विस्तृत उत्तर
प्राचीन भारत में दंत चिकित्सा अत्यंत विकसित थी। सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और अष्टांगहृदयम् में दाँतों के रोगों और उनके उपचार का विस्तृत वर्णन है।
दंत रोगों का वर्गीकरण — सुश्रुत संहिता में 65 प्रकार के मुख रोगों का वर्णन है, जिनमें 8 प्रकार के दाँतों के रोग, 15 प्रकार के मसूड़ों के रोग, 8 प्रकार के होंठ रोग और अन्य शामिल हैं।
दाँत साफ करना (दंतधावन) — आयुर्वेद में प्रतिदिन दंतधावन (दाँत माँजना) का विधान है। नीम, खदिर (कत्था), बबूल, अर्जुन, करंज आदि पेड़ों की टहनी को दातून के रूप में उपयोग करने का विस्तृत वर्णन है। नीम की दातून में आधुनिक विज्ञान ने 'निम्बिडोल' और 'निम्बिनिन' जैसे एंटीबैक्टीरियल तत्व खोजे हैं।
कृमिदंत (दंत क्षय / Dental Caries) — आयुर्वेद में इसे 'कृमिदंत' कहा — दाँतों में कीड़े। उपचार में तिल तेल के कुल्ले (oil pulling), लौंग का तेल, जायफल, और अन्य औषधियाँ। 'गण्डूष' (तेल से कुल्ला — आधुनिक oil pulling) की विधि आज भी वैज्ञानिक रूप से मान्य है।
शल्य क्रिया — सुश्रुत संहिता में दाँत निकालने की प्रक्रिया भी वर्णित है। दाँत की जड़ की सर्जरी का उल्लेख भी मिलता है। कृत्रिम दाँत लगाने (दंत प्रतिस्थापन) की विधि का भी संदर्भ मिलता है।
जीभ की सफाई — जिह्वानिर्लेखन (tongue scraping) — जिसे आज दुनिया भर में स्वास्थ्य लाभकारी माना जाता है।
मुख स्वास्थ्य के नियम — आयुर्वेद में मुखशुद्धि, जिह्वाशुद्धि, दंतशुद्धि तीनों को प्रातःकाल की दिनचर्या का अनिवार्य अंग माना गया।





