संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत: संपूर्ण, प्रामाणिक एवं पारंपरिक कथा-प्रस्तुति
हिंदू धर्मशास्त्रों, विशेषकर 'भविष्य पुराण', 'नृसिंह पुराण', 'गणेश पुराण' और 'व्रतराज' जैसे निबंध व व्रत-ग्रंथों में संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत का अत्यंत महिमामंडित और विशद वर्णन प्राप्त होता है । संस्कृत भाषा के 'संकट' (जिसका तात्पर्य जीवन के दारुण कष्ट, विघ्न अथवा बाधा से है) और 'हर' (अर्थात समूल निवारण करने वाला) शब्दों के दार्शनिक व शाब्दिक मेल से 'संकष्टी' शब्द की उत्पत्ति हुई है । हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह परम कल्याणकारी व्रत अनुष्ठित किया जाता है ।
शास्त्रों का यह अटूट मत है कि जो भी प्राणी पूर्ण श्रद्धा, संयम और भक्ति-भाव से इस व्रत को धारण करता है, भगवान विघ्नहर्ता गजानन उसके लौकिक और पारलौकिक, दोनों ही प्रकार के संकटों का तत्काल निवारण कर देते हैं । पारंपरिक विधान के अनुसार, वर्ष के बारह महीनों (और एक अधिक मास) में आने वाली प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के भिन्न-भिन्न स्वरूपों और उनके विशिष्ट पीठों (आसनों) की उपासना का कठोर शास्त्रीय नियम है । इसे निम्नलिखित प्रामाणिक तालिका के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
| हिंदू मास (कृष्ण पक्ष) | भगवान गणेश का पूजनीय स्वरूप | पीठ (आसन) का नाम |
|---|---|---|
| चैत्र | विकट महागणपति | श्रीचक्र पीठ |
| वैशाख | चाणक्र राज एकदंत गणपति | श्रीचक्र पीठ |
| ज्येष्ठ | कृष्ण पिंगल महागणपति | श्री शक्ति पीठ |
| आषाढ़ | गजानन गणपति | विष्णु पीठ |
| श्रावण | हेरम्ब महागणपति | गणपति पीठ |
| भाद्रपद | विघ्नराज महागणपति | - |
| आश्विन | वक्रतुंड महागणपति | - |
| कार्तिक | गणाधिप महागणपति | शिव पीठ |
| मार्गशीर्ष | अखुरथ महागणपति | दुर्गा पीठ |
| पौष | लम्बोदर महागणपति | सौर पीठ |
| माघ | द्विजप्रिय महागणपति | सामान्य देव पीठ |
| फाल्गुन | भालचंद्र महागणपति | आगम पीठ |
| अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) | विभुवन पालक महागणपति | दूर्वा बिल्व पत्र पीठ |
तालिका स्रोत:
चूँकि विभिन्न कल्पों, युगों और पुराणों में भगवान गणेश की उपासना व उनके प्राकट्य के भिन्न-भिन्न प्रसंग प्राप्त होते हैं, अतः पारंपरिक रूप से इस व्रत की कई कथाएँ प्रचलित हैं जो विभिन्न मासों में पढ़ी जाती हैं । शास्त्रीय निर्देशों का कठोरता से पालन करते हुए, इस आलेख में उन सभी प्रमुख एवं प्रामाणिक कथा-संस्करणों को उनके पूर्ण, अक्षुण्ण और पारंपरिक स्वरूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें किसी भी प्रकार का लेखक-कल्पित अंश या आधुनिक विस्तार सम्मिलित नहीं है。
प्रथम संस्करण: श्री कृष्ण-युधिष्ठिर संवाद (रामायण प्रसंग)
यह संकष्टी चतुर्थी व्रत की सर्वाधिक प्रामाणिक और पारंपरिक कथाओं में से एक है, जिसका मूल संदर्भ 'भविष्य पुराण' और 'नृसिंह पुराण' में प्राप्त होता है । मार्गशीर्ष एवं कार्तिक मास की गणाधिप संकष्टी चतुर्थी के अवसर पर पारंपरिक रूप से इसी कथा का वाचन किया जाता है ।
१. कथा का प्रारंभिक संदर्भ
- कथा किसने किससे कही: योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने पाण्डव श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर से यह कथा कही ।
- किस प्रसंग में यह व्रत-कथा सुनाई गई: द्वापर युग में जब कौरवों से द्यूत-क्रीड़ा (चौसर) में अपना संपूर्ण राज्य हारकर पाण्डव द्वैत वन में निर्वासन (वनवास) का अत्यंत दारुण और कष्टदायक जीवन व्यतीत कर रहे थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने व्यथित होकर भगवान कृष्ण से अपने कष्टों, शत्रुओं के भय और राज्य-प्राप्ति में आ रही निरंतर बाधाओं को दूर करने का कोई अचूक, प्रामाणिक और गुप्त उपाय पूछा ।
- मूल शास्त्रीय आधार: युधिष्ठिर की जिज्ञासा शांत करने हेतु भगवान कृष्ण ने 'भविष्य पुराण' के ज्ञान का आश्रय लेते हुए बताया कि यह व्रत-रहस्य अत्यंत प्राचीन है। उन्होंने त्रेता युग के रामायण काल का एक अत्यंत गूढ़ दृष्टांत देते हुए इस महाव्रत की महिमा का सविस्तार वर्णन किया ।
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
राजा दशरथ का आखेट और संकट की उत्पत्ति: भगवान श्री कृष्ण बोले— "हे धर्मराज! एकाग्र चित्त होकर श्रवण करें। प्राचीन काल में, त्रेता युग के अंतर्गत इक्ष्वाकु वंश में अयोध्या नगरी के एक महान और अत्यंत प्रतापी राजा हुए, जिनका नाम दशरथ था। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण अपनी सगी संतान की भाँति किया करते थे। एक बार राजा दशरथ अपने रथ पर आरूढ़ होकर सघन वन में आखेट (शिकार) खेलने हेतु गए। रात्रि के घोर अंधकार में एक शांत जलाशय के समीप श्रवण कुमार नामक एक अत्यंत आज्ञाकारी और मातृ-पितृ भक्त पुत्र अपने अंधे एवं वृद्ध माता-पिता की तीव्र प्यास बुझाने हेतु अपने कमंडल में जल भर रहा था ।
