वैदिक ब्रह्माण्ड विज्ञान में 'तलातल' लोक का प्रामाणिक एवं विस्तृत शास्त्रीय अन्वेषण
ब्रह्माण्ड के पदानुक्रम में तलातल लोक का उद्भव और स्थानिक परिप्रेक्ष्य
सनातन हिंदू धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, विशेषकर अष्टादश महापुराणों के ब्रह्माण्ड विज्ञान में संपूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत को चौदह प्रमुख भुवनों या लोकों में वर्गीकृत किया गया है। इन चौदह लोकों की परिकल्पना को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: सात ऊर्ध्व लोक और सात अधोलोक। ऊर्ध्व लोकों में पृथ्वी (भूर्लोक) सबसे नीचे है, जिसके ऊपर क्रमशः भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सर्वोच्च सत्यलोक (ब्रह्मलोक) स्थित हैं। पृथ्वी के धरातल के नीचे के सात लोकों को सम्मिलित रूप से 'पाताल मंडल' या 'बिल-स्वर्ग' कहा जाता है। इन सात अधोलोकों का क्रम ऊपर से नीचे की ओर इस प्रकार है: अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। इसी विशद पदानुक्रम में 'तलातल' लोक अधोलोकों की श्रेणी में चौथा अत्यंत महत्वपूर्ण और भव्य लोक है। यह लोक सुतल लोक के ठीक नीचे और महातल लोक के ठीक ऊपर स्थित है। श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, और वायु पुराण सहित अधिकांश प्रामाणिक शास्त्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि तलातल कोई अंधकारमय नरक या यातना भुगतने का स्थान नहीं है, बल्कि यह देवराज इन्द्र के स्वर्ग से भी अधिक उत्कृष्ट और ऐश्वर्यशाली एक मायावी आयाम है।
ब्रह्माण्ड में इसके सटीक स्थान और विस्तार का वर्णन करते हुए श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को बताते हैं कि पृथ्वी के नीचे स्थित इन सातों पाताल लोकों के बीच की स्थानिक दूरी दस-दस हजार योजन (लगभग अस्सी हजार मील प्रति लोक) है। इस गणना के आधार पर, पृथ्वी के धरातल से दस हजार योजन नीचे अतल, बीस हजार योजन नीचे वितल, तीस हजार योजन नीचे सुतल और ठीक चालीस हजार योजन नीचे 'तलातल' लोक स्थित है। इस लोक का अपना स्वयं का विस्तार (लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई) भी दस हजार योजन ही निर्धारित किया गया है। विष्णु पुराण (अंश 2, अध्याय 5) और ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, संपूर्ण पाताल मंडल सत्तर हजार योजन की गहराई तक व्याप्त है, और तलातल इसका ठीक मध्य भाग (चौथा स्तर) है। इस लोक का यह मध्यवर्ती स्थान ब्रह्माण्ड के भौतिक संतुलन में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है। तलातल के ठीक ऊपर सुतल लोक है, जहाँ भगवान वामन के परम भक्त दैत्यराज बलि निवास करते हैं, और इसके ठीक नीचे महातल लोक है, जहाँ कद्रु के पुत्र और क्रोधवश नामक सर्पों के समूह निवास करते हैं। इस प्रकार, तलातल दैवीय सत्ता द्वारा संरक्षित एक परम मायावी और विलासितापूर्ण मध्यवर्ती अधोलोक है।
तलातल का भौतिक स्वरूप, मिट्टी की प्रकृति और अद्वितीय वास्तुकला
