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श्री परशुराम स्तोत्र: वासुदेवानन्द सरस्वती कृत पाठ और विधि !
परशुराम

श्री परशुराम स्तोत्र: वासुदेवानन्द सरस्वती कृत पाठ

📿 पौराणिक•4 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 3 जनवरी 2026
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श्री परशुराम स्तोत्रम्: मूल संस्कृत पाठ, टेम्बे स्वामी (वासुदेवानन्द सरस्वती) रचना, उपासना विधि और फलश्रुति ! श्री परशुराम स्तोत्रम्: मूल पाठ, उद्गम, उपासना विधि और फलश्रुति श्री परशुराम स्तोत्रम् 1. श्री परशुराम स्तोत्रम् (मूल संस्कृत पाठ) ॥ श्रीपरशुरामस्तोत्रम् ॥ (रचयिता: श्री वासुदेवानन्द सरस्वती) कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम् । जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम् ॥...

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श्री परशुराम स्तोत्रम्: मूल पाठ, उद्गम, उपासना विधि और फलश्रुति

श्री परशुराम स्तोत्रम्

1. श्री परशुराम स्तोत्रम् (मूल संस्कृत पाठ)

॥ श्रीपरशुरामस्तोत्रम् ॥ (रचयिता: श्री वासुदेवानन्द सरस्वती)

कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम् ।
जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम् ॥
नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनन्दनम् ।
मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम् ॥
भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम् ।
गतगर्वप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम् ॥
वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम् ।
तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम् ॥
परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः ।
रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम् ॥
शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामण्डितं रणपण्डितम् ।
रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररञ्जनम् ॥
मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनम् ।
य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत् ॥

॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीपरशुरामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

2. स्तोत्र का उद्गम और ऐतिहासिक परंपरा

2.1 रचयिता: श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेम्बे स्वामी) यह स्तोत्र श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (1854-1914), जिन्हें 'टेम्बे स्वामी' महाराज के नाम से जाना जाता है, द्वारा विरचित है।
संप्रदाय: टेम्बे स्वामी 'दत्त संप्रदाय' के एक महान संत और परमहंस परिव्राजक थे। उन्होंने लुप्तप्राय तीर्थों और स्तोत्रों का पुनरुद्धार किया।
रचना का संदर्भ: टेम्बे स्वामी जी का जीवन पैदल परिक्रमा और तपस्या में व्यतीत हुआ। उन्होंने परशुराम जी को भगवान दत्तात्रेय का अनन्य शिष्य और 'श्रीविद्या' का आचार्य माना। अतः उन्होंने जन-सामान्य के कल्याण हेतु इस स्तोत्र की रचना की, जिसमें वैदिक और पौराणिक तत्वों का समावेश है।
2.1 भार्गव परंपरा यह स्तोत्र 'भार्गव' (भृगु ऋषि के वंशज) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। भृगु वंश अपने 'तेज' और 'कोपन स्वभाव' (शीघ्र क्रोध) के लिए जाना जाता था, किन्तु यह क्रोध सदैव धर्म-स्थापना के लिए होता था। यह परंपरा वेदों के ज्ञान और शस्त्रों के प्रयोग का अद्वितीय मिश्रण है, जिसे 'ब्रह्म-क्षत्र' योग कहा जाता है।

3. उपासना विधि और श्रद्धा-भक्ति का स्वरूप

3.1 पाठ के लिए मानसिक तैयारी (भाव) परशुराम जी की उपासना में 'वीर भाव' और 'समर्पण' का होना आवश्यक है। भक्त को यह भावना रखनी चाहिए कि:
भगवान परशुराम मेरे भीतर के 'शत्रुओं' (काम, क्रोध, मद, लोभ) का अपने परशु से छेदन करें।
वे मेरे कुल और परिवार की रक्षा उसी प्रकार करें जैसे उन्होंने अपनी माता रेणुका की रक्षा की थी।
श्रद्धा का स्वरूप 'भय' नहीं, अपितु 'अभय' प्राप्ति का होना चाहिए।
3.2 अनुष्ठान और पाठ विधि नीचे दी गई सारणी में पाठ करने की विधि को चरणबद्ध तरीके से समझाया गया है:
चरण विवरण
1. समय अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया - उनका जन्मदिन) सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा, मंगलवार (मंगल ग्रह का दिन) या किसी भी शुक्ल पक्ष की अष्टमी/नवमी को पाठ किया जा सकता है। प्रातः काल या गोधूलि बेला उपयुक्त है।
2. शुद्धि स्नानादि से निवृत्त होकर, श्वेत या लाल वस्त्र धारण करें। लाल रंग शौर्य का प्रतीक है और श्वेत रंग सात्विकता का।
3. आसन और दिशा पूर्व (ज्ञान हेतु) या उत्तर (सिद्धि हेतु) दिशा की ओर मुख करके ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें।
4. विग्रह/चित्र भगवान परशुराम का चित्र (जिसमें वे फरसा और धनुष लिए हों) स्थापित करें। यदि उपलब्ध न हो, तो भगवान विष्णु या शालिग्राम की पूजा करें।
5. संकल्प हाथ में जल लेकर संकल्प करें: "मम सकल पाप क्षयार्थं, शत्रु-बाधा निवारणार्थं, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष सिद्ध्यर्थं श्री परशुराम स्तोत्र पाठं करिष्ये।"
6. मंत्र जाप (पूर्व-पाठ) स्तोत्र शुरू करने से पहले परशुराम गायत्री मंत्र का 11 या 108 बार जाप करने से स्तोत्र का प्रभाव बढ़ जाता है:

