशाल आधार है जो अपने भीतर असीमित भौतिक शक्तियों, क्रोधी नागों, दैत्यों और भारी कर्म बंधनों को समेटे हुए है। भगवान का यह विराट रूप यह भी सिद्ध करता है कि चाहे लोक स्वर्ग हो या पाताल, देवता हों या नाग, सभी उसी एक परम सत्य (नारायण) के शरीर के अंश मात्र हैं और कोई भी भगवान की सत्ता से बाहर नहीं है ।
महातल से संबंधित प्रमुख पौराणिक आख्यान: सगर पुत्रों का भस्मीकरण एवं कपिल मुनि का प्रसंग
महातल लोक का संदर्भ केवल ब्रह्मांडीय भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की सबसे पवित्र और ऐतिहासिक घटनाओं में से एक—माँ गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण—से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है । बृहद्धर्म पुराण और अन्य शास्त्रीय ग्रंथों में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन आता है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का भस्मीकरण और उनका गंगा जल से अंतिम उद्धार महातल लोक में ही हुआ था ।
कथा के अनुसार, त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी चक्रवर्ती सम्राट राजा सगर (भगवान राम के पूर्वज) ने अपना सौवां अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । देवराज इंद्र को भय हुआ कि यदि राजा सगर का यह सौवां यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो गया, तो वे स्वर्ग के अधिपति बन जाएंगे और इंद्र की सत्ता छिन जाएगी। इसलिए इंद्र ने अदृश्य रूप में आकर यज्ञ का अश्व चुरा लिया और उसे पाताल की अगाध गहराई में ले जाकर छिपा दिया। राजा सगर ने अपनी पत्नी सुमति से उत्पन्न अपने साठ हजार बलशाली पुत्रों को अश्व की खोज में भेजा । सगर के पुत्रों ने पूरी पृथ्वी पर अश्व को खोजा और जब वह कहीं नहीं मिला, तो उन्होंने अपने अपार शारीरिक बल और अहंकार से पृथ्वी को खोदना शुरू कर दिया (जिससे विशाल सागर का निर्माण हुआ, और इसीलिए समुद्र को 'सागर' कहा जाता है) ।
पृथ्वी को खोदते हुए वे गहरे पाताल लोकों को पार करते हुए महातल लोक में जा पहुंचे । बृहद्धर्म पुराण विशेष रूप से महातल को वह स्थान बताता है जहाँ यह घटना घटी थी । महातल में उन्होंने देखा कि परब्रह्म भगवान विष्णु के अंशावतार, महान सांख्य योग के प्रणेता महर्षि कपिल गहन समाधि में लीन हैं और उनके यज्ञ का अश्व मुनि के आश्रम के समीप ही बंधा हुआ है । अहंकार और अज्ञानता वश, सगर के साठ हजार पुत्रों ने यह विचार किए बिना कि वे एक सिद्ध पुरुष हैं, कपिल मुनि को ही चोर समझ लिया। उन्होंने मुनि को अपशब्द कहे और उन पर अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करने के लिए दौड़ पड़े ।
उनके इस भयंकर कोलाहल और हिंसक कृत्य से महर्षि कपिल की योग समाधि टूट गई। जैसे ही कपिल मुनि ने क्रोध में अपने नेत्र खोले, उनके नेत्रों से एक प्रलयंकारी अग्नि उत्पन्न हुई, जिसने क्षण भर में सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया और उनकी आत्माएं अधोगति को प्राप्त हुईं । जब राजा सगर के पौत्र अंशुमान अपने पिताओं को खोजते हुए महातल पहुंचे और मुनि की स्तुति कर क्षमा मांगी, तब कपिल मुनि ने प्रसन्न होकर अश्व लौटा दिया । परंतु मुनि ने कहा कि इन साठ हजार पुत्रों की मुक्ति अब साधारण कर्मकांडों से नहीं होगी, बल्कि यह तभी संभव है जब स्वर्ग से पवित्र नदी गंगा को इस लोक (महातल/पाताल) में लाया जाए और इन भस्म हुए शरीरों पर उसका दिव्य जल प्रवाहित किया जाए ।
