विस्तृत उत्तर
शिव पूजा और शिव ध्यान दोनों शिव उपासना के अंग हैं, परंतु इनमें मूलभूत अंतर है:
शिव पूजा (बाह्य उपासना)
- 1बाह्य क्रिया प्रधान — शिवलिंग, मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर।
- 2षोडशोपचार — जल, दूध, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सेवा।
- 3मंत्र जप — वाचिक या उपांशु जप।
- 4सामग्री आवश्यक — बिल्वपत्र, रुद्राक्ष माला, पंचामृत आदि।
- 5विधि-नियम बद्ध — निश्चित क्रम और विधान से।
- 6सगुण उपासना — शिव के साकार रूप की सेवा।
- 7गृहस्थ के लिए विशेष उपयुक्त।
शिव ध्यान (आंतरिक उपासना)
- 1आंतरिक क्रिया प्रधान — मन और चेतना से।
- 2शिव के स्वरूप का मानसिक चित्रण और उसमें लीन होना।
- 3मानसिक जप — मन ही मन 'ॐ नमः शिवाय' या 'शिवोऽहम्'।
- 4कोई बाह्य सामग्री अनिवार्य नहीं — केवल शांत स्थान और आसन।
- 5विधि-मुक्त — कहीं भी, कभी भी किया जा सकता है।
- 6निर्गुण उपासना की ओर — 'शिव सर्वव्यापी चेतना है' इस भाव से ध्यान।
- 7संन्यासी और उच्च साधकों के लिए विशेष उपयुक्त।
दोनों में सामंजस्य
शिव पुराण में दोनों को आवश्यक बताया गया है। आरंभिक साधक पूजा से शुरू करें — पूजा से चित्त शुद्ध होता है। शुद्ध चित्त ध्यान में सफल होता है। अंततः दोनों एक हो जाते हैं — 'पूजा ध्यान में और ध्यान पूजा में विलीन हो जाती है।'
उच्चतम स्थिति: 'शिवोऽहम्' — 'मैं स्वयं शिव हूं' — यह ध्यान की चरम अवस्था है जहां पूजक और पूज्य का भेद मिट जाता है।





