पाताल लोक: प्रामाणिक पुराणों एवं हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान के आधार पर एक विस्तृत शोध रिपोर्ट
ब्रह्माण्डीय संरचना में पाताल लोक की स्थिति एवं मूल परिचय
हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान और प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों के अनुसार, यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चौदह भुवनों या लोकों में विभाजित है। इन चौदह लोकों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: ऊर्ध्व लोक (ऊपर के सात लोक) और अधोलोक (नीचे के सात लोक)। ऊर्ध्व लोकों की श्रृंखला में भूर्लोक (पृथ्वी), भुवर्लोक, स्वर्लोक (इंद्र का स्वर्ग), महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सबसे उच्च स्तर पर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) आते हैं। पृथ्वी तल (भूर्लोक) के ठीक नीचे अधोलोकों का विस्तार आरंभ होता है, जिन्हें सामूहिक रूप से 'पाताल' या 'बिल-स्वर्ग' कहा जाता है। शास्त्रों में पाताल शब्द का उपयोग दो अर्थों में किया जाता है; पहला, सम्पूर्ण अधोलोक संरचना को सामूहिक रूप से दर्शाने के लिए, और दूसरा, इन सात अधोलोकों में सबसे निचले और अंतिम लोक (नागलोक) को विशेष रूप से इंगित करने के लिए।
ब्रह्माण्ड में पाताल लोक की स्थिति पृथ्वी (भूर्लोक) के ठीक नीचे है। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, पृथ्वी के धरातल से सत्तर हजार (70,000) योजन नीचे इन सातों अधोलोकों का पूर्ण विस्तार है। इन सात लोकों के नाम अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं। प्रत्येक लोक की गहराई और विस्तार दस हजार (10,000) योजन है, इस प्रकार यह सत्तर हजार योजन का एक अत्यंत विशाल और रहस्यमयी ब्रह्माण्डीय क्षेत्र है। पाताल लोक के विषय में यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि यह पृथ्वी की तरह कोई साधारण भौतिक जगत नहीं है, और न ही यह पापियों को दंड देने वाला नरक है। गरुड़ पुराण और भागवत पुराण स्पष्ट करते हैं कि नरक लोक पाताल से भी नीचे, गर्भोदक सागर के ठीक ऊपर और दक्षिण दिशा में पितृलोक के समीप स्थित हैं, जहाँ पापी जीव अपने कर्मों का दंड भोगते हैं। इसके विपरीत, पाताल लोक भौतिक ऐश्वर्य, विलासिता और सुख-सुविधाओं का चरम शिखर है, जहाँ रहने वाले जीव स्वर्ग से भी अधिक सुख भोगते हैं।
विभिन्न पुराणों में पाताल लोकों का वर्गीकरण
यद्यपि सभी प्रमुख महापुराणों में सात अधोलोकों का वर्णन मिलता है, परंतु अलग-अलग कल्पों, मन्वन्तरों के भेदों अथवा वर्णन शैली की भिन्नता के कारण विभिन्न पुराणों में इनके नामों और वर्गीकरण में आंशिक भिन्नता प्राप्त होती है। ब्रह्माण्ड पुराण के प्रक्रिया पाद और अनुषंग पाद में इन चौदह लोकों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो जीव की संसार (पुनर्जन्म के चक्र) में यात्रा का प्रतीक है। नीचे दी गई तालिका में प्रमुख पुराणों के अनुसार सात अधोलोकों के नामों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है:
| पुराण का नाम | सात अधोलोकों के नाम (ऊपर से नीचे के क्रम में) | लोकों की कुल संख्या और मुख्य शास्त्रीय विशेषता |
|---|---|---|
| श्रीमद्भागवत पुराण | अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल | सात लोक। महर्षि शुकदेव द्वारा इन्हें 'बिल-स्वर्ग' कहा गया है। यह वर्गीकरण वैष्णव सम्प्रदाय में सर्वाधिक मान्य है। |
| विष्णु पुराण | अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान, महातल, सुतल, पाताल | सात लोक। महर्षि पराशर द्वारा वर्णित इस क्रम में 'तलातल' और 'रसातल' के स्थान पर 'नितल' और 'गभस्तिमान' का उल्लेख है। |
