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सुश्रुत ने नाक की सर्जरी (राइनोप्लास्टी) कैसे की थी?

सुश्रुत ने नाक सर्जरी में: मदिरा से बेहोशी, पत्ते से घाव का माप, गाल की त्वचा का ग्राफ्ट, गर्म उपकरणों से स्टेरलाइजेशन, हल्दी-चंदन की ड्रेसिंग।

संक्षिप्त उत्तर

सुश्रुत ने नाक सर्जरी में: मदिरा से बेहोशी, पत्ते से घाव का माप, गाल की त्वचा का ग्राफ्ट, गर्म उपकरणों से स्टेरलाइजेशन, हल्दी-चंदन की ड्रेसिंग। 1793 में ब्रिटिश अधिकारी ने इस परंपरा की सफलता स्वयं देखी जिसने यूरोपीय प्लास्टिक सर्जरी को प्रेरित किया।

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विस्तृत उत्तर

महर्षि सुश्रुत (लगभग 600 ईसा पूर्व, काशी) को विश्व में 'शल्य चिकित्सा के जनक' (Father of Surgery) के रूप में जाना जाता है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में भी 'Father of Surgery' के रूप में उनका नाम अंकित है। उनकी रचना 'सुश्रुत संहिता' में 1,120 रोगों, 700 औषधीय पौधों और 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाओं का वर्णन है।

नाक की सर्जरी (नासिका संधान / राइनोप्लास्टी) की प्रक्रिया:

एनेस्थीसिया — शल्य क्रिया से पहले रोगी को मद्यपान (मदिरा) या विशेष औषधियाँ दी जाती थीं जिससे वह गहरी बेहोशी में चला जाए और दर्द का अनुभव न हो।

घाव का माप — कटी नाक के घाव का सटीक माप पत्ते की सहायता से लिया जाता था।

त्वचा का ग्राफ्ट — रोगी के गाल या माथे से उतने ही आकार का मांस का टुकड़ा काटा जाता था।

उपकरणों की शुद्धि — सर्जिकल उपकरणों को आग पर गर्म करके (sterilise) किया जाता था — यह एंटीसेप्टिक सिद्धांत का प्राचीन रूप था।

सर्जरी — काटी गई त्वचा को नाक के स्थान पर रखकर उसे यथोचित आकार दिया जाता था। नाक में दो नलिकाएँ डालकर श्वास-मार्ग खुला रखा जाता था।

ड्रेसिंग — घाव पर घुँघची (Abrus precatorius), लाल चंदन का महीन बुरादा छिड़का जाता था और हल्दी का रस लगाया जाता था। फिर तिल के तेल से भीगी रूई से ढककर पट्टी बाँधी जाती थी।

पश्चात देखभाल — रोगी को औषधियों और जड़ी-बूटियों की सूची दी जाती थी और कुछ सप्ताह बाद पुनः जाँच के लिए बुलाया जाता था।

ऐतिहासिक प्रमाण — 1793 ईस्वी में ब्रिटिश सेना के अधिकारी कर्नल पुट को एक कर्नाटक के गाँव में सुश्रुत परंपरा के वैद्य द्वारा सफलतापूर्वक नाक जुड़वाने का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। यह सर्जरी इतनी सफल थी कि किसी को पता नहीं चला। इसी घटना ने यूरोप में आधुनिक राइनोप्लास्टी को प्रेरित किया।

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