पुराणों में तलातल लोक की भौगोलिक संरचना, वहाँ की मृदा (मिट्टी) और भौतिक स्वरूप का अत्यंत सूक्ष्म और विस्मयकारी वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण (प्रक्रिया पाद, अध्याय 20) में सात अधोलोकों को उनकी मिट्टी की प्रकृति और धरातल के रंगों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। इन शास्त्रों के अनुसार सातों पातालों की भूमि क्रमशः श्वेत, कृष्ण (काली), अरुण (नीली/भूरी), पीत (पीली), शर्करा (कंकरीली), अश्म (पथरीली) और सुवर्णमयी (सोने की) है। विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण में तलातल लोक को कई स्थानों पर 'गभस्तिमत्' या 'गभस्तल' के नाम से भी संबोधित किया गया है। इस क्रम में चौथे अधोलोक, अर्थात तलातल (गभस्तिमत्) का धरातल स्पष्ट रूप से 'पीत' (पीले रंग का) बताया गया है। यह पीली मृदा स्वर्णिम आभा लिए हुए है और अत्यंत कोमल तथा उपजाऊ है।
तलातल लोक का वास्तुशिल्प मानवीय कल्पना से परे है। चूँकि यह मायावी शक्तियों का असीम केंद्र है, यहाँ के भवनों, प्रासादों (महलों) और नगरों का निर्माण स्वयं दानवेन्द्र मय (मय दानव) ने किया है, जो देव-वास्तुकार विश्वकर्मा के समान ही महान हैं, और मायावी शिल्पकला में तो उनसे भी श्रेष्ठ माने जाते हैं। इस लोक के चप्पे-चप्पे पर स्वर्ण, रजत, स्फटिक और बहुमूल्य रत्नों से जड़े हुए विशाल और गगनचुंबी प्रासाद निर्मित हैं। इन भवनों की वास्तुकला इतनी जटिल और सम्मोहक है कि यह देखने वालों की आँखों में भ्रम उत्पन्न कर देती है। यहाँ के घरों के प्रांगण, सभा भवन और विश्राम गृह अनमोल मणियों से सुसज्जित हैं। मय दानव ने अपनी योग माया और तपोबल से इस लोक में ऐसे कृत्रिम सरोवरों और उद्यानों का निर्माण किया है, जो स्वर्ग के नंदन कानन को भी लज्जित कर देते हैं। देवर्षि नारद ने जब पाताल लोकों का भ्रमण किया था, तो उन्होंने स्वर्ग लौटकर देवताओं की सभा में यह उद्घोष किया था कि पाताल लोक (जिसमें तलातल की भव्यता सर्वोपरि है) इन्द्र के स्वर्ग से कहीं अधिक सुंदर और मनोरम है। यह लोक केवल पत्थरों और धातुओं का ढाँचा नहीं है, बल्कि यह मय दानव की इच्छाशक्ति से संचालित एक जीवंत मायावी आयाम है।
प्राकृतिक वातावरण, प्रकाश व्यवस्था और असीम ऊर्जा का स्रोत
तलातल एक अधोलोक है, अतः भौतिक ब्रह्माण्ड के सूर्य या चंद्रमा की किरणें प्रत्यक्ष रूप से यहाँ प्रवेश नहीं कर पाती हैं। किंतु, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि तलातल में अंधकार का साम्राज्य है। श्रीमद्भागवत पुराण के स्पष्ट उल्लेख के अनुसार, तलातल सहित सभी बिल-स्वर्गों में महान सर्पों और नागों के फनों पर जड़ी हुई दिव्य और बहुमूल्य मणियों से अत्यंत तीव्र प्रकाश विकीर्ण होता है। यह मणियों का दिव्य प्रकाश इन लोकों के संपूर्ण अंधकार को समूल नष्ट कर देता है और दसों दिशाओं को आलोकित रखता है। इस कृत्रिम किंतु दैवीय प्रकाश के कारण तलातल में दिन और रात का कोई भौतिक भेद नहीं होता। दिन और रात का विभाजन न होने के कारण, यहाँ के निवासियों को 'काल' के व्यतीत होने का भान नहीं होता, और परिणामस्वरूप उन्हें काल के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले भय का अनुभव नहीं होता।
