विस्तृत उत्तर
शून्य की अवधारणा भारत की सबसे महान और विश्व-बदलने वाली खोजों में से एक है। यह एक क्रमिक विकास था, किसी एक व्यक्ति की अचानक खोज नहीं।
वैदिक पृष्ठभूमि — वैदिक काल (1000 ईसा पूर्व तक) से ही भारतीय दर्शन में 'शून्य' और 'अनंत' की अवधारणाएँ प्रचलित थीं। 'शून्यता' का दार्शनिक विचार गणितीय शून्य की पृष्ठभूमि तैयार करने में सहायक रहा। यजुर्वेद में बड़ी-बड़ी संख्याओं (एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, न्यर्बुद...) का उल्लेख मिलता है — यह दशमलव स्थानमान पद्धति का प्रारंभिक रूप है।
बख्शाली पाण्डुलिपि — यह प्राचीन भारतीय गणित ग्रंथ है जिसमें शून्य के लिए एक बिंदु (.) का प्रयोग किया गया। यह आर्यभट्ट के काल से भी पुरानी मानी जाती है।
आर्यभट्ट (476 ईस्वी) — अपने ग्रंथ 'आर्यभटीय' में उन्होंने 'स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात्' — अर्थात प्रत्येक अगला स्थान पिछले से दस गुना होता है — यह सिद्धांत दिया। इससे सिद्ध होता है कि आर्यभट्ट के पूर्व भी शून्य का उपयोग होता था।
ब्रह्मगुप्त (598-668 ईस्वी) — उन्होंने 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में शून्य की पहली पूर्ण गणितीय परिभाषा दी: अ − अ = 0 (शून्य)। उन्होंने शून्य के जोड़, घटाव और गुणा के नियम भी स्थापित किए। शून्य को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में मान्यता देने का श्रेय ब्रह्मगुप्त को जाता है।
विश्व पर प्रभाव — 7वीं शताब्दी तक यह ज्ञान अरब जगत तक पहुँचा, फिर 12वीं शताब्दी में यूरोप तक। 'ज़ीरो' (Zero) शब्द अरबी 'सिफ्र' से आया है जो संस्कृत 'शून्य' का अनुवाद था। आधुनिक कंप्यूटर, बाइनरी सिस्टम और समस्त गणित — सब शून्य की इस खोज के ऋणी हैं।

