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विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति⏱ 1 मिनट पठन

नारायण सूक्त में विष्णु का क्या वर्णन है?

नारायण सूक्त (यजुर्वेद): 'नारायण परं ब्रह्म. . . अन्तरबहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः। ' अर्थ: नारायण ही परम ब्रह्म, परम ज्योति और परमात्मा हैं।

संक्षिप्त उत्तर

नारायण सूक्त (यजुर्वेद): 'नारायण परं ब्रह्म...अन्तरबहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।' अर्थ: नारायण ही परम ब्रह्म, परम ज्योति और परमात्मा हैं। जगत में जो कुछ भी देखा-सुना जाता है — उसके भीतर और बाहर नारायण ही व्याप्त हैं।

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विस्तृत उत्तर

नारायण सूक्त, जो यजुर्वेद का एक महत्वपूर्ण अंश है, परब्रह्म के रूप में नारायण की उद्घोषणा करते हुए कहता है:

नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः॥ यच्चं किञ्चिज्जगत्सर्वं दृष्यते श्रीयतेऽपि वा। अन्तरबहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥

इस श्लोक का अर्थ है कि नारायण ही परम ब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं, नारायण ही परम ज्योति, ध्याता, ध्यान और परमात्मा हैं। इस जगत में जो कुछ भी देखा या सुना जाता है, उस सबके भीतर और बाहर नारायण ही पूर्ण रूप से व्याप्त होकर स्थित हैं।

इसके अतिरिक्त, पुरुष सूक्त और नारायण सूक्त में भी विष्णु (नारायण) को वह 'सहस्रशीर्षा पुरुष' कहा गया है जो सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। महानारायण उपनिषद स्पष्ट करता है कि जल में, सबकी गति में और सबके आधार में जो स्थित है, वह वासुदेव या नारायण ही है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

नारायण सूक्त में विष्णु का क्या वर्णन है को संदर्भ सहित समझें

नारायण सूक्त में विष्णु का क्या वर्णन है का सबसे सीधा सार यह है: नारायण सूक्त (यजुर्वेद): 'नारायण परं ब्रह्म...अन्तरबहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।' अर्थ: नारायण ही परम ब्रह्म, परम ज्योति और परमात्मा हैं। जगत में जो कुछ भी देखा-सुना जाता है...

विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति प्रश्नोत्तर
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