विस्तृत उत्तर
यजुर्वेद मुख्यतः यज्ञ-कर्म का ग्रंथ है, किंतु इसमें कृषि, प्रकृति और ऋतुचक्र का भी उल्लेख है। अथर्ववेद और ऋग्वेद में भी कृषि के संदर्भ मिलते हैं।
वैदिक काल में कृषि का विकास:
ऋग्वेद में 'कृषि' — ऋग्वेद (1.61.7, 10.101) में खेती, हल, बैल और बीज का उल्लेख है। 'सीता' शब्द का प्रयोग खेत में खींची गई हल की लकीर (furrow) के अर्थ में हुआ है।
यजुर्वेद में — यजुर्वेद में ऋतुओं के अनुसार कृषि कार्य, वर्षा की प्रार्थना, मिट्टी की उर्वरता और पशुओं के महत्व का उल्लेख है।
अथर्ववेद में कृषि — अथर्ववेद (3.17) में खेत में बीज बोने, फसल बढ़ाने और रोगों से बचाने के मंत्र हैं। इसमें विभिन्न फसलों (धान, जौ, तिल, उड़द, मसूर आदि) का नामोल्लेख है।
कृत्सागर और ऋत — वैदिक ग्रंथों में ऋत (ऋतु-चक्र) और वर्षा की गणना का ज्ञान था जो कृषि कैलेंडर का आधार था।
प्राचीन ग्रंथ — 'कृषि पाराशर' (ऋषि पाराशर द्वारा) में फसल रोपण का सर्वोत्तम समय, मिट्टी के प्रकार, बीज चयन, सिंचाई और पशुपालन का वर्णन है। 'वृक्षायुर्वेद' में पौधों की चिकित्सा और कृषि विज्ञान का उल्लेख है।
सिंचाई — इंडस वैली (सिंधु घाटी) सभ्यता में ड्रेनेज और सिंचाई की उन्नत व्यवस्था के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं — यह वैदिक काल के समकालीन है।