कई पीढ़ियों (अंशुमान और दिलीप) की घोर तपस्या के बाद, अंततः राजा भगीरथ भगवान शिव की कृपा से गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर और फिर पृथ्वी से नीचे महातल (पाताल) तक ले जाने में सफल हुए । जहाँ गंगा ने सगर पुत्रों की भस्म का स्पर्श किया, वह स्थान आज पृथ्वी पर गंगासागर के रूप में पूजनीय है, किंतु इस मोक्षदायिनी घटना का मूल ब्रह्मांडीय केंद्र महातल लोक ही था । यह कथा यह सिद्ध करती है कि महातल जैसे गहरे और तमोगुणी लोक में भी यदि भगवान (कपिल मुनि) का सान्निध्य और पवित्र गंगा का जल पहुंच जाए, तो पापी जीवात्माओं का भी पूर्ण उद्धार संभव है।
महातल में जन्म प्राप्ति के शास्त्रीय कारण एवं कर्म सिद्धांत
सनातन दर्शन के अनुसार, कोई भी जीवात्मा किसी विशिष्ट लोक में अपने कर्मों (संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण) और अपनी चेतना के स्तर के अनुसार ही जन्म लेती है । श्रीमद्भागवत पुराण और भगवद्गीता यह स्पष्ट करते हैं कि ऊर्ध्व लोकों (स्वर्ग आदि) की यात्रा सत्त्व गुण के कारण होती है, मध्य लोकों (पृथ्वी) में जन्म रजोगुण के कारण होता है, और अधोलोकों (पातालों और नरकों) में गमन तमोगुण या जघन्य कर्मों के कारण होता है ।
गीता (14.18) में भगवान श्रीकृष्ण इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहते हैं: अर्थात, सत्त्वगुण में स्थित पुरुष ऊपर के लोकों को जाते हैं, रजोगुणी मध्य में (पृथ्वी पर) रहते हैं, और जघन्य गुणों में स्थित तमोगुणी प्राणी नीचे के लोकों को जाते हैं ।
परंतु महातल जैसे 'बिल-स्वर्ग' में जन्म लेने वाले जीवों का कर्म सिद्धांत उन पापियों से पूर्णतः भिन्न है जो दंड भोगने के लिए नरक जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरु-पत्नी गमन जैसे 'महापातक' (महान पाप) करने वाले पापी सीधे भयंकर नरकों (जैसे रौरव, कुंभीपाक आदि) में कठोर शारीरिक और मानसिक दंड भोगते हैं ।
इसके विपरीत, महातल में वे जीव जन्म लेते हैं जिन्होंने पृथ्वी पर रहते हुए घोर तपस्या की हो, अपार भौतिक दान-पुण्य किया हो, बड़े-बड़े यज्ञ किए हों और भारी भौतिक उपलब्धियां प्राप्त की हों, परंतु जिनके भीतर आध्यात्मिक चेतना, वैराग्य और ईश्वर भक्ति (निष्काम कर्म) का पूर्ण अभाव रहा हो । जिन जीवों में अत्यधिक भौतिक लालसा, अहंकार, धन और सत्ता का लोभ होता है, और जिनका स्वभाव क्रोधी, ईर्ष्यालु और आक्रामक (क्रोधवश) होता है, वे मृत्यु के पश्चात अपने असीम पुण्यों और उग्र स्वभाव के मिश्रित परिणाम के रूप में महातल जैसे लोकों में शक्तिशाली नागों या दैत्यों के रूप में जन्म लेते हैं ।
