विस्तृत उत्तर
प्राचीन भारत का धातु विज्ञान विश्व में अपने समय का सबसे उन्नत था। इसके कई अकाट्य प्रमाण आज भी विद्यमान हैं।
दिल्ली का लौह स्तंभ — दिल्ली के क़ुतुब परिसर में स्थित यह स्तंभ लगभग 1,600 वर्ष पुराना है (गुप्तकाल, लगभग 375-415 ईस्वी)। यह 7.21 मीटर ऊँचा और लगभग 6 टन वज़न का है। इतने वर्षों में इस पर जंग (rust) नहीं लगी — यह आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी अद्भुत है। IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने पाया कि इसमें फॉस्फोरस की उच्च मात्रा और विशेष लोहा बनाने की विधि ने 'मिश्ाविट' (Misawite) नामक एक सुरक्षात्मक परत बनाई जो जंग से बचाती है।
वेदों में धातुओं का उल्लेख — ऋग्वेद में 'अयस्' (धातु), 'श्याम अयस्' (काला लोहा/लोह), 'लोहित अयस्' (ताँबा) का उल्लेख है। अथर्ववेद में सोना, चाँदी, ताँबा, टिन और सीसे का वर्णन है।
रसशास्त्र — 'रसशास्त्र' नामक भारतीय रसायन विज्ञान परंपरा में विभिन्न धातुओं को शुद्ध करने, उन्हें मिश्रित करने (alloy बनाने) और औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग करने की विधियाँ वर्णित हैं। वज्र (हीरा) काटने की तकनीक का भी उल्लेख मिलता है।
वज्र — कौटिल्य के अर्थशास्त्र में हीरे (वज्र) की पहचान, परीक्षण और व्यापार का विस्तृत वर्णन है। भारत विश्व में हीरे का पहला ज्ञात उत्पादक देश था।
टीका पद्धति (Wootz Steel) — भारत में विकसित 'वूट्ज़ इस्पात' (Wootz Steel) मध्यकाल में विश्व का सबसे उन्नत इस्पात था, जिसे अरब व्यापारी 'दमिश्क इस्पात' के नाम से पश्चिम ले गए।
सोने का शोधन — चरक और सुश्रुत में स्वर्ण भस्म (Gold Bhasma) बनाने की विधि है — नैनो-गोल्ड के आधुनिक अनुप्रयोगों से इसकी तुलना की जाती है।




