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अधिकमास में पूजा का क्या महत्व है?

अधिकमास में पूजा-जप-दान का फल दस गुना मिलता है क्योंकि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस मास के अधिपति हैं।

संक्षिप्त उत्तर

अधिकमास में पूजा-जप-दान का फल दस गुना मिलता है क्योंकि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस मास के अधिपति हैं। विष्णु-कृष्ण पूजा, दीपदान, भागवत पाठ और तीर्थ यात्रा विशेष रूप से फलदायी हैं। मांगलिक कार्य वर्जित हैं लेकिन साधना के लिए यह मास सर्वश्रेष्ठ है।

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विस्तृत उत्तर

अधिकमास को मलमास और पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। प्रारंभ में यह मास स्वामीहीन होने के कारण 'मलिन मास' अर्थात मलमास कहलाता था और इसे मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना जाता था। इसकी व्यथा सुनकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस मास को अपना नाम 'पुरुषोत्तम' देकर इसे सर्वोच्च फलदायी बना दिया।

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के अनुसार इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल अन्य किसी भी मास की तुलना में दस गुना अधिक मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि 'जो मनुष्य इस मास में स्नान, पूजा, जप, दान और अनुष्ठान करेगा, वह उसी परमधाम को प्राप्त होगा जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनि युगों तक तपस्या करते हैं।'

इस मास में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की विशेष आराधना का विधान है। प्रतिदिन श्री पुरुषोत्तम कृष्ण की पूजा और नामजप करना अत्यंत शुभ माना गया है। श्रीमद्भागवत पाठ, गीता पाठ, राम कथा वाचन, और तुलसी अर्चना इस मास में विशेष रूप से फलदायी हैं।

दीपदान, वस्त्रदान और धार्मिक ग्रंथों का दान इस मास में विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि दीपकों का दान करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और दुख-शोक का नाश होता है। अन्नदान भी इस मास का श्रेष्ठ कर्म बताया गया है।

मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि इस मास में वर्जित रहते हैं, लेकिन जप, तप, तीर्थ यात्रा, पितृ श्राद्ध और भगवान की आराधना के लिए यह मास अत्यंत शुभ है। इस प्रकार अधिकमास में पूजा का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि भगवान स्वयं इसके अधिपति हैं और भक्तों के पुण्य को अपनी कृपा से कई गुना कर देते हैं।

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