विष्णु पुराण के अनुसार, यद्यपि यहाँ सूर्य का प्रकाश सीधे नहीं पहुँचता, किंतु यहाँ के वातावरण में एक ऐसा मृदु और सुखद उजाला फैला रहता है जिसमें सूर्य की तपन या दाहकता नहीं होती। इसी प्रकार, यहाँ जो प्रकाश होता है, वह चंद्रमा की भाँति प्रकाशमान तो होता है, किंतु उसमें शीतलता का वह कष्टकारी प्रभाव नहीं होता जो मनुष्यों को पृथ्वी पर शीत ऋतु में अनुभव होता है। यह एक ऐसा वातानुकूलित और सर्वदा वसंत ऋतु के समान स्थिर रहने वाला वातावरण है जहाँ कोई भी प्राकृतिक आपदा नहीं आती। इस लोक में अनेक सुरम्य वन, नदियाँ, स्वच्छ जल से भरे सरोवर और कमल-पुष्पों से आच्छादित ताल विद्यमान हैं।
तलातल का वायुमंडल सदैव अत्यंत सुवासित रहता है। यहाँ निवास करने वाली दानव और दैत्य कन्याएँ विभिन्न प्रकार के दुर्लभ विलेपनों, अगरु, कुमकुम और चंदन का लेप करती हैं, जिसकी सुगंध संपूर्ण लोक की वायु में घुली रहती है। इसके अतिरिक्त, तलातल की वायु में सर्वत्र मधुर संगीत की ध्वनियाँ गूँजती रहती हैं। वीणा, वंशी, मृदंग, और नगाड़ों की ध्वनि के साथ-साथ कोयल और अन्य सुरीले पक्षियों का कलरव इस लोक के वातावरण को अत्यंत मादक और विलासितापूर्ण बनाता है। यहाँ के निवासियों के शरीर में स्वेद (पसीना) नहीं आता, उन्हें बुढ़ापा नहीं घेरता, उनके बालों में सफेदी नहीं आती और वे किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक रोग से ग्रसित नहीं होते। यहाँ जीवन ऊर्जा का स्रोत भौतिक नहीं, अपितु पूर्णतया मायावी और तपोबल से रचित है।
तलातल के निवासी: दैत्य, दानव, राक्षस और उनकी जीवन शैली
तलातल लोक मुख्य रूप से दानवों, दैत्यों, और मायावी असुरों का निवास स्थान है। यहाँ नागों और राक्षसों की कुछ विशिष्ट और शक्तिशाली प्रजातियाँ भी निवास करती हैं। ब्रह्माण्ड पुराण (प्रक्रिया पाद, अध्याय 20) और वायु पुराण के विस्तृत विवरण के अनुसार, चौथे अधोलोक (तलातल/गभस्तिमत्) में कालनेमि, गजकर्ण, और कुंजर जैसे अत्यंत शक्तिशाली दैत्यों और दानवों के भव्य नगर स्थापित हैं। इसी लोक में सुमाली नामक एक प्रमुख और अत्यंत बलशाली राक्षस का एक विस्तृत और विशाल नगर भी स्थित है। इसके अतिरिक्त मुंज, लोकनाथ, वृकवक्त्र और वैनतेय जैसे मायावी प्राणियों के आवास भी इसी पीली मृदा वाले तलातल लोक में विद्यमान हैं। वैनतेय के नगर के विषय में यह भी बताया गया है कि वह नगर अनेक प्रकार के विशाल और मायावी पक्षियों से भरा हुआ है।
तलातल के निवासी स्वभाव से अत्यंत समृद्ध, शक्तिशाली और भोग-विलासिता में डूबे रहने वाले हैं। विष्णु पुराण के अनुसार, दनु के पुत्र (दानव) और दिति के पुत्र (दैत्य) यहाँ के उत्तम व्यंजनों और तीक्ष्ण मदिरा का निरंतर पान करते हैं और इंद्रिय सुखों में इतने मग्न रहते हैं कि उन्हें यह भान ही नहीं होता कि समय कितनी गति से व्यतीत हो रहा है। यहाँ की दानव और दैत्य कन्याएँ अत्यंत रूपवती हैं। वे बहुमूल्य रत्नों से जड़े हुए आभूषण धारण करती हैं और सदैव प्रसन्नचित्त रहती हैं। उनका रूप-सौंदर्य और आकर्षण इतना तीव्र होता है कि वे किसी परम तपस्वी या मुक्त पुरुष को भी अपने मोहपाश में बाँधकर उसका पतन कर सकती हैं।