"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि । तन्नो परशुरामः प्रचोदयात ॥"
7. स्तोत्र पाठ ऊपर दिए गए ७ श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें। पाठ करते समय भगवान के 'तेजस्वी' रूप का ध्यान करें।
8. आरती/नैवेद्य अंत में कपूर से आरती करें और गुड़, नारियल या फलों का भोग लगाएं।
3.3 स्तोत्र पाठ के लाभ (फलश्रुति) श्रद्धापूर्वक पाठ करने से निम्नलिखित फलों की प्राप्ति मानी गई है:
शत्रु नाश: बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ आंतरिक विकार नष्ट होते हैं।
भय मुक्ति: अकारण भय, राज-भय (सरकारी बाधाएं), और कानूनी विवादों में विजय।
भूमि लाभ: चूंकि वे 'भूमि' के उद्धारक हैं, अतः भूमि विवाद या संपत्ति प्राप्ति हेतु उनकी उपासना अचूक मानी जाती है।
ज्ञान और विद्या: वे गुरु हैं, अतः छात्रों को कुशाग्र बुद्धि (रणपण्डित) प्राप्त होती है।

4. निष्कर्ष

श्री वासुदेवानन्द सरस्वती द्वारा विरचित श्री परशुराम स्तोत्रम् केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु 'भार्गव शक्ति' का मंत्रात्मक स्वरूप है। इसका उद्गम प्राचीन अग्नि पुराण और भागवत की कथाओं में है, और इसकी परंपरा दत्त संप्रदाय और श्रीविद्या साधना से जुड़ी है। भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे इस स्तोत्र का पाठ केवल कामना-पूर्ति के लिए न करें, बल्कि अपने भीतर 'ब्रह्म-तेज' (ज्ञान) और 'क्षत्र-वीर्य' (पौरुष) को जागृत करने के लिए करें। भगवान परशुराम का फरसा हमारे अज्ञान को काटे और उनका धनुष हमें अपने जीवन-लक्ष्य पर केंद्रित करे—यही इस स्तोत्र के पाठ की सच्ची श्रद्धा और सार्थकता है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

अस्त्र शस्त्र

परशुराम के पास कौन-कौन से अस्त्र थे?

परशुराम के पास परशु (फरसा), शार्ङ्ग धनुष (विष्णु का), विजय धनुष (इंद्र से), ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र और अनेक दिव्यास्त्र थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण को अस्त्र-शिक्षा दी।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

परशुरामजी ने अपना वैष्णव धनुष किसे दिया?

श्रीरामजी को — 'राम रमापति कर धनु लेहू। खेंचहु मिटै मोर संदेहू।' धनुष देने लगे तो वह स्वयं रामजी के पास चला गया — इससे परशुरामजी को निश्चय हुआ कि ये साक्षात् विष्णु हैं।

दिव्यास्त्र

परशुराम ने सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त किया

सुदर्शन चक्र शिव → विष्णु → पार्वती → अग्नि → वरुण की परंपरा से परशुराम को मिला। परशुराम भगवान विष्णु के अवतार हैं इसलिए यह चक्र उनके पास धरोहर के रूप में था।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

परशुरामजी ने धनुष तोड़ने पर क्या कहा?

क्रोधित होकर पूछा — किसने शिवजी का धनुष तोड़ा? चेतावनी दी — जिसने तोड़ा उसे दण्ड मिलेगा। फरसा हाथ में लिये सभा में आये — सब डर गये। कहा — यह शिवजी का अपमान है।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

परशुरामजी के जाने के बाद क्या हुआ?

जनक ने अयोध्या में दशरथ के पास दूत भेजे — धनुष भंग, जयमाला हुई, बारात लाइये। दशरथ को अपार आनन्द। वसिष्ठजी ने कहा — बारात सजाओ। रानियाँ हर्ष से भरीं।

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