| शिव पुराण (उमा संहिता) | अतल, वितल, सुतल, रसातल, तल, तलातल, पाताल | सात लोक। उमा संहिता के पंद्रहवें अध्याय में 'महातल' के स्थान पर 'तल' का उल्लेख किया गया है। |
| वायु पुराण | रसातल, सुतल, वितल, गभस्तल, महातल, श्रीतल, पाताल | सात लोक। वायु पुराण इन लोकों में स्थित प्रमुख नगरों और उनके दैत्य अधिपतियों का भी अत्यंत विस्तृत वर्णन करता है। |
| पद्म पुराण | अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल | सात लोक। श्रीमद्भागवत पुराण के समान ही नामों का क्रम और वर्णन मिलता है। |
| ब्रह्माण्ड पुराण | अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल | सात लोक। ब्रह्माण्ड पुराण में इन लोकों की मृदा (मिट्टी) और निवासियों का वर्णन मिलता है। |
यह तुलनात्मक अध्ययन यह सिद्ध करता है कि चाहे नामों के क्रम में किंचित भिन्नता हो, परंतु सात स्तरों वाली यह अधोलोक संरचना सम्पूर्ण वैदिक वांग्मय में एकमत से स्वीकार की गई है। सबसे निचले स्तर को सर्वसम्मति से 'पाताल' या 'नागलोक' ही कहा गया है, जो इस सम्पूर्ण अधोलोक संरचना का आधार है और जिसके नीचे भगवान अनन्त शेष विराजमान हैं।
बिल-स्वर्ग: पाताल का भौतिक स्वरूप और दैवीय वातावरण
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में पाताल लोकों के वातावरण का अत्यंत सूक्ष्म और सजीव चित्रण किया गया है। महर्षि शुकदेव राजा परीक्षित को बताते हैं कि इन लोकों को 'बिल-स्वर्ग' कहा जाता है क्योंकि यहाँ का ऐश्वर्य, सुख-सुविधाएं और भोग-विलास ऊर्ध्व लोकों (देवताओं के स्वर्ग) से भी कहीं अधिक उन्नत और उत्कृष्ट हैं। देवलोक में तो देवताओं को अपने पुण्य क्षीण होने का या असुरों के आक्रमण का भय सताता रहता है, परंतु पाताल के निवासी इस प्रकार की किसी भी व्याकुलता से मुक्त होकर निरंतर भौतिक भोगों में लिप्त रहते हैं।
एतेषु हि बिलस्वर्गेषु स्वर्गादप्यधिककामभोगैश्वर्यानन्दभूतिविभूतिभि: सुसमृद्धभवनोद्यानाक्रीडविहारेषु दैत्यदानवकाद्रवेया नित्यप्रमुदितानुरक्तकलत्रापत्यबन्धुसुहृदनुचरा गृहपतय ईश्वरादप्यप्रतिहतकामा मायाविनोदा निवसन्ति ॥ 8 ॥
श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.8): इन बिल-स्वर्गों में रहने वाले दैत्य, दानव और नाग गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। यहाँ स्वर्ग से भी अधिक काम-भोग, ऐश्वर्य, आनंद और विभूति उपलब्ध है। यहाँ के भवन, उद्यान और क्रीड़ा-स्थल अत्यंत समृद्ध हैं। यहाँ के निवासी अपनी पत्नी, पुत्र, बंधु-बांधव और अनुचरों के साथ सदा प्रमुदित और अनुरक्त रहते हैं। इनकी कामनाएं देवताओं (ईश्वरों) से भी अधिक अबाधित होती हैं और ये माया के सुखों में निरंतर आनंदित रहते हैं।
इन अधोलोकों में सूर्य और चंद्रमा का प्रत्यक्ष प्रकाश नहीं पहुँचता है, जिसके कारण यहाँ दिन और रात का कोई विभाजन नहीं है। सौर समय का प्रभाव न होने के कारण यहाँ के निवासियों को समय के बीतने का तनिक भी भान नहीं होता। सूर्य का प्रकाश न होने पर भी यहाँ तनिक भी अंधकार नहीं है। इसका कारण यह है कि पाताल लोकों में निवास करने वाले महान नागों के फनों पर जो बहुमूल्य और दिव्य मणियाँ सुशोभित हैं, उनकी तीव्र और दिव्य आभा से पाताल की सम्पूर्ण कंदराएं और नगरियां निरंतर प्रकाशित रहती हैं।
यहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य और ऊर्जा का स्तर पृथ्वी के मनुष्यों की कल्पना से परे है। इन लोकों में अनेक प्रकार की दिव्य औषधियां, जड़ी-बूटियां और रस पाए जाते हैं। यहाँ के निवासी जब इन दिव्य रसों का पान करते हैं और औषधियों के जल से स्नान करते हैं, तो उनके शरीर से बुढ़ापा, रोग, झुर्रियां, सफेद बाल, पसीना, दुर्गंध और थकान सदा के लिए दूर हो जाते हैं। इन लोकों में दानवराज मयासुर ने अपनी अद्भुत मायावी वास्तुकला से रत्नों, सोने और स्फटिक के महलों, मंदिरों, प्रांगणों और अतिथि-गृहों का निर्माण किया है। विष्णु पुराण के अनुसार, पाताल की भूमियाँ भिन्न-भिन्न रंगों की हैं—कोई श्वेत, कोई काली, कोई बैंगनी (अरुण), कोई पीली, कोई कंकरीली, कोई पथरीली और कोई शुद्ध स्वर्णमयी है। इन नगरियों में ऐसे सरोवर हैं जिनका जल अत्यंत निर्मल है और जिनमें कमल के फूल खिले रहते हैं, और इन सरोवरों के तट पर नर-कोकिल पक्षियों की मधुर ध्वनि और वीणा, वेणु (बांसुरी) तथा मृदंग का संगीत निरंतर गूंजता रहता है।
इन समस्त बिल-स्वर्गों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के निवासी अकाल मृत्यु या किसी भी रोग से नहीं मरते। उन्हें केवल भगवान विष्णु के 'सुदर्शन चक्र' के रूप में साक्षात काल से भय लगता है। जब भी भगवान का सुदर्शन चक्र पाताल लोक में प्रवेश करता है, तो उसके असहनीय दिव्य तेज और प्रताप को देखकर असुरों की गर्भवती स्त्रियों को इतना भयंकर भय लगता है कि उनके गर्भ गिर जाते हैं।
यस्मिन् प्रविष्टेऽसुरवधूनां प्राय: पुंसवनानि भयादेव स्रवन्ति पतन्ति च ॥ 15 ॥
श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.15): जब भगवान का सुदर्शन चक्र उन प्रदेशों में प्रवेश करता है, तो उसकी प्रभा और तेज के भय से असुरों की गर्भवती स्त्रियों के गर्भ प्रायः स्रवित हो जाते हैं (गिर जाते हैं)। यह श्लोक प्रमाणित करता है कि पाताल का अभेद्य ऐश्वर्य भी ईश्वरीय सत्ता के समक्ष शक्तिहीन है।
सप्त अधोलोकों का विस्तृत शास्त्रीय विवरण
श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 5, अध्याय 24) और विष्णु पुराण (द्वितीय अंश, अध्याय 5) के आधार पर इन सात अधोलोकों का पृथक-पृथक स्वरूप, वहाँ के अधिपति और निवासियों का अत्यंत गहन वर्णन प्राप्त होता है। प्रत्येक लोक की अपनी एक विशिष्ट पहचान, अधिपति और पारिस्थितिकी है।
1. अतल लोक
पृथ्वी (भूर्लोक) के ठीक नीचे दस हजार योजन की गहराई में जो पहला लोक स्थित है, उसे अतल लोक कहा जाता है। इस लोक का अधिपति मयासुर का पुत्र 'बल' नामक असुर है। इस असुर के पास अत्यधिक रहस्यमयी और मायावी शक्तियां हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि एक बार असुर बल की जम्हाई से तीन प्रकार की स्त्रियां उत्पन्न हुईं—स्वैरिणी (जो अपने ही वर्ग के पुरुषों से विवाह करती हैं), कामिनी (जो किसी भी वर्ग के पुरुष को स्वीकार कर लेती हैं), और पुंश्चली (जो निरंतर अपने साथी बदलती रहती हैं)। जब भी कोई पुरुष अतल लोक में प्रवेश करता है, तो ये स्त्रियां उसे अपने आकर्षण में फंसा लेती हैं और उसे भांग से बना 'हाटक' नामक एक मादक रस पिलाती हैं। इस रस का पान करते ही वह पुरुष उन्मत्त हो जाता है। उसमें दस हजार हाथियों का बल आ जाता है और वह काम-वासना में अंधा होकर स्वयं को ईश्वर या ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली प्राणी मानने लगता है, और अपनी मृत्यु तथा विनाश को पूर्णतः भूल जाता है।
2. वितल लोक
