विस्तृत उत्तर
द्रौपदी और अश्वत्थामा की कथा करुणा और धर्म की कठिन परीक्षा दिखाती है। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काटकर दुर्योधन को भेंट किए। पुत्रों की मृत्यु सुनकर द्रौपदी अत्यंत दुखी हुई और रोने लगी। अर्जुन ने उसे सांत्वना दी और अपराधी का सिर लाने की प्रतिज्ञा की। बाद में अर्जुन ने अश्वत्थामा को बाँधकर द्रौपदी के सामने लाया। निंदित कर्म करने के कारण अश्वत्थामा का मुख झुका हुआ था, फिर भी द्रौपदी का कोमल हृदय करुणा से भर गया। उसने कहा कि उसे छोड़ दिया जाए, क्योंकि वह ब्राह्मण और गुरु-पुत्र है। उसने यह भी कहा कि जैसे वह पुत्र-वियोग में रो रही है, वैसे ही कृपी न रोए। युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन, कृष्ण और उपस्थित जनों ने द्रौपदी की करुणामयी बात का समर्थन किया।
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