आध्यात्मिक और चेतनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो तलातल के निवासियों की प्रकृति अत्यंत भौतिकवादी और तामसिक होती है। उनके पास धन, ऐश्वर्य, शारीरिक शक्ति और मायावी विद्याओं का असीम भंडार है, किंतु उनके भीतर आध्यात्मिक दृष्टि और वैराग्य का पूर्णतया अभाव होता है। वे सत्य और परमार्थ से विमुख रहते हैं। वे अपने अहंकार और हठ के कारण यह मानते हैं कि उनका लोक और उनकी शक्तियाँ अजेय हैं। उनकी चेतना में भगवान के प्रति समर्पण का भाव नहीं होता, बल्कि माया के प्रति आसक्ति और इन्द्रियतृप्ति ही उनके जीवन का मूल केंद्र होती है। इस लोक की ऊर्जा को 'तामिस्र' भी कहा गया है, जो लोभ, कपट और आत्म-संरक्षण की अत्यंत तीव्र वृत्ति को जन्म देती है।
तलातल के अधिपति: मायावी दानवेन्द्र मय का विस्तृत परिचय
समस्त प्रामाणिक पुराणों—श्रीमद्भागवत, शिव पुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण—के अनुसार तलातल लोक के एकछत्र शासक और अधिपति 'मय दानव' हैं। मय दानव महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दनु के पुत्र हैं, जिसके कारण वे दानवों के राजा (दानवेन्द्र) कहलाते हैं। कुछ पुराणों के अन्य कल्पों के वृत्तांत में उन्हें विप्रचित्ति और सिंहिका का पुत्र तथा राहु का भाई भी बताया गया है, जो उनकी वंशावली की जटिलता को दर्शाता है। मय दानव को समस्त मायावियों का आचार्य माना जाता है। जिस प्रकार देवताओं के कार्यों के लिए विश्वकर्मा को प्रधान वास्तुकार माना जाता है, ठीक उसी प्रकार असुरों, दैत्यों और दानवों के समस्त अलौकिक निर्माण कार्यों के प्रधान वास्तुकार मय दानव हैं।
मय दानव के भीतर भ्रम पैदा करने वाली जादुई वास्तुकला की अद्वितीय और अकल्पनीय क्षमता है। वे भौतिक वास्तविकता को माया के आवरण से ढँक देने में सिद्धहस्त हैं। द्वापर युग में जब पांडवों ने खांडव वन का दहन किया था, तब मय दानव ने अर्जुन की शरण ली थी। अर्जुन द्वारा प्राणदान दिए जाने के कृतज्ञता स्वरूप ही मय दानव ने युधिष्ठिर के लिए इन्द्रप्रस्थ में 'मय सभा' का निर्माण किया था, जिसमें जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल होने का भ्रम होता था, जिसके कारण दुर्योधन को अपमानित होना पड़ा था। इसके अतिरिक्त, रामायण के संदर्भ में, मय दानव की पत्नी का नाम हेमा (जो एक अप्सरा थीं) था। हेमा और मय के पुत्रों का नाम मायावी और दुंदुभि था (जिनका वध बाद में वानरराज बालि ने किया था), और इनकी एक दत्तक/वास्तविक पुत्री 'मंदोदरी' थी, जिसका विवाह लंकापति रावण से हुआ था।
तलातल लोक पर मय दानव का यह अबाध आधिपत्य उनके एक विशिष्ट तपोबल और भगवान शिव की असीम कृपा का परिणाम है। मय दानव यहाँ अपनी रानियों, पुत्रों, मंत्रियों और मायावी असुरों की विशाल सेना के साथ पूर्ण ऐश्वर्य में निवास करते हैं। उनका संपूर्ण प्रशासन जादू, भ्रम, तंत्र और भौतिक ऐश्वर्य पर आधारित है, और वे इस लोक के चप्पे-चप्पे पर अपनी माया का विस्तार किए हुए हैं।
