विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में 'नाम जप' और 'मंत्र जप' के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और महत्वपूर्ण अंतर बताया गया है।
राम' एक स्वयंसिद्ध नाम है। नाम जपने के लिए किसी दीक्षा, समय, दिशा, आसन या शारीरिक शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। इसे चलते-फिरते, सोते-जागते, शुद्ध या अशुद्ध किसी भी अवस्था में जपा जा सकता है। यह निष्काम प्रेम का मार्ग है।
इसके विपरीत 'ॐ रामाय नमः' एक पूर्ण मंत्र है। जब किसी नाम के आगे 'ॐ' और पीछे 'नमः' या 'स्वाहा' लग जाता है, तो वह एक मंत्र बन जाता है। मंत्र जप के लिए गुरु दीक्षा, न्यास, संकल्प, शुद्ध आसन और समय का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होता है। मंत्र एक विशिष्ट ऊर्जा (फ्रीक्वेंसी) उत्पन्न करता है, जबकि 'नाम' सीधे हृदय और भाव से जुड़ता है।