जब श्रवण कुमार के कमंडल में जल भरने की 'गड़-गड़' ध्वनि उत्पन्न हुई, तो दूर खड़े राजा दशरथ ने उस ध्वनि को किसी जंगली पशु (गज अथवा व्याघ्र) के जल पीने की आहट समझ लिया। दृष्टि बाधित होने के कारण उन्होंने ध्वनि की दिशा में अपना अचूक शब्दभेदी बाण छोड़ दिया। वह बाण सीधे जाकर श्रवण कुमार के वक्षस्थल में लगा और वह 'हा राम!' कहता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। अज्ञानतावश हुए इस प्रहार से श्रवण कुमार की वहीं पर मृत्यु हो गई ।
जब राजा दशरथ ने अत्यंत पश्चाताप और ग्लानि से भरकर श्रवण कुमार के अंधे एवं असहाय माता-पिता को यह हृदय विदारक समाचार दिया, तो पुत्र-शोक में करुण विलाप करते हुए उन वृद्ध माता-पिता ने राजा दशरथ को एक भयंकर शाप दे दिया— 'हे राजन्! जिस प्रकार आज हम दोनों अपने एकमात्र पुत्र के वियोग में तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग रहे हैं, ठीक उसी प्रकार एक दिन तुम भी अपने सबसे प्रिय पुत्र के वियोग में इसी प्रकार तड़प कर अपने प्राण त्यागोगे।' यह शाप देकर दोनों वृद्धों ने प्राण छोड़ दिए। समय व्यतीत हुआ और उस दारुण शाप के प्रभाव से राजा दशरथ को अपनी तीसरी पत्नी कैकेयी के वचनों और हठ में बंधकर अपने सबसे ज्येष्ठ और प्रिय पुत्र श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास देना पड़ा। पुत्र-वियोग के उसी असहनीय और प्राणघातक कष्ट में राजा दशरथ ने अयोध्या में तड़प कर अपने प्राण त्याग दिए ।
महामूर्ख रावण का कृत्य एवं हनुमान जी का संकट: शाप के फलस्वरूप वनवास काल में जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, उनके अनुज भ्राता लक्ष्मण और माता सीता पंचवटी के सघन वन में निवास कर रहे थे, तब लंका के मायावी असुरराज रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया। सीता की खोज में वन-वन भटकते हुए भगवान राम की भेंट किष्किंधा पर्वत पर वानरराज सुग्रीव और उनके परम भक्त मंत्री हनुमान जी से हुई। सुग्रीव ने माता सीता की खोज में वानरों की एक विशाल सेना चारों दिशाओं में भेज दी ।
दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने वाली सेना, जिसमें पवनपुत्र हनुमान, अंगद, जाम्बवान आदि अतुलनीय वीर सम्मिलित थे, खोजते-खोजते एक अत्यंत विशाल और अथाह समुद्र के तट पर जा पहुँची। वहाँ उनकी भेंट महाबली जटायु के बड़े भाई, वृद्ध गृद्धराज संपाती से हुई। संपाती ने अपनी जन्मजात दिव्य दृष्टि से उस सौ योजन विशाल समुद्र के पार लंका नगरी में माता सीता को अशोक वाटिका में अत्यंत शोकग्रस्त अवस्था में बैठे हुए देखा। संपाती ने वानरों को सूचना दी कि जगत जननी सीताजी समुद्र के पार लंका में ही विद्यमान हैं। परंतु यह शुभ समाचार मिलते ही वानर सेना के समक्ष एक दूसरा महासंकट उत्पन्न हो गया कि इस सौ योजन के उस अथाह और मगरमच्छों से भरे विशाल समुद्र को लांघकर लंका तक कैसे जाया जाए ।
गणेश उपासना का निर्देश एवं महाव्रत का अनुष्ठान: वानर सेना जब अत्यंत हताश और निराश हो गई, तब ज्ञानी संपाती ने हनुमान जी को संबोधित करते हुए एक परम गोपनीय और संकटमोचक व्रत का उपदेश दिया। संपाती ने कहा— 'हे पवनपुत्र हनुमान! आप स्वयं रुद्रावतार और अनंत बलशाली हैं, किंतु इस महान संकट को पार करने और प्रभु श्री राम के कार्य की पूर्ण सिद्धि हेतु आपको सर्वप्रथम विघ्नविनाशक भगवान गणेश की शरण में जाना चाहिए। आप इसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आने वाले 'संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत' का नियमपूर्वक और पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें। भगवान गजानन की कृपा से विश्व का कोई भी सागर आपके लिए गोष्पद (गाय के खुर के समान) हो जाएगा।' ।
वृद्ध संपाती के शास्त्रीय उपदेशानुसार, हनुमान जी ने पूर्ण श्रद्धा, एकाग्र भक्ति और कठोर नियमों के साथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत धारण किया। उन्होंने उस दिन पूर्णतः निराहार रहकर उपवास किया और संध्याकाल में चंद्रोदय होने पर भगवान गणेश और चंद्रदेव का विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन किया। दुर्वा, मोदक और पुष्प अर्पित कर विघ्नहर्ता से कार्य-सिद्धि की प्रार्थना की。
व्रत के प्रभाव से संकट-निवारण और विजय-प्राप्ति: संकष्टी चतुर्थी के व्रत के अप्रतिम प्रभाव और भगवान गजानन के दिव्य आशीर्वाद से हनुमान जी के भीतर अपार और अकल्पनीय शक्ति का संचार हुआ। उन्होंने श्री राम का स्मरण कर एक ही भयंकर छलांग में बिना किसी विघ्न-बाधा के उस सौ योजन विशाल समुद्र को लांघ लिया। लंका पहुँचकर उन्होंने माता सीता का पता लगाया, उनका शोक दूर किया, लंका का दहन कर रावण के अभिमान को भस्म किया और लौटकर भगवान राम को शुभ सूचना दी। तदनंतर, भगवान राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की, युद्ध में रावण का वध कर महान विजय प्राप्त की और माता सीता को मुक्त कराया ।