त्रिपुर दहन की महाकथा: मय दानव को तलातल की प्राप्ति और शिव की कृपा
तलातल लोक के इतिहास और मय दानव के इस लोक के स्थायी अधिपति बनने के पीछे शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खण्ड) और मत्स्य पुराण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत कथा वर्णित है, जिसे 'त्रिपुर दहन' के नाम से जाना जाता है। यह कथा स्पष्ट करती है कि किस प्रकार मय दानव ने अपनी बुद्धिमत्ता और शिव भक्ति के कारण मृत्यु को मात दी और तलातल का साम्राज्य प्राप्त किया।
कथा के अनुसार, जब भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) ने तारकासुर का वध कर दिया, तो तारकासुर के तीन अत्यंत बलशाली पुत्रों—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली—ने देवताओं से प्रतिशोध लेने की ठानी। इन तीनों ने मेरु पर्वत पर जाकर ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए, तो इन तीनों असुरों ने अमरता का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी द्वारा यह स्पष्ट करने पर कि अमरता का वरदान सृष्टि के नियमों के विरुद्ध है, असुरों ने ब्रह्मा जी से तीन अजेय और अंतरिक्ष में उड़ने वाले नगरों (त्रिपुर) की माँग की। उन्होंने एक अत्यंत जटिल शर्त रखी कि ये तीनों नगर केवल एक हजार वर्ष में एक बार, ठीक मध्याह्न के समय (अभिजित मुहूर्त में) जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में हो, केवल एक पल के लिए एक सीध में आएँगे। उस एक पल में यदि कोई परम शक्तिमान देवता एक ही बाण से इन तीनों नगरों को एक साथ भेद दे, केवल तभी उनकी मृत्यु हो सकेगी। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहा और महान वास्तुकार मय दानव को इन नगरों के निर्माण का आदेश दिया।
आदेश पाकर मय दानव ने अपने असीम मायावी ज्ञान से तीन अद्भुत और अभेद्य नगरों का निर्माण किया: सबसे बड़े भाई तारकाक्ष के लिए स्वर्ग में 'स्वर्ण' (सोने) का नगर, मँझले भाई कमलाक्ष के लिए अंतरिक्ष (आकाश) में 'रजत' (चाँदी) का नगर, और सबसे छोटे भाई विद्युन्माली के लिए पृथ्वी पर 'लौह' (लोहे) का नगर। ये नगर कल्पवृक्षों, हाथियों, घोड़ों, विमानों और शिव मंदिरों से सुसज्जित थे। मय दानव स्वयं भी इन असुरों के कल्याण की कामना से इन नगरों में निवास करने लगे। इन नगरों को प्राप्त कर त्रिपुरासुरों ने अपनी शक्ति के मद में तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया, ऋषियों का संहार किया और देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया।
त्रस्त होकर देवराज इन्द्र के नेतृत्व में सभी देवता भगवान शिव की शरण में गए। शिव ने देवताओं की रक्षा का भार उठाया। विश्वकर्मा ने देवताओं के संपूर्ण तेज से शिव के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया, जिसमें स्वयं ब्रह्मा जी सारथी बने, सूर्य और चंद्र उस रथ के पहिए बने, सुमेरु पर्वत धनुष बना, वासुकि नाग प्रत्यंचा बने, और स्वयं भगवान विष्णु उस अचूक बाण (पाशुपतास्त्र) के रूप में अवस्थित हुए। युद्ध के दौरान, जब असुर मरने लगे, तो मय दानव ने अपनी मायावी विद्या से एक ऐसा अमृत-कुण्ड बना लिया जिसमें गिरने वाले मृत दानव तुरंत जीवित और पहले से अधिक शक्तिशाली हो जाते थे। इस घोर माया को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं एक गौ (गाय) का रूप धारण किया और ब्रह्मा जी ने बछड़े का रूप धारण कर उस कुण्ड का सारा अमृत पी लिया, जिससे असुरों की जीवन शक्ति क्षीण हो गई।