अतल के नीचे दस हजार योजन की दूरी पर वितल लोक स्थित है। इस लोक के अधिपति साक्षात भगवान शिव हैं, जो यहाँ 'हाटकेश्वर' या 'हर-भव' के रूप में अपनी अर्धांगिनी माता भवानी (गौरी) और अपने भूत-प्रेत गणों के साथ निवास करते हैं। भगवान शिव यहाँ प्रजापति के रूप में श्रृंगार-रस में मग्न रहते हैं। भगवान शिव और माता भवानी के संयोग से जो दिव्य तेज उत्पन्न होता है, वह एक नदी का रूप ले लेता है जिसे 'हाटकी' नदी कहा जाता है। जब अग्नि देव वायु देव द्वारा प्रेरित होकर इस हाटकी नदी के जल का पान करते हैं और उसे बाहर थूकते हैं, तो उससे एक विशेष प्रकार का दिव्य स्वर्ण उत्पन्न होता है जिसे 'हाटक' स्वर्ण कहा जाता है। वितल लोक में निवास करने वाले दैत्य और दानव अपनी स्त्रियों के साथ इसी हाटक स्वर्ण से बने भारी और अत्यंत सुंदर आभूषणों को धारण करते हैं और आनंदित रहते हैं।
3. सुतल लोक
वितल के नीचे सुतल लोक है। सुतल लोक का निर्माण साक्षात देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया है। यह लोक अत्यंत पवित्र और महान है क्योंकि यहाँ के अधिपति भक्तराज बलि हैं, जो विरोचन के पुत्र और परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र हैं। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी। भगवान वामन ने अपने दो पगों में त्रिलोकी नाप ली और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें सुतल लोक में भेज दिया। राजा बलि की असीम भक्ति, सत्यनिष्ठा और आत्म-समर्पण से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें देवराज इंद्र से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बना दिया। भगवान ने राजा बलि को यह वरदान दिया कि वे स्वयं सुतल लोक में उनके महल के द्वारपाल के रूप में गदा धारण करके हमेशा उपस्थित रहेंगे।
नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहाय स्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयस: कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम् ॥ 24 ॥
श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.24): महर्षि शुकदेव कहते हैं कि देवराज इंद्र अपने स्वार्थ को समझने में चतुर नहीं हैं। उनके पास बृहस्पति जैसे विद्वान मंत्री हैं, फिर भी जब भगवान वामन (उपेन्द्र) ने उनसे पूछा, तो इंद्र ने भगवान की सेवा (दास्य) मांगने के बजाय केवल त्रिलोकी का राज्य मांगा। यह त्रिलोकी का राज्य तो एक मन्वन्तर के बाद अगाध काल द्वारा नष्ट हो जाएगा। इसके विपरीत, राजा बलि ने भगवान को ही प्राप्त कर लिया।
यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामह: किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवत: परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि ॥ 25 ॥
श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.25): बलि महाराज कहते हैं कि मेरे पितामह प्रह्लाद महाराज ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने वास्तविक स्वार्थ को समझा। जब उनके पिता हिरण्यकशिपु का वध भगवान नृसिंह द्वारा कर दिया गया, तो भगवान ने प्रह्लाद को उनके पिता का राज्य और मुक्ति दोनों देने की पेशकश की, परंतु प्रह्लाद ने दोनों को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने केवल भगवान के दासों का दास बनना ही स्वीकार किया।
इस असीम भक्ति के कारण सुतल लोक पाताल का सबसे आध्यात्मिक रूप से उन्नत क्षेत्र माना जाता है, जहाँ भौतिक ऐश्वर्य के साथ-साथ शुद्ध भगवत-भक्ति का भी पूर्ण साम्राज्य है। आज भी सुतल लोक में राजा बलि अपने परिवार और असुरों के साथ निवास करते हैं और भगवान की अनन्य भक्ति में लीन रहते हैं。
4. तलातल लोक