श्री कृष्ण जी ने कथा को पूर्ण करते हुए कहा— 'हे धर्मराज युधिष्ठिर! जिस प्रकार पवनपुत्र हनुमान जी ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर असंभव को भी संभव कर दिखाया और श्री राम ने अपने अजेय शत्रुओं पर विजय प्राप्त की, ठीक उसी प्रकार आप भी इस महाव्रत का पूर्ण श्रद्धा से अनुष्ठान करें। इस व्रत के अमोघ प्रभाव से आपके समस्त शत्रुओं (कौरवों) का समूल नाश होगा, आपको वनवास के सभी कष्टों से तत्काल मुक्ति मिलेगी और आप अपना खोया हुआ इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर का अखंड राज्य पुनः प्राप्त करेंगे।' ।
भगवान श्री कृष्ण के आदेश और उपदेश के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने विधि-विधान से फाल्गुन (तथा अन्य मासों) की संकष्टी चतुर्थी का कठोर व्रत किया। भगवान गजानन की अहैतुकी कृपा से अंततः उन्होंने महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर अपना अखंड और धर्ममय राज्य पुनः प्राप्त किया ।
३. कथा का पारंपरिक उपसंहार
"जो कोई भी प्राणी अपने मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास धारण कर इस संकष्टी चतुर्थी की कथा को नियमपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है, उसके जीवन के सभी महान से महान कष्ट भगवान गणेश की कृपा से उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं जैसे प्रातःकाल सूर्य के उदय होने पर रात्रिकालीन घोर अंधकार। यह परम पवित्र व्रत राज्य की इच्छा रखने वालों को अखंड राज्य, धन की इच्छा रखने वालों को अपार धन-धान्य, विद्या की लालसा रखने वालों को उत्तम विद्या और पुत्र की कामना रखने वालों को सुयोग्य और दीर्घायु पुत्र प्रदान करता है। इस लोक में अष्ट-ऐश्वर्य और समस्त सुखों का भोग कर अंत में वह प्राणी शिव-सान्निध्य और मोक्ष को प्राप्त होता है। ॥ इति श्री भविष्योत्तरपुराणे कृष्ण-युधिष्ठिर संवादे संकष्टनाशनं गणेश चतुर्थी व्रत कथा सम्पूर्णा ॥" ।
द्वितीय संस्करण: राजा शूरसेन और पाप-दृष्टि विमान (गणेश पुराण प्रसंग)
यह कथा मुख्य रूप से 'गणेश पुराण' (क्रीड़ा खण्ड/उपासना खण्ड के अध्याय 33 से 77 के मध्य) में वर्णित है और संकष्टी व्रत के प्रभाव की अलौकिकता और पापनाशक शक्ति को प्रामाणिक रूप से सिद्ध करती है ।
१. कथा का प्रारंभिक संदर्भ
- कथा किसने किससे कही: यह प्रसंग देवराज इन्द्र और गणेश जी के देवदूतों ने राजा शूरसेन से कहा।
- किस प्रसंग में यह व्रत-कथा सुनाई गई: जब स्वर्ग के अधिपति देवराज इन्द्र का दिव्य और प्रकाशमान विमान आकाश मार्ग से जाते हुए अचानक अवरुद्ध हो गया और एक पापी मनुष्य के भयंकर दृष्टि-दोष के कारण पृथ्वी पर उतरने के लिए विवश हो गया।
- मूल शास्त्रीय आधार: 'गणेश पुराण' में वर्णित शूरसेन और भृशुण्डी मुनि का उपाख्यान ।
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
पात्रों का परिचय एवं संकट की उत्पत्ति: प्राचीन काल में मध्य देश में सहस्रपुर नामक एक अत्यंत विशाल, समृद्ध और सुंदर नगरी थी। वहाँ शूरसेन नामक एक अत्यंत प्रतापी, धर्मनिष्ठ और पुण्यवान राजा राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम 'पुण्यशालिनी' था, जो त्रिभुवन में अपनी सुंदरता और पतिव्रत धर्म के लिए विख्यात थी। राजा शूरसेन अपनी प्रजा का पूर्ण रूप से ध्यान रखते थे और उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति व्याप्त थी। एक बार स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र, महामुनि भृशुण्डी (जो भगवान गणेश के परम भक्त और ज्ञानी थे) के दर्शन कर अपने दिव्य विमान (इन्द्र वाहन) से स्वर्गलोक की ओर लौट रहे थे ।
जब देवराज इन्द्र का वह प्रकाशमान और तीव्र गामी विमान राजा शूरसेन की सहस्रपुर नगरी के ठीक ऊपर आकाश मार्ग से गुजर रहा था, तभी राज्य में खड़े एक अत्यंत महापापी व्यक्ति की दृष्टि उस दिव्य विमान पर पड़ गई। उस व्यक्ति ने अपने पूर्व और वर्तमान जीवन में अत्यंत भयंकर कृत्य और जघन्य पाप किए थे। उसकी दूषित, मलिन और पापमयी कुदृष्टि (दृष्टि-दोष) पड़ते ही देवराज इन्द्र के उस अजेय विमान की सारी गति, ऊर्जा और पुण्य तत्काल क्षीण हो गया। अपनी शक्ति खोकर वह चमकता हुआ विमान स्तंभित हो गया और सीधा भूमि पर आ गिरा ।
विमान के पृथ्वी पर गिरने से उत्पन्न हुए तीव्र प्रकाश और चकाचौंध को देखकर राजा शूरसेन अत्यंत आश्चर्यचकित हुए। वे तत्काल अपने मंत्रियों और सेनापति सहित उस स्थान पर पहुँचे। साक्षात् देवराज इन्द्र को पृथ्वी पर संकटग्रस्त अवस्था में देखकर राजा शूरसेन ने साष्टांग दंडवत कर इन्द्र की स्तुति व वंदना की। राजा ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक पूछा— 'हे सुरेन्द्र! हे देवराज! आपका यह देव-निर्मित दिव्य विमान इस मृत्युलोक में किस कारण से अवरुद्ध हो गया है? मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?' ।
