विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म, भारतीय दर्शन, वेद और पुराणों के सुविस्तृत वाङ्मय में भगवान शिव का स्थान मात्र एक पौराणिक देवता की सीमा तक सीमित नहीं है; वे परब्रह्म, शाश्वत सत्य और शुद्ध चेतना के सर्वोच्च तथा अनंत प्रतीक हैं।
शैव दर्शन और वैदिक संहिताओं के गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि शिव न केवल सृष्टि के संहारकर्ता हैं, अपितु वे ही वह आदि कारण और मूल स्रोत हैं, जिनसे यह संपूर्ण चराचर जगत उद्भूत होता है, जिसमें यह पोषित होता है, और अंततः प्रलयकाल में जिसमें यह विलीन हो जाता है।
कृष्ण यजुर्वेद की श्वेताश्वतर उपनिषद और महामुनि वेदव्यास रचित शिव पुराण जैसे महान ग्रंथ भगवान शिव को एक साथ सगुण (आकार और गुणों से युक्त) तथा निर्गुण (निराकार, गुणातीत) दोनों रूपों में व्याख्यायित करते हैं। भौतिक दृष्टि से वे कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले एक तपस्वी प्रतीत होते हैं, परंतु तात्विक दृष्टि से वे संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त वह ऊर्जा हैं, जो समस्त जीवधारियों की श्वास और चेतना का संचालन करती है।





