विस्तृत उत्तर
अथर्ववेद को औषधि, विज्ञान और व्यावहारिक जीवन-ज्ञान का भंडार माना जाता है। इसमें जल की महत्ता और शुद्धिकरण विधियों पर कई सूक्त हैं।
जल की स्तुति — अथर्ववेद (1.4, 1.33, 19.2) में जल को 'आपः' कहा गया है। एक श्लोक में कहा गया — 'शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये' — 'देवी जलें हमारे लिए शांतिदायक, पीने योग्य और रोगनाशक हों।'
जल शुद्धि की विधियाँ:
१. उबालना — ग्रंथों में दूषित जल को 'पकाकर' शुद्ध करने का उल्लेख है।
२. धूप में रखना — सूर्यप्रकाश से जल शुद्धि — UV radiation का प्राचीन रूप।
३. तुलसी — जल में तुलसी डालने से रोगाणु नष्ट होते हैं — आधुनिक विज्ञान ने इसमें यूजिनॉल जैसे एंटीमाइक्रोबियल तत्व खोजे हैं।
४. ताँबे का पात्र — ताँबे के बर्तन में जल रखना — आधुनिक अध्ययनों ने सिद्ध किया है कि ताँबे में ओलिगोडायनेमिक (oligodynamic) प्रभाव होता है जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है।
५. कुश घास — जल को कुश (Desmostachya bipinnata) से शुद्ध करना — शोधकर्ताओं ने इसमें कुछ antimicrobial गुण पाए हैं।
६. अग्निस्पर्श — हवन-कुंड के समीप रखे जल में धुएँ के तत्व मिलकर उसे शुद्ध करते हैं — कुछ वैज्ञानिकों ने अग्निहोत्र के धुएँ में एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए हैं।
ऐतिहासिक महत्व — पश्चिमी देशों में पानी को क्लोरीन से शुद्ध करना 19वीं सदी में शुरू हुआ, जबकि भारत में वैदिक काल से ही जल शुद्धि की विभिन्न व्यावहारिक विधियाँ प्रचलित थीं।