यहाँ महातल में उन्हें उनके सकाम पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्ग से भी श्रेष्ठ भौतिक सुख, अतुलनीय ऐश्वर्य, मणि-रत्न, सुंदर महल और रोग-रहित दीर्घायु प्राप्त होती है । किंतु ईश्वर-विमुखता और अहंकार के कारण वे सदैव ईश्वरीय शक्ति (जिसका साक्षात् प्रतीक गरुड़ है) से भयभीत रहते हैं । उनका पूरा जीवन असीम काम-भोग, परिवार के प्रति तीव्र मोह और असुरक्षा के बीच व्यतीत होता है । इस प्रकार, महातल उन जीवात्माओं का परम गंतव्य है जो भौतिक प्रगति और शक्ति के शिखर पर तो हैं, किंतु आध्यात्मिक रूप से घोर अज्ञानी हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त (मोक्ष प्राप्त) नहीं हुए हैं।
विभिन्न पुराणों में पातालों के नाम और महातल लोक का तुलनात्मक विश्लेषण
हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में से कई पुराणों में चौदह लोकों का विस्तृत वर्णन आता है। यद्यपि सभी पुराण सात अधोलोकों (पातालों) की अवधारणा और उनकी कुल गहराई (70,000 योजन) पर पूर्णतः एकमत हैं, परंतु कुछ पुराणों में इन लोकों के नाम और उनके अनुक्रम में आंशिक भिन्नता पाई जाती है । इस भिन्नता को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका एक स्पष्ट और प्रामाणिक तुलना प्रस्तुत करती है:
| लोक का क्रम (पृथ्वी से नीचे) | श्रीमद्भागवत एवं पद्म पुराण | विष्णु पुराण | वायु पुराण | शिव पुराण |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम पाताल (10,000 योजन) | अतल | अतल | रसातल | अतल |
| द्वितीय पाताल (20,000 योजन) | वितल | वितल | सुतल | वितल |
| तृतीय पाताल (30,000 योजन) | सुतल | नितल | वितल | सुतल |
| चतुर्थ पाताल (40,000 योजन) | तलातल | गभस्तिमत् | गभस्तल | तलातल |
| पंचम पाताल (50,000 योजन) | महातल | महातल | महातल | तल (या महातल) |
| षष्ठ पाताल (60,000 योजन) | रसातल | सुतल | श्रीतल | रसातल |
| सप्तम पाताल (70,000 योजन) | पाताल | पाताल | पाताल | पाताल |
इस तुलनात्मक विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि यद्यपि अन्य लोकों के नामों और स्थानों में कल्प-भेद या पुराण-भेद के कारण थोड़ी बहुत भिन्नता है, परंतु महातल लोक की स्थिति सर्वसम्मति से पांचवें पाताल के रूप में अत्यंत स्थिर और अकाट्य है । चाहे श्रीमद्भागवत हो, विष्णु पुराण हो या वायु पुराण, महातल को हमेशा पृथ्वी से पचास हजार योजन नीचे पांचवें स्तर पर ही स्थापित किया गया है।
शिव पुराण में कुछ स्थानों पर इसे केवल 'तल' कह दिया गया है, परंतु इसका स्वरूप और इसके निवासी महातल के ही समान वर्णित हैं । सभी प्रामाणिक शास्त्र इस बात पर एकमत हैं कि महातल बहु-फनों वाले भयंकर नागों (कद्रू पुत्रों) का ही मुख्य निवास स्थान है, और इसकी भूमि अत्यंत चमत्कृत और बहुमूल्य रत्नों से परिपूर्ण है । यह एक ऐसा मायावी और ऐश्वर्यशाली लोक है, जहाँ तक्षक, कालिय, कुहक और सुषेण जैसे नाग अपने पूर्ण कुटुंब के साथ निवास करते हैं। विराट पुरुष के टखनों के रूप में महातल का स्थान, सगर पुत्रों और कपिल मुनि की ऐतिहासिक घटना से इसका जुड़ाव, और मयासुर द्वारा रचित इसकी अद्भुत वास्तुकला, इस लोक को हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान का एक अविभाज्य और अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बनाते हैं।