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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.7, श्लोक 14-17, 41-50⏱ 1 मिनट पठन

द्रौपदी और अश्वत्थामा की कथा क्या है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों को मारा, पर बँधा हुआ लाए जाने पर द्रौपदी ने गुरु-पुत्र और ब्राह्मण समझकर उसे छोड़ने को कहा।

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विस्तृत उत्तर

द्रौपदी और अश्वत्थामा की कथा करुणा और धर्म की कठिन परीक्षा दिखाती है। अश्वत्थामा ने द्रौपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काटकर दुर्योधन को भेंट किए। पुत्रों की मृत्यु सुनकर द्रौपदी अत्यंत दुखी हुई और रोने लगी। अर्जुन ने उसे सांत्वना दी और अपराधी का सिर लाने की प्रतिज्ञा की। बाद में अर्जुन ने अश्वत्थामा को बाँधकर द्रौपदी के सामने लाया। निंदित कर्म करने के कारण अश्वत्थामा का मुख झुका हुआ था, फिर भी द्रौपदी का कोमल हृदय करुणा से भर गया। उसने कहा कि उसे छोड़ दिया जाए, क्योंकि वह ब्राह्मण और गुरु-पुत्र है। उसने यह भी कहा कि जैसे वह पुत्र-वियोग में रो रही है, वैसे ही कृपी न रोए। युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन, कृष्ण और उपस्थित जनों ने द्रौपदी की करुणामयी बात का समर्थन किया।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.7, श्लोक 14-17, 41-50
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

द्रौपदी और अश्वत्थामा की कथा क्या है को संदर्भ सहित समझें

द्रौपदी और अश्वत्थामा की कथा क्या है का सबसे सीधा सार यह है: अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पुत्रों को मारा, पर बँधा हुआ लाए जाने पर द्रौपदी ने गुरु-पुत्र और ब्राह्मण समझकर उसे छोड़ने को कहा।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.7, श्लोक 14-17, 41-50 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.7, श्लोक 14-17, 41-50 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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