सुतल के नीचे तलातल लोक स्थित है। इस लोक का स्वामी महान असुर वास्तुकार और मायावी विद्याओं का ज्ञाता 'मयासुर' है। मयासुर वही दैत्य है जो लंकापति रावण की पत्नी मंदोदरी का पिता है। पूर्वकाल में भगवान शिव ने त्रिपुरारी का रूप धारण करके मयासुर द्वारा निर्मित तीन मायावी नगरों (त्रिपुर) का विनाश कर दिया था। परंतु मयासुर की याचना और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे अभयदान दिया और यह तलातल लोक उसे सौंप दिया। शिव के संरक्षण के कारण मयासुर यहाँ अत्यंत सुरक्षित और प्रसन्न रहता है, और वह हमेशा भौतिक सुखों में लिप्त रहता है। शिव की कृपा होने के बावजूद, अज्ञान और माया के कारण मयासुर कभी भी आध्यात्मिक सुख या परम सत्य को प्राप्त नहीं कर पाता।
5. महातल लोक
तलातल के नीचे महातल लोक है। यह लोक मुख्य रूप से कद्रू के पुत्रों का निवास स्थान है। यहाँ कई फनों वाले विशाल और भयंकर सर्प (नाग) निवास करते हैं। इस लोक में कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण नामक नागों के क्रोधी समूह रहते हैं। ये नाग शारीरिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली हैं और अपने परिवारों के साथ यहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं, परंतु इनके मन में सदैव भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का भय बना रहता है। गरुड़ के भय के कारण वे अपनी मायावी शक्तियों और विष के बावजूद सदैव आशंकित रहते हैं।
6. रसातल लोक
महातल के नीचे रसातल लोक है। रसातल मुख्य रूप से भयंकर दानवों और दैत्यों का निवास स्थान है। यहाँ पणि, निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी नामक असुर निवास करते हैं। ये दैत्य स्वभाव से अत्यंत क्रूर, बलवान और देवताओं के चिर-शत्रु हैं। ये रसातल में बिलों के भीतर बड़े-बड़े सर्पों के समान रहते हैं। यद्यपि ये दैत्य अपने बल और अभिमान में चूर रहते हैं, परंतु भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के तेज से इनका बल और गर्व चकनाचूर हो जाता है। इसके अतिरिक्त, ये दैत्य देवराज इंद्र की 'सरमा' नामक एक दिव्य कुतिया द्वारा उच्चारित किए गए वैदिक मंत्रों से अत्यधिक भयभीत रहते हैं।
7. पाताल लोक (नागलोक)
रसातल के नीचे, अधोलोकों की सबसे अंतिम और सबसे गहरी परत 'पाताल लोक' है, जिसे विशेष रूप से 'नागलोक' कहा जाता है। यह लोक महान और श्रेष्ठ नागों का साम्राज्य है। पाताल लोक के अधिपति नागराज वासुकि हैं, जो भगवान शिव के गले में आभूषण के रूप में शोभायमान होते हैं। वासुकि के नेतृत्व में इस लोक में शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर, देवदत्त आदि महानाग अपने-अपने कुनबों के साथ निवास करते हैं।
ततोऽधस्तात्पाताले नागलोकपतयो वासुकिप्रमुखा: शङ्खकुलिकमहाशङ्खश्वेतधनञ्जयधृतराष्ट्रशङ्खचूडकम्बलाश्वतरदेवदत्तादयो महाभोगिनो महामर्षा निवसन्ति येषामु ह वै पञ्चसप्तदशशतसहस्रशीर्षाणां फणासु विरचिता महामणयो रोचिष्णव: पातालविवरतिमिरनिकरं स्वरोचिषा विधमन्ति ॥ 31 ॥
श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.31): रसातल के नीचे पाताल (नागलोक) है। यहाँ नागों के स्वामी वासुकि के नेतृत्व में शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि महान नाग निवास करते हैं। ये स्वभाव से अत्यंत क्रोधी और भौतिक सुखों के प्रति अत्यधिक आसक्त (महाभोगिनो) हैं। इनके किसी के पाँच, सात, दस, सौ या एक हजार तक सिर (फन) हैं। इनके फनों पर अत्यंत मूल्यवान मणियाँ जड़ी हुई हैं, जिनकी दैदीप्यमान प्रभा से पाताल लोक की कंदराओं का सारा अंधकार नष्ट हो जाता है।