इन्द्र ने अत्यंत व्याकुल होकर उत्तर दिया— 'हे राजन् शूरसेन! आपके राज्य में रहने वाले किसी घोर पापी और नीच मनुष्य की कुदृष्टि मेरे इस देव-विमान पर पड़ी है, जिसके घोर पाप के भार से इस विमान का सारा पुण्य नष्ट हो गया है। अब यह विमान अपनी शक्ति से उड़ने में पूर्णतः असमर्थ है। यह विमान अब केवल तभी आकाश में पुनः उड़ सकता है, जब कोई ऐसा परम पुण्यात्मा मनुष्य, जिसने अपने जीवन में पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और नियम से 'संकष्टी गणेश चतुर्थी' का महाव्रत किया हो, वह अपने उस व्रत का पुण्य मेरे इस विमान को संकल्प पूर्वक दान कर दे।' ।
संकट-निवारण का राजसी प्रयास और निराशा: यह सुनकर राजा शूरसेन ने तत्काल अपने सैनिकों को संपूर्ण राज्य में भेजा कि वे अविलंब किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ कर लाएँ जिसने संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया ہو۔ सैनिकों ने संपूर्ण नगर छान मारा, घर-घर जाकर पूछताछ की, परंतु दुर्भाग्यवश उस विशाल नगरी में किसी ने भी महामुनि भृशुण्डी द्वारा वर्णित शास्त्रीय विधि से विघ्नहर्ता भगवान गणेश का वह महाव्रत नहीं किया था। जब सैनिक खाली हाथ लौटे, तो देवराज इन्द्र और राजा शूरसेन अत्यंत निराश और हताश हो गए ।
चमत्कार की उत्पत्ति और वायु का स्पर्श: उसी समय नगर के बाहर एक अत्यंत अद्भुत और आश्चर्यजनक घटना घटी। भगवान गजानन के दिव्य दूत एक मृत स्त्री की आत्मा को अत्यंत सम्मान के साथ अपने दिव्य विमान में बिठाकर गणेश लोक (स्वानंद लोक) ले जा रहे थे। वह स्त्री अपने जीवन भर चांडालिनी की तरह रही थी और उसे स्वयं भी यह ज्ञात नहीं था कि उसने कब कोई पुण्य या व्रत किया है। यमराज के दूत भी उस स्त्री को नरक ले जाने के लिए वहाँ उपस्थित थे। परंतु यमदूतों को बलपूर्वक रोककर गणेश दूतों ने बताया कि उस स्त्री ने जीवन में अनजाने में ही सही, कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी के दिन निराहार रहकर केवल रात्रि में चंद्र दर्शन के पश्चात ही अन्न ग्रहण किया था। अनजाने में उपवास करने के कारण भी उसे संकष्टी व्रत का अपार और अनंत पुण्य प्राप्त हो गया था, जिससे उसके सारे पूर्व पाप भस्म हो गए ।
जब देवराज इन्द्र को इस घटना का भान हुआ, तो उन्होंने हाथ जोड़कर गणेश दूतों से विनयपूर्वक प्रार्थना की कि वे उस मृत स्त्री के व्रत का थोड़ा सा पुण्य उनके विमान को दे दें ताकि वह पुनः स्वर्ग जा सकें। परंतु गणेश दूतों ने वह पुण्य दान करने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। तभी वहाँ एक महान चमत्कार हुआ। उस पुण्यात्मा स्त्री के मृत शरीर को स्पर्श करती हुई जो वायु (हवा) की लहर बह रही थी, वह बहती हुई वायु देवराज इन्द्र के उस स्थिर और शक्तिहीन विमान से जा टकराई। संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने वाली उस स्त्री के शरीर को छूने मात्र से वह वायु इतनी पवित्र, शक्तिमान और पुण्यमयी हो गई थी कि उसके स्पर्श मात्र से देवराज इन्द्र के मृतप्राय विमान में पुनः दिव्य शक्ति का संचार हो गया और वह तीव्र गति से आकाश में उड़ने लगा ।
राजा शूरसेन का संकल्प: राजा शूरसेन ने जब अपनी आँखों से एक साधारण और अनजाने में व्रत करने वाली स्त्री के पुण्य की ऐसी अकल्पनीय महिमा देखी—कि जिसके मृत शरीर को छूकर बहने वाली वायु भी इन्द्र के अवरुद्ध विमान को उड़ाने की शक्ति रखती है—तो राजा अत्यंत भाव-विभोर हो गए। उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने तत्काल अपने संपूर्ण राज्य में यह कठोर घोषणा करवा दी कि आज से इस राज्य का प्रत्येक नागरिक कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी का व्रत नियमपूर्वक अवश्य करेगा। राजा शूरसेन ने स्वयं अपनी रानी पुण्यशालिनी और संपूर्ण प्रजा सहित आजीवन इस महाव्रत का पालन किया और मृत्यु के पश्चात भगवान गणेश के परम धाम 'स्वानंद लोक' को प्राप्त हुए ।
तृतीय संस्करण: कुम्हार और ब्राह्मणी का पुत्र (लोक-परंपरा एवं सकट चौथ)
यह कथा विशेषकर माघ और फाल्गुन मास की 'सकट चौथ' (संकष्टी चतुर्थी) पर उत्तर और मध्य भारत की लोक-परंपरा में अत्यंत श्रद्धा के साथ पढ़ी जाती है । यद्यपि इसका मूल स्रोत जन-मानस की लोक-परंपरा है, परंतु पारंपरिक व्रत-पुस्तकों और 'व्रतराज' के लोक-संस्करणों में इसे विशेष और पूजनीय स्थान प्राप्त है。
१. कथा का प्रारंभिक संदर्भ
कथा का मूल आधार: माघ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी (द्विजप्रिय महागणपति स्वरूप) के अवसर पर जब माताएँ अपनी संतानों के रक्षार्थ और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला उपवास रखती हैं, तब यह कथा अनिवार्य रूप से पढ़ी जाती है ।
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
प्राचीन काल में किसी नगर में एक अत्यंत धर्मपरायण, पतिव्रता किंतु अत्यंत निर्धन ब्राह्मणी निवास करती थी। उसके पति का बहुत पहले देहांत हो चुका था और उसका एक मात्र पांच वर्षीय छोटा सा पुत्र ही उसके जीवन का एकमात्र सहारा था। वह ब्राह्मणी परम गणेश भक्त थी और अपनी निर्धनता के बावजूद प्रतिदिन गाय के गोबर से भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा बनाकर, भिक्षा में प्राप्त अन्न से उनका पूर्ण विधि-विधान से पूजन किया करती थी। वह सदैव संकष्टी चतुर्थी का कठोर व्रत धारण करती थी ।
