विस्तृत उत्तर
श्रीरामजी ने अत्यन्त विनीत, मृदु और शीतल वाणी से परशुरामजी से बात की। रामजी ने हाथ जोड़कर कहा — 'सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना' — हे नाथ! आप स्वभाव से ही सुजान हैं, बालक के वचनों पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
रामजी के कोमल और गूढ़ रहस्ययुक्त वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गये — 'सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के' — श्रीरघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी की बुद्धि के परदे खुल गये।
फिर रामजी ने परशुरामजी से लक्ष्मीपति (विष्णु) का धनुष हाथ में लिया और खींचा — तब परशुरामजी ने श्रीरामजी का प्रभाव जान लिया। उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। हाथ जोड़कर बोले — 'जय रघुबंस बनज बन भानू' — हे रघुकुलरूपी कमलवन के सूर्य! आपकी जय हो! उन्होंने रामजी को परब्रह्म पहचानकर प्रणाम किया।





