विस्तृत उत्तर
शिव की कृपा प्राप्ति के लिए शास्त्रों में अनेक साधनाओं का वर्णन है, जिनमें कुछ अत्यंत कठिन मानी गई हैं:
1पाशुपत व्रत (सर्वाधिक कठिन)
पाशुपत सूत्र में वर्णित यह व्रत अत्यंत दुर्लभ है। इसमें साधक सामाजिक मर्यादाओं से परे जाकर, लोगों की निंदा-उपहास सहते हुए शिव-ध्यान में लीन रहता है। यह व्रत पूर्ण वैराग्य और अहंकार नाश की परम साधना है।
2अघोर साधना
श्मशान में, भय और घृणा को जीतकर, सभी प्राणियों में शिव का दर्शन करना। द्वैत भाव का पूर्ण नाश इसका लक्ष्य है।
312 वर्षीय महामृत्युंजय अनुष्ठान
निरंतर 12 वर्ष तक नियमित महामृत्युंजय जप करना — यह दीर्घकालिक तप साधना है।
4पंचाग्नि तप
चार अग्नियों के मध्य और ऊपर सूर्य (पंचम अग्नि) सहित तपस्या। शिव पुराण में अनेक ऋषियों ने इस तप से शिव को प्रसन्न किया।
5कायाक्लेश तप
कठोर उपवास, मौन, शीत-ताप सहन, एकांतवास जैसी शारीरिक कठिनताओं को झेलते हुए शिव ध्यान।
शिव पुराण का मत
परंतु शिव पुराण यह भी स्पष्ट करता है कि शिव 'भोलेनाथ' हैं — वे सबसे सरल भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते हैं। एक लोटा जल, एक बिल्वपत्र और सच्चा भक्तिभाव — यही शिव को सबसे अधिक प्रिय है। मार्कण्डेय, धर्मव्याध जैसे भक्तों ने केवल सच्ची भक्ति से शिव कृपा प्राप्त की।
सार: सबसे कठिन साधना वह है जिसमें अहंकार का पूर्ण विनाश हो — चाहे वह पाशुपत व्रत हो या सच्ची शरणागति। शिव कहते हैं: 'भक्ति ही मुझे सबसे अधिक प्रिय है।'