उसी नगर में एक कुम्हार रहता था जो मिट्टी के बर्तन बनाकर अपना भरण-पोषण करता था। एक बार कुम्हार ने मिट्टी के बर्तन बनाकर आंवा (भट्टी) लगाया, परंतु कई प्रयासों के बावजूद आग ठीक से नहीं जली और सारे बर्तन कच्चे रह गए। अत्यंत चिंतित होकर वह कुम्हार राजा के दरबार में गया और फिर अज्ञानतावश एक कपटी तांत्रिक के पास जा पहुँचा। तांत्रिक ने कुम्हार को एक अत्यंत क्रूर और राक्षसी उपाय बताया— 'हे कुम्हार! तेरा आंवा अभिशप्त है। यदि तू अपने आंवे (भट्टी) में किसी छोटे और जीवित बालक की बलि दे दे (यानी उसे भट्टी में जला दे), तो तेरा आंवा पूरी तरह से पक जाएगा।' ।
तांत्रिक की इस दुष्ट बात को सुनकर कुम्हार अंधविश्वास में पूर्णतः अंधा हो गया। वह किसी अकेले बालक की तलाश में निकला। उसी दिन माघ मास की संकष्टी चतुर्थी का पवित्र व्रत था और वह पतिव्रता ब्राह्मणी भिक्षा से प्राप्त तिलों को कूटकर उसके दस लड्डू बनाकर गणेश जी की सांध्य-पूजा की तैयारी कर रही थी। इसी बीच उसका पांच वर्षीय पुत्र गणेश जी की गोबर की मूर्ति अपने गले में बांधकर स्वेच्छा से खेलते-खेलते घर से बाहर निकल गया ।
कुम्हार की नज़र उस अकेले खेलते बालक पर पड़ी। उस नरपिशाच कुम्हार ने बिना किसी दया के उस छोटे से बालक को जबरन उठाया, उसे अपने आंवे (भट्टी) के बिल्कुल बीच में डाल दिया और चारों ओर से मिट्टी के बर्तनों से ढककर उसमें भयानक आग लगा दी ।
माता का विलाप एवं गणेश जी की स्तुति: इधर जब संध्या होने लगी और पुत्र घर नहीं लौटा, तो ब्राह्मणी अत्यंत व्याकुल हो गई। वह पागलों की भाँति अपने पुत्र को ढूँढती हुई नगर में विलाप करने लगी। जब उसे अपना पुत्र कहीं नहीं मिला, तो वह रोती हुई अपने घर लौटी और भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष गिर पड़ी। वह करुण पुकार करते हुए गजानन की स्तुति करने लगी: "हे गजानन! हे विशाल शरीर वाले! हे सूर्यनारायण की लाली के सदृश कांतिशाली! हे सुंदर जटा समूह को धारण करने वाले! हे मस्तक में चंद्रमा को धारण करने वाले! हे अनाथों के नाथ! हे विनायक! आप इस दुखियारी की रक्षा कीजिए। मैं पुत्र के वियोग में अत्यंत व्यथित हूँ। मैंने सदैव आपका संकष्टी व्रत पूर्ण निष्ठा से किया है। मेरे प्राणों की रक्षा करें और मेरे पुत्र को मुझे लौटा दें।" ।
चमत्कार और संकट-निवारण: ब्राह्मणी ने अन्न-जल का पूर्णतः त्याग कर दिया और रात भर भगवान गणेश के समक्ष रोती रही। उधर, दूसरे दिन प्रातःकाल जब कुम्हार अपने आंवे के पास पहुँचा और उसने पक चुके बर्तनों को निकालने के लिए भट्टी खोली, तो भीतर का दृश्य देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया। आंवे के सभी बर्तन बहुत अच्छी तरह पक चुके थे, परंतु जिस स्थान पर उसने उस बालक को डाला था, वहाँ आग का प्रभाव सर्वथा शून्य था। वह पांच वर्षीय बालक गले में गणेश जी की मूर्ति पहने हुए वहाँ मजे से पके हुए मिट्टी के खिलौनों के साथ खेल रहा था, और प्रज्वलित अग्नि उसका एक बाल भी बांका नहीं कर सकी थी! ।
कुम्हार भगवान गजानन के इस साक्षात् चमत्कार को देखकर अत्यंत भयभीत हो गया। वह दौड़कर राजा के दरबार में गया और अपना जघन्य अपराध स्वीकार किया। राजा ने सैनिकों को भेजकर उस बालक और उसकी माता ब्राह्मणी को ससम्मान राजमहल बुलवाया। राजा ने ब्राह्मणी से पूछा— 'हे देवी! तुम्हारा ऐसा कौन सा महान तप है जिसके प्रभाव से भयंकर अग्नि भी तुम्हारे पुत्र को जला न सकी?' ब्राह्मणी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया— 'हे राजन्! इसमें मेरा कोई तप नहीं है। यह सब केवल विघ्नहर्ता भगवान गजानन और मेरे द्वारा किए गए संकष्टी चतुर्थी (सकट चौथ) के व्रत का अमोघ प्रभाव है।' यह जानकर राजा और संपूर्ण नगरवासी भगवान गजानन की महिमा से अत्यंत प्रभावित हुए। उसी दिन से नगर की सभी स्त्रियों ने अपनी संतान की रक्षा और संकट निवारण के लिए 'सकट चौथ' का महाव्रत रखना प्रारंभ कर दिया ।
३. कथा का पारंपरिक उपसंहार
"हे विघ्नहर्ता! जिस प्रकार आपने उस निर्धन ब्राह्मणी के छोटे से पुत्र की रक्षा की और उसे अग्नि के भयंकर ताप से बचाकर नवजीवन प्रदान किया, उसी प्रकार इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी जनों की संतानों की रक्षा करना। उनके जीवन के सभी संकटों को हरना और उनके घर में रिद्धि-सिद्धि का सदा वास करना। जो कोई भी माता श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करती है, उसकी संतान को दीर्घायु प्राप्त होती है और घर में सौभाग्य की निरंतर वृद्धि होती है। ॥ बोलिए चौथ माता की जय! गजानन भगवान की जय! ॥" ।
चतुर्थ संस्करण: भगवान शिव-पार्वती चौसर प्रसंग (विकट संकष्टी)
यह कथा विशेषकर चैत्र तथा वैशाख मास की संकष्टी चतुर्थी (विकट संकष्टी) के संदर्भ में पढ़ी जाती है और इसका पूर्ण शास्त्रीय आधार 'शिव पुराण' एवं अन्य पारंपरिक ग्रंथों में प्राप्त होता है ।
