विस्तृत उत्तर
यह एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न है जिसका उत्तर सावधानी से देना आवश्यक है।
वैदिक ग्रंथों में जो है — ऋग्वेद (1.164.13) में कहा गया है: 'द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र' — अर्थात सूर्य सबको धारण करने वाला है। कुछ विद्वान इसमें गुरुत्वाकर्षण का संकेत देखते हैं, किंतु यह काव्यात्मक भाषा है, गणितीय सिद्धांत नहीं।
भास्कराचार्य का उल्लेख — 12वीं शताब्दी के गणितज्ञ भास्कराचार्य ने 'सिद्धांतशिरोमणि' (1150 ईस्वी) में स्पष्ट लिखा है: 'मृद्भूमिर्जलमग्निर्वायुराकाशमुच्यते। पृथिव्यां गुरुत्वम्... पतत्यत्र गुरुत्वाकर्षणात् ।।' — 'पृथ्वी में गुरुत्व है... वस्तुएँ गुरुत्वाकर्षण के कारण गिरती हैं।' यह न्यूटन (1687 ईस्वी) से लगभग 500 वर्ष पहले लिखा गया।
वराहमिहिर — 6वीं शताब्दी में वराहमिहिर ने 'पंचसिद्धांतिका' में लिखा कि पृथ्वी में एक ऐसी शक्ति है जो सभी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है।
सावधानी की बात — यह सत्य है कि भारतीय विद्वानों ने गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति का वर्णन न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पहले किया। किंतु न्यूटन की विशेषता यह थी कि उन्होंने इसे गणितीय नियमों (F = GMm/r²) के रूप में सिद्ध किया और ग्रहों की कक्षाओं पर इसे लागू किया।
निष्कर्ष — ऋग्वेद में गुरुत्वाकर्षण का सुस्पष्ट गणितीय सिद्धांत नहीं है, परंतु भास्कराचार्य (1150 ईस्वी) और वराहमिहिर (6वीं सदी) में इस शक्ति का स्पष्ट दार्शनिक और आंशिक वैज्ञानिक वर्णन अवश्य है।