अंततः, एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर जब वह विशेष मुहूर्त आया और पुष्य नक्षत्र में तीनों नगर एक रेखा में संरेखित हुए, तो भगवान शिव ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची और उस भयंकर बाण को छोड़ दिया। उस एक बाण ने तीनों मायावी नगरों को एक ही पल में भस्म कर दिया। इस प्रचंड घटना के बाद भगवान शिव संपूर्ण ब्रह्माण्ड में 'त्रिपुरारी' (त्रिपुर के शत्रु) के नाम से विख्यात हुए।
यद्यपि इस अग्नि में तीनों पुर और सभी दुष्ट दानव भस्म हो गए, किंतु मय दानव बच गए। मय दानव मूलतः एक शिव भक्त थे और उन्होंने देवताओं के विनाश में प्रत्यक्ष रूप से कोई विध्वंसक कार्य नहीं किया था, वे केवल वास्तुकार का अपना कर्तव्य निभा रहे थे। भगवान शिव उनकी अद्वितीय वास्तुकला, बुद्धिमत्ता और अप्रत्यक्ष समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए। शिव जी ने मृत्यु से बचाकर मय दानव को एक विशेष वरदान दिया और पाताल के चौथे लोक 'तलातल' का संपूर्ण साम्राज्य और आधिपत्य उन्हें सौंप दिया। शिव ने उन्हें यह अभय दान भी दिया कि उनके ऊपर भविष्य में किसी भी देवता या अस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा और शिव स्वयं उनके लोक की रक्षा करेंगे। तभी से तलातल लोक मय दानव का शाश्वत निवास बन गया।
श्रीमद्भागवत पुराण के परिप्रेक्ष्य में तलातल: मूल श्लोक एवं शास्त्रीय व्याख्या
तलातल लोक और मय दानव की स्थिति को अत्यंत स्पष्टता और दार्शनिक गहराई के साथ श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध, चौबीसवें अध्याय के अट्ठाईसवें श्लोक (5.24.28) में वर्णित किया गया है। यह श्लोक तलातल के अधिपति की मानसिक स्थिति और भगवान शिव की कृपा का प्रमाण है:
ततोऽधस्तात्तलातले मयो नाम दानवेन्द्रस्त्रिपुराधिपतिर्भगवता पुरारिणा त्रिलोकीशं चिकीर्षुणा निर्दग्धस्वपुरत्रयस्तत्प्रसादाल्लब्धपदो मायाविनामाचार्यो महादेवेन परिरक्षितो विगतसुदर्शनभयो महीयते ॥ 28 ॥
इस संस्कृत श्लोक का शब्दशः (पदार्थ) और विस्तृत अर्थ इस प्रकार है: 'ततः अधस्तात्' (सुतल लोक के नीचे); 'तलातले' (तलातल नामक लोक में); 'मयः नाम' (मय नाम का); 'दानवेन्द्रः' (दानवों का राजा); 'त्रिपुराधिपतिः' (जो तीन नगरों का स्वामी था); 'भगवता पुरारिणा' (भगवान शिव, जिन्हें पुरारि कहा जाता है, उनके द्वारा); 'त्रिलोकीशं चिकीर्षुणा' (तीनों लोकों का कल्याण चाहने की इच्छा से); 'निर्दग्ध-स्वपुरत्रयः' (जिसके तीनों नगर भस्म कर दिए गए थे); 'तत्प्रसादात् लब्ध-पदः' (किंतु बाद में उन्हीं शिव की कृपा से जिसने यह राज्य/पद प्राप्त किया); 'मायाविनाम् आचार्यः' (जो समस्त मायावियों और जादूगरों का आचार्य या गुरु है); 'महादेवेन परिरक्षितः' (भगवान महादेव द्वारा जो पूर्ण रूप से संरक्षित है); 'विगत-सुदर्शन-भयः' (और इसी कारण जिसके भीतर से परम पुरुषोत्तम भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का भय भी समाप्त हो गया है); 'महीयते' (वह अत्यंत ऐश्वर्य के साथ पूजा जाता है और निवास करता है)।