वायु पुराण के अनुसार पाताल की नगरियां और उनके अधिपति: वायु पुराण इन सातों लोकों की नगरियों का और भी सूक्ष्म और विशिष्ट वर्णन करता है। जहाँ भागवत पुराण मुख्य रूप से इन लोकों के गुण-दोष बताता है, वहीं वायु पुराण प्रत्येक परत में स्थित विशिष्ट नगरों और उनके शासकों का उल्लेख करता है। वायु पुराण के अनुसार पाताल के प्रथम स्तर पर दैत्य नमुचि और नाग कालिय का नगर है; द्वितीय स्तर पर हयग्रीव और महान नाग तक्षक का नगर है; तृतीय स्तर पर भक्त प्रह्लाद और हेमक के नगर हैं; चतुर्थ स्तर पर कालनेमि और वैनतेय का निवास है; पंचम स्तर पर हिरण्याक्ष और किर्मीर का अधिकार है; षष्ठम स्तर पर पुलोमन और नागराज वासुकि रहते हैं, और अंतिम सातवें स्तर पर राजा बलि का सार्वभौम शासन है। यह वर्णन दर्शाता है कि पाताल का प्रशासन विभिन्न दैत्यों और नागों के बीच व्यवस्थित रूप से विभाजित है。
पाताल के आधार और अधिपति: भगवान अनन्त शेष (संकर्षण)
पाताल लोक (नागलोक) के भी नीचे, लगभग तीस हजार योजन की गहराई में, ब्रह्माण्ड के मूल पर साक्षात भगवान विष्णु का एक अत्यंत उग्र और तामसी स्वरूप निवास करता है, जिन्हें 'भगवान अनन्त' या 'शेषनाग' कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण (स्कन्ध 5, अध्याय 25), विष्णु पुराण (द्वितीय अंश, अध्याय 5) और शिव पुराण में इस स्वरूप का अत्यंत गुह्य और दार्शनिक वर्णन प्राप्त होता है।
विद्वान वैष्णव जन इन्हें भगवान 'संकर्षण' के रूप में पूजते हैं। यद्यपि भगवान संकर्षण सदैव गुणातीत और पारलौकिक स्थिति में रहते हैं, फिर भी चूँकि वे अंधकार और संहार के देवता भगवान शिव के उपास्य हैं, इसलिए उनके इस स्वरूप को 'तामसी' भी कहा जाता है। भगवान अनन्त अहंकार और तमोगुण के अधिष्ठाता देव हैं। जब कोई बद्ध जीव यह सोचता है कि "मैं ही भोक्ता हूँ और यह सारा संसार मेरे भोगने के लिए है", तो यह मिथ्या अभिमान भगवान संकर्षण की ही प्रेरणा से उत्पन्न होता है। इस प्रकार अज्ञानी जीव स्वयं को ही परमेश्वर समझने लगता है।
श्रीमद्भागवत पुराण (5.25.1) में महर्षि शुकदेव कहते हैं: मूल आशय: पाताल के आधार में भगवान का वह स्वरूप विराजमान है जिसे विद्वान संकर्षण कहते हैं। वह तामसी गुण के अधिष्ठाता हैं और संपूर्ण जगत के अहंकार के मूल हैं।
भगवान शेषनाग का स्वरूप अत्यंत विशाल और अलौकिक है। विष्णु पुराण के अनुसार, उनके एक हजार सिर हैं और प्रत्येक सिर पर स्पष्ट और पवित्र 'स्वास्तिक' का चिह्न अंकित है। उनके हजारों फनों पर स्थित मणियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय दिशाओं को प्रकाशित करती हैं। उनका रूप कैलाश पर्वत के समान श्वेत और दैदीप्यमान है, मानो कैलाश पर गंगा बह रही हो। वे नीले (बैंगनी) रंग के वस्त्र धारण करते हैं, गले में श्वेत वैजयंती माला पहनते हैं और केवल एक कान में कुंडल धारण करते हैं। उनके एक हाथ में हल और दूसरे हाथ में मूसल है। मदिरा की देवी 'वारुणी' साक्षात मूर्तिमान होकर उनकी सेवा में सदैव उपस्थित रहती हैं।
यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जिसमें अनगिनत ग्रह-नक्षत्र, पर्वत, समुद्र और वन शामिल हैं, भगवान अनन्त के एक हजार फनों में से केवल एक फन पर एक छोटी सी 'सफेद सरसों के दाने' के समान टिका हुआ है।
यदा विजृम्भतेऽनंतो मदाघूर्णितलोचनः । तदा चलति भूरेषा साद्रितोयाधिकानना ॥ 21 ॥
शिव पुराण की उमा संहिता (10.15.21): जब भगवान अनन्त (शेषनाग) मद से घूर्णित नेत्रों वाले होकर जम्हाई लेते हैं, तब यह पूरी पृथ्वी अपने समस्त पर्वतों, महासागरों और वनों के साथ कांपने लगती है (भूकंप आते हैं)।
