विस्तृत उत्तर
पुरुषोत्तम मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह प्रायः 32 महीने 16 दिन और 4 घड़ी के अंतराल पर आता है — अर्थात कभी 28 महीने में, कभी 33 महीने में, लेकिन औसतन प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार।
इसके आने का कारण चंद्र और सौर वर्ष के बीच का अंतर है। हिंदू पंचांग में सौर वर्ष लगभग 365 दिन और चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है — दोनों के बीच प्रतिवर्ष लगभग 11 दिन का अंतर रहता है। तीन वर्षों में यह अंतर लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इस अतिरिक्त माह को ही 'अधिकमास' कहा जाता है जो कैलेंडर को पुनः संतुलित करता है।
ज्योतिषीय परिभाषा यह है: जिस मास में सूर्य का किसी राशि पर संक्रमण (सूर्य संक्रांति) न हो, वह अधिकमास कहलाता है। प्रत्येक महीने सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है, लेकिन अधिकमास में यह संक्रांति नहीं होती।
पुरुषोत्तम मास बनने की पौराणिक कथा अत्यंत रोचक है। जब यह मास पहली बार प्रकट हुआ तो किसी देवता ने इसे अपना नहीं माना। स्वामीहीन होने से यह 'मलमास' की संज्ञा पाकर निंदित हुआ। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास गया, जो उसे गोलोक ले गए। भगवान श्रीकृष्ण ने दुखी मलमास पर करुणा करते हुए कहा, 'आज से मैं स्वयं तुम्हारा स्वामी हूँ और अपना नाम पुरुषोत्तम तुम्हें देता हूँ।' तब से यह मास 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से विख्यात हुआ और सभी मासों में श्रेष्ठ बन गया।