शास्त्र की दृष्टि से इस श्लोक का भावार्थ अत्यंत गूढ़ है। शुकदेव गोस्वामी बताते हैं कि मय दानव, जो समस्त मायावी विद्याओं का जनक है, सुतल लोक के नीचे तलातल में पूर्ण ऐश्वर्य के साथ राज्य करता है। त्रिपुर दहन के समय भगवान शिव ने उसके नगरों को जला दिया था, किंतु उसकी कला और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने ही उसे यह लोक प्रदान किया और उसकी रक्षा का वचन दिया। इस दैवीय सुरक्षा के कारण मय दानव के भीतर एक मिथ्या अहंकार उत्पन्न हो गया है। वह यह 'झूठा विश्वास' कर बैठा है कि चूँकि महादेव स्वयं उसके रक्षक हैं, इसलिए अब उसे परमेश्वर भगवान विष्णु के अजेय 'सुदर्शन चक्र' से भी डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। भागवत पुराण यहाँ यह दार्शनिक संदेश देता है कि माया के आवरण में फँसा हुआ जीव, चाहे वह मय दानव जितना बड़ा ज्ञानी और शिव का कृपापात्र ही क्यों न हो, भगवान की परम सत्ता और काल रूपी सुदर्शन चक्र के प्रभाव को भूलने की भूल कर बैठता है।
विभिन्न प्रामाणिक पुराणों में तलातल का तुलनात्मक वर्गीकरण
यद्यपि सभी पुराणों में ब्रह्माण्ड के चौदह लोकों का वर्णन है, किंतु विभिन्न कल्पों के भेदों के कारण लोकों के नामों और उनके धरातल की प्रकृति में कुछ विविधताएँ मिलती हैं। इन विविधताओं का तुलनात्मक अध्ययन इस लोक की महत्ता को और अधिक स्पष्ट करता है।
| लोक का क्रम (ऊपर से नीचे) |
श्रीमद्भागवत / पद्म / शिव पुराण के अनुसार |
विष्णु / ब्रह्माण्ड / वायु पुराण के अनुसार |
धरातल / मृदा की प्रकृति (विष्णु / ब्रह्माण्ड) |
प्रमुख अधिपति एवं निवासी |
| प्रथम अधोलोक |
अतल |
अतल |
कृष्ण (काली मिट्टी) |
बल (मय दानव का पुत्र), नमुचि |
| द्वितीय अधोलोक |
वितल |
वितल / सुतल |
पाण्डुर (श्वेत / सफेद मिट्टी) |
भगवान हाटकेश्वर (शिव का रूप), महाजम्भ |
| तृतीय अधोलोक |
सुतल |
नितल / तलातल |
अरुण (नीली/भूरी मिट्टी) |
दैत्यराज बलि, प्रह्लाद |
| चतुर्थ अधोलोक |
तलातल |
गभस्तिमत् / गभस्तल (तलातल) |
पीत (पीले रंग की स्वर्णमयी मिट्टी) |
मय दानव (मायावियों का आचार्य), कालनेमि, सुमाली |
| पंचम अधोलोक |
महातल |
महातल / तल |
शर्करा (कंकरीली / बजरी) |
अनेक फनों वाले नाग (कद्रु के पुत्र), विरोचन |
| षष्ठम अधोलोक |
रसातल |
सुतल / रसातल |
अश्म (पथरीली / चट्टानी) |
दैत्य, दानव, नागराज वासुकि (मित्र) |
| सप्तम अधोलोक |
पाताल (नागलोक) |
पाताल |
सुवर्णमयी (विशुद्ध सोने की) |
शंख, वासुकि, मुचुकुंद |
(यह सारणी विष्णु पुराण 2.5 , ब्रह्माण्ड पुराण 2. , श्रीमद्भागवत 5.2.4 एवं वायु पुराण के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है)
