विस्तृत उत्तर
आचार्य चरक द्वारा रचित 'चरक संहिता' (लगभग 1500-400 ईसा पूर्व) में मधुमेह का विस्तृत वैज्ञानिक विवरण मिलता है। अथर्ववेद में भी इस रोग का उल्लेख है, जो इसे विश्व के सबसे प्राचीन दस्तावेजीकृत रोगों में से एक बनाता है।
चरक में मधुमेह का नामकरण — 'प्रमेह' अर्थात अधिक मूत्र आना। इसमें 20 प्रकार बताए गए हैं जो तीन दोषों (कफ, पित्त, वात) के आधार पर विभाजित हैं। 'मधुमेह' (मधु = शहद, मेह = मूत्र) — वह अवस्था जिसमें मूत्र में मिठास आ जाती है। प्राचीन वैद्य मूत्र पर चींटियाँ आते देखकर इसकी पहचान करते थे — यह ग्लूकोजुरिया का व्यावहारिक परीक्षण था।
दो प्रकार का वर्गीकरण — चरक और सुश्रुत दोनों ने मधुमेह के दो मूल प्रकार बताए जो आधुनिक टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के अत्यंत निकट हैं। बलवान और स्थूल व्यक्तियों का मधुमेह अलग है, और निर्बल व दुबले व्यक्तियों का अलग।
वंशानुगत प्रकृति — चरक संहिता में स्पष्ट लिखा है कि यह रोग 'बीज दोष' (माता-पिता के जनन कोशिकाओं के दोष) से भी होता है — आधुनिक जेनेटिक्स से मेल खाती यह अवधारणा अत्यंत उल्लेखनीय है।
कारण — अत्यधिक मीठा भोजन, तेलीय और गरिष्ठ आहार, शारीरिक निष्क्रियता, दिन में सोना, और आनुवांशिकता।
लक्षण — अधिक मूत्र, मीठा मूत्र, अत्यधिक प्यास, हाथ-पैर में जलन, आलस्य, मोटापा और मुँह में मिठास।
उपचार — व्यायाम और योग पर विशेष बल। कटु (कड़वे) और तिक्त (तीखे) स्वाद के आहार। करेला, मेथी, जामुन के बीज, आँवला, हल्दी, नीम, गुड़मार (Gymnema sylvestre) जैसी जड़ी-बूटियाँ। पंचकर्म शुद्धि चिकित्सा।
आश्चर्यजनक रूप से, आधुनिक विज्ञान ने इनमें से कई जड़ी-बूटियों में रक्तशर्करा नियंत्रण के गुण वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किए हैं।