सृष्टि के अंत (कल्प के अंत) में, जब भगवान अनन्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संहार करने की इच्छा करते हैं, तो उनके भृकुटी के मध्य से एकादश 'रुद्र' उत्पन्न होते हैं। ये रुद्र त्रिशूल धारण किए हुए होते हैं और उनके मुख से विषैली अग्नि निकलती है, जो त्रिलोकी को भस्म कर देती है। भगवान शेषनाग का ज्ञान इतना असीमित है कि प्राचीन काल में महर्षि गर्ग ने उनकी घोर तपस्या करके और उन्हें प्रसन्न करके ही खगोल विज्ञान, ज्योतिष और शकुन-अपशकुन का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था। भगवान अनन्त के गुणों का पार कोई भी देव, दानव या गंधर्व नहीं पा सकता, इसी कारण उन्हें 'अनन्त' (जिसका कोई अंत न हो) कहा जाता है। भगवान शेषनाग के परम पावन नामों का कीर्तन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं (हन्ति अंहः सपदि नृणाम् अशेषम्)।
पाताल लोक से संबंधित प्रमुख पौराणिक आख्यान
देवर्षि नारद का पाताल भ्रमण और स्वर्ग से तुलना
विष्णु पुराण (द्वितीय अंश, अध्याय 5) और शिव पुराण (उमा संहिता, अध्याय 15) में देवर्षि नारद के पाताल भ्रमण का विस्तार से वर्णन है। जब नारद मुनि तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए पाताल पहुंचे और वहाँ से लौटकर स्वर्ग की देव-सभा में गए, तो उन्होंने देवताओं को पाताल की भव्यता का वर्णन सुनाकर आश्चर्यचकित कर दिया। नारद जी ने स्पष्ट कहा कि पाताल का ऐश्वर्य और वहाँ मिलने वाला इंद्रिय-सुख स्वर्ग से भी उत्तम है। यह प्रसंग दर्शाता है कि हिन्दू दर्शन में भौतिक समृद्धि और विलासिता को केवल ऊर्ध्व लोकों तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि रसातल और पाताल में इसका सर्वाधिक सघन रूप देखा जा सकता है।
नारद जी ने वर्णन किया कि पाताल में दैत्यों और दानवों की जो कन्याएं विचरण करती हैं, उनका रूप और लावण्य इतना सम्मोहक है कि वे कठोर से कठोर तपस्वियों का भी मन मोह सकती हैं। वहाँ सूर्य का प्रकाश केवल उजाला देता है, संताप या गर्मी नहीं; और चंद्रमा केवल चांदनी फैलाता है, शीतलता या ठंडक नहीं। दानव पुत्र स्वादिष्ट भोजन और तीव्र मदिरा का पान करते हुए इतने आनंदित रहते हैं कि उन्हें समय के बीतने का पता ही नहीं चलता।
मार्कण्डेय पुराण: राजा कुवलयाश्व और दानव पातालकेतु का आख्यान
मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 20-21) में पाताल लोक से जुड़ा एक अत्यंत रोमांचक आख्यान मिलता है। गालव ऋषि के आश्रम की रक्षा करते हुए, राजा शत्रुजित के पुत्र कुवलयाश्व एक मायावी दानव का पीछा करते हैं जो एक जंगली सूअर का रूप धारण किए हुए था। उस दानव का पीछा करते-करते कुवलयाश्व एक गहरे अंधकारमयी गड्ढे में गिर जाते हैं और स्वयं को 'पाताल' में पाते हैं। वहाँ वे एक विशाल और अद्भुत स्वर्ण नगरी देखते हैं जो स्वर्णिम प्राचीरों से घिरी हुई थी।
उस नगरी में कुंडल नामक एक स्त्री कुवलयाश्व को बताती है कि पातालकेतु नामक उस दानव ने गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री मदालसा का अपहरण करके उसे बंदी बना रखा है। दिव्य गाय सुरभि की भविष्यवाणी थी कि कोई मरणशील मनुष्य ही इस दानव का वध करके मदालसा का रक्षक बनेगा। राजा कुवलयाश्व पातालकेतु और उसके दानव सैनिकों का अत्यंत शक्तिशाली 'त्वाष्ट्र अस्त्र' से वध कर देते हैं। तत्पश्चात तुम्बुरु गंधर्व द्वारा उनका विवाह संपन्न कराया जाता है और वे गंधर्व कन्या मदालसा को मुक्त कराकर पृथ्वी पर अपने पिता के पास लौट आते हैं। यह आख्यान इस बात का प्रामाणिक संदर्भ है कि पृथ्वी के भीतर स्थित इन लोकों में दानवों की विशाल स्वर्ण-नगरियां मौजूद हैं जहाँ से वे पृथ्वी पर हस्तक्षेप करते हैं, और विशेष शक्तियों से संपन्न मनुष्य इन लोकों में प्रवेश कर सकते हैं।
पाताल में अश्वमेध के अश्व की खोज और कपिल मुनि
विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की कथा आती है, जो अश्वमेध यज्ञ के चोरी हुए घोड़े को खोजते हुए पृथ्वी को खोदकर पाताल लोक तक पहुँच गए थे। पाताल में उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु के अंशावतार महर्षि कपिल ध्यानमग्न थे और घोड़ा उनके समीप बंधा था। सगर के पुत्रों ने महर्षि का अपमान किया, जिसके परिणामस्वरूप कपिल मुनि के नेत्रों से निकली अग्नि ने साठ हजार सागर-पुत्रों को वहीं भस्म कर दिया। यह कथा दर्शाती है कि पाताल केवल असुरों का ही निवास नहीं है, बल्कि कपिल मुनि जैसे परम सिद्ध योगी और भगवान के अंशावतार भी वहां निवास करते हैं।
पृथ्वी से पाताल लोक के भौतिक एवं पौराणिक प्रवेश द्वार
यद्यपि पाताल लोक मुख्य रूप से एक ब्रह्माण्डीय आयाम है, परंतु पुराणों और स्थानीय श्रुतियों में पृथ्वी पर ऐसे प्रवेश द्वारों का भी उल्लेख है जो सीधे पाताल की ओर जाते हैं। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित 'पाताल भुवनेश्वर' की चूना पत्थर की गुफाओं को शास्त्रों में वर्णित पाताल का एक भौतिक मार्ग माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार त्रेता युग में सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले इस गुफा की खोज की थी, जहाँ भगवान शिव और तैंतीस कोटि देवता विराजमान हैं।
इसी प्रकार मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित पातालकोट घाटी को भी पाताल लोक का प्रवेश द्वार माना जाता है। रामायण की लोक-कथाओं के अनुसार, जब महिरावण (अहिरावण) ने भगवान राम और लक्ष्मण का अपहरण किया था, तो वह इसी प्रकार की एक सुरंग के माध्यम से उन्हें पाताल लोक ले गया था। हनुमान जी ने उसी सुरंग से पाताल में प्रवेश करके मकरध्वज को पराजित किया और राम-लक्ष्मण की रक्षा की। यद्यपि ये मार्ग भौगोलिक प्रतीत होते हैं, परंतु पौराणिक दृष्टि से पाताल एक भिन्न और सूक्ष्म आयाम है जिसे केवल स्थूल आँखों से नापा या देखा नहीं जा सकता, जब तक कि व्यक्ति के पास योग-सिद्धि, मायावी विद्या या ईश्वरीय कृपा न हो。
पाताल गमन के शास्त्रीय कारण और जीव की गति
शास्त्रों के अनुसार, किसी भी लोक में जीव का जन्म या गमन उसके कर्मों और चेतना के स्तर पर निर्भर करता है। पाताल लोक (अधोलोक) की प्राप्ति मुख्य रूप से उन जीवों को होती है जो रजोगुण और तमोगुण से अत्यधिक प्रभावित हैं, और जिनकी चेतना पूर्णतः भौतिक सुखों, शारीरिक भोगों, और ऐश्वर्य के संग्रह में उलझी हुई है। यह नरक से इस मायने में भिन्न है कि नरक पाप कर्मों का दंड भोगने का स्थान है, जहाँ यमदूतों द्वारा पीड़ा और कष्ट दिया जाता है; जबकि पाताल उन जीवों का स्थान है जिन्होंने भौतिक दृष्टिकोण से बड़े-बड़े यज्ञ, निर्माण और मायावी सिद्धियां प्राप्त की हैं, परंतु आध्यात्मिक आत्म-ज्ञान से वंचित हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग केवल अर्थ और काम के पीछे भागते हैं, परोपकार से हीन हैं और ज्ञान से शून्य हैं, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं। गरुड़ पुराण प्रेत कल्प में यममार्ग का वर्णन आता है, जहाँ पापी जीव भयंकर कष्ट सहते हुए नरक की ओर जाते हैं। परंतु पाताल में जाने वाले दानव और दैत्य घोर तपस्या के बल पर इन लोकों के ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं। भागवत पुराण स्पष्ट करता है कि इन बिल-स्वर्गों के निवासी अपनी काम-वासना और अहंकार के कारण भगवान के शाश्वत धाम (वैकुण्ठ) को प्राप्त नहीं कर पाते। जब उनके पुण्यों और तपस्या का प्रभाव क्षीण हो जाता है, या जब भगवान का सुदर्शन चक्र वहां पहुँचता है, तो उनका सारा ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है। केवल सुतल लोक के अधिपति राजा बलि जैसे अनन्य भक्त ही हैं, जो पाताल में रहते हुए भी पूर्णतः भगवान की शरण में हैं और भौतिक बंधनों से मुक्त हैं।