जैसा कि सारणी से स्पष्ट है, श्रीमद्भागवत और शिव पुराण में जिसे 'तलातल' कहा गया है, विष्णु और ब्रह्माण्ड पुराण में उसी चौथे लोक को 'गभस्तिमत्' या वायु पुराण में 'गभस्तल' कहा गया है। मार्कण्डेय पुराण और देवी भागवत पुराण में भी तलातल को सात अधोलोकों की शृंखला में चौथे स्थान पर ही रखा गया है। देवी भागवत में स्पष्ट किया गया है कि तलातल वह गुफा है जहाँ सभी ऋतुओं में भौतिक सुखों का निर्बाध भोग किया जा सकता है।
कर्म सिद्धांत: तलातल (बिल-स्वर्ग) की प्राप्ति के शास्त्रीय कारण
सनातन धर्म के कर्म सिद्धांत के अनुसार, जीवात्मा का किसी भी लोक में गमन एक आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उसके द्वारा किए गए संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों का प्रत्यक्ष परिणाम है। तलातल लोक चूँकि एक 'बिल-स्वर्ग' है, अतः यहाँ उन जीवात्माओं का जन्म होता है जिन्होंने अपने पूर्व जन्मों (मनुष्य योनि) में घोर तपस्या, दान, और यज्ञ तो किए हैं, किंतु उनका उद्देश्य कभी भी आत्म-कल्याण या ईश्वर प्राप्ति नहीं रहा। इसके विपरीत, उनके कर्म विशुद्ध रूप से भौतिक ऐश्वर्य, शारीरिक सुख, शक्ति और विलासिता प्राप्त करने की लालसा से प्रेरित थे।
पुराणों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने जीवन में मायावी विद्याओं, तंत्र-मंत्र और जादू-टोने का दुरुपयोग करते हैं, और जो अपनी आत्म-संरक्षण की प्रवृत्ति में इतने अंधे हो जाते हैं कि वे परमसत्य को नकार देते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् तलातल लोक को प्राप्त करते हैं। इस लोक को प्राप्त करने वाले जीवों के पुण्य कर्म इतने प्रबल होते हैं कि उन्हें न तो नरक की यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं और न ही उन्हें रोग, वृद्धावस्था या दरिद्रता का मुख देखना पड़ता है। वे हजारों वर्षों तक दिव्य मदिरा, सुंदरी स्त्रियों और अतुलनीय ऐश्वर्य का भोग करते हैं। किंतु, उनका आध्यात्मिक स्तर शून्य होता है। उनके भीतर का 'अहंकार' इतना प्रबल होता है कि वे यह समझ ही नहीं पाते कि वे परमेश्वर की माया में बँधे हुए हैं। वे देवराज इन्द्र के स्वर्ग से भी अधिक सुख भोगते हैं, परंतु यह सुख अस्थायी है। जब उनके पुण्यों का क्षय हो जाता है, तो उन्हें पुनः पृथ्वी लोक (भूर्लोक) पर जन्म लेना पड़ता है। इसलिए, तलातल को मोक्ष के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा माना गया है, क्योंकि यहाँ की चकाचौंध और मायावी विलासिता जीव को ईश्वर के विस्मरण की ओर ले जाती है और वह जन्म-मरण के चक्र (संसार) में अनंत काल तक फँसा रहता है।
इस प्रकार, प्रामाणिक वैदिक और पौराणिक ग्रंथों के गहन और सर्वांगीण अन्वेषण से यह सिद्ध होता है कि 'तलातल' मात्र पृथ्वी के गर्भ में स्थित एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह भौतिक सृष्टि के चरम ऐश्वर्य, मायावी भ्रम और आध्यात्मिक अज्ञानता का प्रतीक है। मय दानव के कुशल आधिपत्य और भगवान शिव के संरक्षण में स्थित यह लोक, ब्रह्माण्ड की उस विलक्षण संरचना को दर्शाता है जहाँ चरम सुख तो उपलब्ध है, किंतु शाश्वत शांति और मोक्ष केवल भगवान के श्रीचरणों के प्रति निश्छल समर्पण में ही निहित है।