१. कथा का प्रारंभिक संदर्भ
कथा का शास्त्रीय आधार: यह कथा मूल रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के मध्य हुए संवाद और क्रीड़ा पर आधारित है, जिसका वर्णन कालांतर में नाग कन्याओं द्वारा किया गया ।
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
प्राचीन काल में एक बार देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और जगदम्बा माता पार्वती कैलाश पर्वत पर एकांत में विराजमान थे। उनके मन में चौसर (पांसे) खेलने की इच्छा उत्पन्न हुई। परंतु समस्या यह थी कि वहाँ उनके खेल में हार-जीत का निर्णय करने वाला (निर्णायक) कोई तीसरा व्यक्ति उपस्थित नहीं था। तब भगवान शिव ने अपने तपोबल से वहाँ पड़ी कुछ सूखी घास (कुश) को एकत्रित कर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण फूँक दिए। शिव जी ने उस जीवित हुए बालक से कहा— 'हे बालक! हम दोनों चौसर खेल रहे हैं। तुम ध्यानपूर्वक इस खेल को देखना और खेल के अंत में निष्पक्ष होकर बताना कि हम दोनों में से कौन विजयी हुआ।' ।
खेल प्रारंभ हुआ। माता पार्वती अत्यंत निपुणता से खेल रही थीं और लगातार तीन-चार बार माता पार्वती ने भगवान शिव को पराजित कर दिया। खेल समाप्त होने पर जब उस बालक से हार-जीत का अंतिम निर्णय पूछा गया, तो उस बालक ने अज्ञानतावश या शिव जी के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए कह दिया— 'इस खेल में भगवान शिव विजयी हुए हैं।' ।
संकट की उत्पत्ति और शाप: बालक के मुख से ऐसा घोर असत्य और पक्षपातपूर्ण निर्णय सुनकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने कुपित होकर उस बालक को शाप दे दिया— 'तूने सत्य को छिपाकर असत्य भाषण किया है, अतः तू इसी क्षण लंगड़ा हो जा और आजीवन इसी पर्वत के नीचे कीचड़ और दलदल में पड़ा रहकर भयंकर दुःख भोगेगा।' माता का यह शाप सुनते ही वह बालक लंगड़ा हो गया और दलदल में गिरकर अत्यंत भयभीत हो गया। वह माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा। उसने रुदन करते हुए कहा— 'हे माता! मैंने किसी द्वेष भाव या छल से ऐसा नहीं किया, बल्कि अज्ञानतावश मुझसे यह घोर भूल हो गई। कृपया मुझ अज्ञानी बालक को इस भयंकर शाप से मुक्त करें।' ।
गणेश उपासना का निर्देश: बालक का करुण रुदन सुनकर माता पार्वती को उस पर दया आ गई। उन्होंने कहा— 'हे बालक! मेरा दिया हुआ शाप मिथ्या नहीं हो सकता, परंतु मैं तुझे शाप-मुक्ति का एक अचूक उपाय अवश्य बताऊँगी। एक वर्ष की प्रतीक्षा कर। कुछ समय पश्चात यहाँ वैशाख मास में कुछ नाग कन्याएँ भगवान गजानन की पूजा करने आएँगी। तू उनसे 'संकष्टी चतुर्थी' व्रत की विधि पूछना और पूर्ण श्रद्धा से उस व्रत का अनुष्ठान करना।' ।
कष्ट सहते हुए एक वर्ष व्यतीत होने पर वहाँ नाग कन्याएँ आईं। बालक ने उनसे अपने शाप-मुक्ति के लिए व्रत की विधि पूछी। नाग कन्याओं ने विस्तारपूर्वक बताया— 'चैत्र या वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना और दिन भर निराहार रहकर उपवास करना। शाम को चंद्रोदय होने पर भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित कर उन्हें पीले पुष्प, दुर्वा, तिल, गुड़ और मोदक अर्पित करना। तत्पश्चात चंद्रदेव को अर्घ्य देकर ही भोजन ग्रहण करना।' नाग कन्याओं द्वारा बताई गई इस विधि के अनुसार उस बालक ने लगातार 21 दिनों (अथवा 21 संकष्टी चतुर्थियों) तक भगवान गणेश का अत्यंत कठोर व्रत किया ।
संकट-निवारण एवं भगवान गणेश का आशीर्वाद: उस बालक की सच्ची भक्ति और संकष्टी व्रत के प्रभाव से विघ्नहर्ता भगवान गणेश साक्षात् प्रकट हुए और बोले— 'हे बालक! मैं तेरे इस निष्ठापूर्ण व्रत से अत्यंत प्रसन्न हूँ, माँग क्या वरदान माँगता है?' बालक ने गदगद होकर कहा— 'हे प्रभु! मेरे पैरों में इतनी शक्ति दे दीजिए कि मेरा यह लंगड़ापन दूर हो जाए और मैं स्वयं चलकर कैलाश पर्वत के शिखर तक जा सकूँ और माता पार्वती व भगवान शिव के दर्शन कर सकूँ।' भगवान गणेश ने 'तथास्तु' कहकर उसे पूर्णतः स्वस्थ कर दिया ।
जब वह बालक पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर कैलाश पहुँचा, तो भगवान शिव उसे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। तब भगवान शिव ने माता पार्वती (जो शिव जी से किसी बात पर रुष्ट होकर कहीं और चली गई थीं) को मनाने के लिए स्वयं इसी 'संकष्टी चतुर्थी' का 21 दिन तक नियमपूर्वक व्रत किया। महाकाल के व्रत के प्रभाव से माता पार्वती का सारा क्रोध शांत हो गया और वे पुनः कैलाश लौट आईं। माता पार्वती ने जब शिव जी से इस व्रत की अमोघ महिमा सुनी, तो उन्होंने भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की तीव्र इच्छा से यह संकष्टी व्रत किया। व्रत पूर्ण होते ही भगवान कार्तिकेय स्वयं उनसे मिलने कैलाश आ गए ।
३. कथा का पारंपरिक उपसंहार
