विस्तृत उत्तर
हिंदू पंचांग में प्रत्येक माह दो चतुर्थियाँ आती हैं — एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। ये दोनों भगवान गणेश को समर्पित हैं, परंतु इनकी प्रकृति और विधि में अंतर है।
विनायक चतुर्थी — शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। यह शुभ और उत्सवी चतुर्थी है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को 'गणेश चतुर्थी' के रूप में मनाया जाता है जो सबसे बड़ा गणेश उत्सव है।
संकष्टी चतुर्थी — कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। 'संकष्टी' का अर्थ है संकट को हरने वाली। नारद पुराण के अनुसार इस दिन व्रत रखने से भक्तों के सभी संकट, कठिनाइयाँ और बाधाएं दूर होती हैं।
संकष्टी चतुर्थी की विशेष बात यह है कि इसमें व्रती रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलते हैं। विनायक चतुर्थी में इस रात्रि जागरण और चंद्र दर्शन की अनिवार्यता नहीं होती।
यदि संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो उसे 'अंगारकी चतुर्थी' कहते हैं जो अत्यंत पुण्यकारी और शक्तिशाली मानी जाती है।
संकष्टी चतुर्थी पूरे दिन उपवास करके शाम को गणेश पूजा, कथा श्रवण, आरती और चंद्र दर्शन के बाद सम्पन्न होती है।