"इस प्रकार जो भी प्राणी अपने जीवन की सबसे विकट और कठिन परिस्थितियों में भगवान गणेश के इस विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत का पालन करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, रोग, शाप और क्लेश का पूर्णतः नाश हो जाता है। जो श्रद्धापूर्वक यह कथा सुनता है अथवा पढ़ता है, उसे खोए हुए स्वजनों की प्राप्ति होती है और घर में सुख-शांति लौट आती है। ॥ बोलिए मंगलमूर्ति भगवान गजानन की जय! ॥" ।
पंचम संस्करण: अंगारक प्रसंग (अंगारकी संकष्टी चतुर्थी)
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे 'अंगारकी संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। हिंदू धर्म में यह समस्त संकष्टी चतुर्थियों में सर्वाधिक पवित्र और फलदायी मानी जाती है ।
१. कथा का प्रारंभिक संदर्भ
कथा का मूल आधार: यह प्रसंग 'गणेश पुराण' के उपासना खण्ड और विभिन्न स्मृति ग्रंथों में आता है कि किस प्रकार पृथ्वी पुत्र मंगल (अंगारक) ने भगवान गणेश की उपासना कर ग्रह का पद प्राप्त किया ।
२. मुख्य कथा
प्राचीन काल में महान तपस्वी महर्षि भरद्वाज और माता पृथ्वी के संयोग से एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र की उत्पत्ति हुई, जिसका नाम 'अंगारक' (मंगल) था। अंगारक का वर्ण रक्त (लाल रंग) के समान था और वे जन्म से ही महान तपस्वी थे। महर्षि भरद्वाज भगवान गणेश के परम भक्त थे और उन्होंने अपने पुत्र अंगारक को भी भगवान गजानन की निरंतर भक्ति का उपदेश दिया ।
पिता की आज्ञा पाकर अंगारक वन में गए और एक पैर पर खड़े होकर भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ कर दी। अंगारक की तपस्या इतनी तीव्र और घोर थी कि उनके शरीर से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलने लगीं। उनके तप से तीनों लोक कंपायमान हो गए। अंततः माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि, जो कि मंगलवार का दिन था, भगवान गणेश अंगारक की उस अकल्पनीय तपस्या से अत्यंत प्रसन्न होकर अपने दिव्य स्वरूप में उनके समक्ष प्रकट हुए ।
भगवान गणेश ने कहा— 'हे अंगारक! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। मैं तुम्हारी दृढ़ निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो भी इच्छा हो, वरदान माँगो।' अंगारक ने भगवान गजानन के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम कर कहा— 'हे देवाधिदेव! हे विघ्नहर्ता! मेरी केवल एक ही अभिलाषा है कि मेरा नाम सदैव के लिए आपके पावन नाम के साथ जुड़ जाए और मुझे स्वर्ग लोक में देवताओं के बीच नवग्रहों में उच्च स्थान प्राप्त हो।' ।
भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर अंगारक को वरदान दिया— 'हे अंगारक! आज से तुम 'मंगल ग्रह' के रूप में नवग्रहों में स्थापित होकर त्रिलोक में पूजनीय होगे। चूँकि तुमने आज मंगलवार के दिन पड़ने वाली चतुर्थी को मुझे प्रसन्न किया है, अतः आज से जब भी कोई संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ेगी, तो उसे तुम्हारे नाम पर 'अंगारकी संकष्टी चतुर्थी' कहा जाएगा। जो भी भक्त अंगारकी चतुर्थी का व्रत करेगा, उसे पूरे वर्ष की बारह संकष्टी चतुर्थियों का पुण्य एक ही दिन में प्राप्त हो जाएगा। मैं स्वयं उसके जीवन के सभी भयंकर संकटों और ऋण (कर्ज) का निवारण करूँगा।' ।
पारंपरिक षोडशोपचार पूजा विधान, स्तोत्र एवं श्लोक
संकष्टी चतुर्थी का व्रत बिना विधि-विधान और मंत्रों के अपूर्ण माना जाता है। कथा-वाचन के पूर्व या पश्चात् भगवान गणेश और चंद्र देव की स्तुति के लिए जिन संस्कृत श्लोकों का उल्लेख पारंपरिक ग्रंथों (जैसे व्रतराज एवं गणेश पुराण) में मिलता है, उनका पूर्ण अक्षुण्ण पाठ यहाँ दिया जा रहा है ।
१. भगवान गणेश की स्तुति एवं प्रार्थना (विघ्न निवारण हेतु)
हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर इस श्लोक से भगवान गजानन का ध्यान करना चाहिए:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
(अर्थ: हे घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले भगवान गणेश! आप मेरे सभी कार्यों को सदैव बाधारहित पूर्ण करें।)
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितम्।
उमासुतं शोक विनाशकारणं नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम्॥
(अर्थ: भूतगणों द्वारा सेवित, कैथ और जामुन के फलों का भक्षण करने वाले, माता उमा (पार्वती) के पुत्र और शोकों का विनाश करने वाले हे विघ्नेश्वर! मैं आपके चरण कमलों में नमस्कार करता हूँ।)
२. श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् (नारद पुराण से)
व्रत के दिन पूजा के समय 'नारद पुराण' में वर्णित इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी बताया गया है। पारंपरिक रूप से इसी स्तोत्र के पाठ से संकष्टी व्रत की पूर्णता होती है :
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये॥१॥
(अर्थ: देवर्षि नारद कहते हैं— माता गौरी के पुत्र, भक्तों के आश्रयदाता भगवान विनायक को सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए, आयु, कामना और धन की सिद्धि के लिए नित्य स्मरण करना चाहिए।)
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥२॥
(अर्थ: उनका पहला नाम वक्रतुण्ड, दूसरा एकदन्त, तीसरा कृष्णपिंगाक्ष (काली और भूरी आँखों वाले), और चौथा गजवक्त्र (हाथी के मुख वाले) है।)
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टकम्॥३॥
(अर्थ: पांचवां लम्बोदर, छठा विकट, सातवां विघ्नराजेन्द्र (विघ्नों के राजा), और आठवां नाम धूम्रवर्ण है।)
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
(अर्थ: नौवां भालचन्द्र (मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले), दसवां विनायक, ग्यारहवां गणपति, और बारहवां नाम गजानन है।)
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥५॥
(अर्थ: जो मनुष्य इन बारह नामों का तीनों संध्याओं (प्रातः, दोपहर, सायं) में पाठ करता है, उसे कभी किसी प्रकार के विघ्नों का भय नहीं रहता और उसे सर्व-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।)
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
(अर्थ: इसके पाठ से विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है, धनार्थी धन पाता है, पुत्र की इच्छा करने वाला पुत्र पाता है, और मोक्ष का अभिलाषी परम गति को प्राप्त करता।)
जपेद् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
(अर्थ: इस गणपति स्तोत्र का जप करने से छह मास में वाञ्छित फल की प्राप्ति होती है और एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि मिल जाती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।)
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥८॥
॥ इति श्री नारद पुराणे संकष्टनाशनं नाम श्री गणपति स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
(अर्थ: जो व्यक्ति इस स्तोत्र को लिखकर आठ ब्राह्मणों को समर्पित करता है, भगवान गणेश की कृपा से उसे संपूर्ण विद्या प्राप्त हो जाती है।)
३. चंद्र दर्शन एवं अर्घ्य विधान
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन और अर्घ्य प्रदान किए बिना पूर्ण नहीं माना जाता । रात्रि में चंद्रोदय होने पर तांबे के पात्र में शुद्ध जल, श्वेत चंदन, कुमकुम, श्वेत पुष्प और अक्षत लेकर चंद्र देव को निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए अर्घ्य दिया जाता है :
क्षीरोदार्णव सम्भूत अत्रिगोत्र समुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केदं रोहिण्या सहितो मम॥
(अर्थ: हे क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न होने वाले, महर्षि अत्रि के गोत्र में प्रकट होने वाले और रोहिणी के प्रिय पति भगवान चंद्रदेव! मेरे द्वारा अर्पित किए गए इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें।)
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
(अर्थ: दही, शंख और बर्फ के समान श्वेत और निर्मल आभा वाले, क्षीर सागर से उत्पन्न और भगवान शिव के मुकुट की शोभा बढ़ाने वाले भगवान चंद्रदेव को मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ।)
अर्घ्य देने के पश्चात चंद्रदेव से अपने परिवार की सुख-शांति और संकटों के नाश की प्रार्थना की जाती है और इसके उपरांत ही व्रत का पारण (भोजन ग्रहण) किया जाता है ।
कथा का पारंपरिक उपसंहार एवं महात्म्य
सभी पौराणिक और लोक कथाओं के पठन-पाठन और आरती के पश्चात, व्रत को पूर्ण करने हेतु पारंपरिक ग्रंथों (जैसे व्रतराज एवं भविष्य पुराण) में जो महात्म्य और फलश्रुति (पुण्य फल का कथन) वर्णित है, उसका वाचन इस प्रकार किया जाता है:
"जो व्यक्ति मन में पूर्ण श्रद्धा, शांति और सत्य-संयम का पालन करते हुए इस संकष्टी गणेश चतुर्थी के व्रत को धारण करता है, भगवान गजानन उसके जीवन में आ रहे बार-बार के संकटों को समूल नष्ट कर देते हैं । व्रत करने वाले को दिन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखना चाहिए और झूठ, क्रोध एवं कटु वचनों का सर्वथा त्याग करना चाहिए ।
जिस प्रकार इस महाव्रत के प्रभाव से धर्मराज युधिष्ठिर ने अपना खोया हुआ अखंड राज्य पुनः प्राप्त किया , राजा शूरसेन के राज्य में इन्द्र का विमान पुनः आकाश में उड़ा , निर्धन ब्राह्मणी के बालक की अग्नि से रक्षा हुई , और विकलांग बालक कैलाश पर्वत तक पहुँच गया , उसी प्रकार भगवान गजानन अपने भक्तों की रक्षा सदैव करते हैं。
जो कोई भी प्राणी इस संकटनाशन व्रत कथा को पूर्ण भक्तिभाव से पढ़ता है, सुनता है, अथवा कथा के मध्य 'हुंकारा' भरता है, भगवान भालचंद्र की कृपा से उसके घर में सदैव रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ का अखण्ड वास होता है । उसके सभी विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं और वह इस लोक में उत्तम सुख भोगकर अंत में गणेश लोक को प्राप्त करता है。
॥ इति श्री भविष्योत्तरपुराणे / गणेशपुराणे संकष्टनाशनं गणेश चतुर्थी व्रत कथा सम्पूर्णा ॥
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥"