संकटमोचन हनुमानाष्टक — पाठ, संदर्भ, इतिहास और उपासना पद्धति का विस्तृत विश्लेषणात्मक अध्ययन
1. श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक: मूल पाठ
शोध के प्राथमिक स्रोत के रूप में, यहाँ गोस्वामी तुलसीदास कृत 'संकटमोचन हनुमानाष्टक' का पूर्ण और शुद्ध पाठ प्रस्तुत है। यह रचना 'मत्तगयन्द सवैया' छंद में लिखी गई है, जो अपनी लयात्मकता और वीर रस के लिए प्रसिद्ध है। अवधी भाषा की मिठास और ओज इसमें पूर्ण रूप से विद्यमान है।
॥ श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक ॥
(मत्तगयन्द छन्द)
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ॥ देवन आनि करी बिनती तब, छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो ॥ कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ॥ हेरी थके तट सिन्धु सबे तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाए महा रजनीचर मारो ॥ चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सूत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो ॥ आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग की फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ॥ आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो ॥ जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो ॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥
(दोहा)
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर ।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥
2. रचयिता एवं ऐतिहासिक संदर्भ
संकटमोचन हनुमानाष्टक की रचना का श्रेय निर्विवाद रूप से गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623 ई.) को जाता है। तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। यद्यपि उनकी कीर्ति का आधारस्तंभ 'रामचरितमानस' है, तथापि हनुमानाष्टक उनकी व्यक्तिगत पीड़ा और हनुमान जी के प्रति उनकी अनन्य निर्भरता (दास्य भाव) का प्रतीक है।
3. उपासना पद्धति एवं अनुष्ठान विधान
3.1. सामान्य पाठ विधि
- समय: प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन का समय।
- दिन: मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के विशेष दिन माने जाते हैं।
- दिशा: पूर्व (ज्ञान/शांति के लिए) या उत्तर (समृद्धि के लिए) मुख करके बैठें।
- आसन: लाल रंग का ऊनी आसन या कुशा का आसन सर्वश्रेष्ठ है।
- चित्र/मूर्ति: हनुमान जी का चित्र जिसमें वे पर्वत उठाए हों या राम दरबार के चरणों में बैठे हों, सामने रखें।
- क्रम: सर्वप्रथम 'श्री राम' का जयघोष करें। फिर हनुमान चालीसा का पाठ करें, उसके बाद हनुमानाष्टक का पाठ करें। अंत में पुनः राम नाम का संकीर्तन करें।
3.2. विशेष अनुष्ठान: 11 दिवसीय संकल्प
जब कोई विशेष संकट हो (जैसे बीमारी, कोर्ट केस, या नौकरी की समस्या), तो 11 दिनों का अनुष्ठान करने का विधान है। हनुमान जी को 11वां रुद्र माना जाता है, इसलिए 11 की संख्या का विशेष महत्व है।
सारणी 1: 11 दिवसीय अनुष्ठान की रूपरेखा
| चरण | विवरण |
|---|---|
| प्रारंभ | शुक्ल पक्ष के मंगलवार से प्रारंभ करें। |
| सामग्री | लाल फूल (गुड़हल/गुलाब), सिंदूर, चमेली का तेल, शुद्ध घी का दीपक, गुड़-चना। |
| संकल्प | दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम, गोत्र, स्थान और अपनी मनोकामना (संकट) बोलें और जल भूमि पर छोड़ दें। |
| जाप संख्या | प्रतिदिन 11 बार हनुमानाष्टक का पाठ करें। (कुछ पद्धतियों में 7 या 100 बार का भी विधान है, पर 11 सर्वमान्य है)। |
| नियम | 11 दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन (लहसुन-प्याज वर्जित), और भूमि शयन (यदि संभव हो)। |
| उद्यापन | 12वें दिन हवन करें या गरीबों/वानरों को भोजन कराएं। |
3.3. ज्योतिषीय महत्व और गृह निवारण
शोध से ज्ञात होता है कि हनुमानाष्टक शनि और मंगल ग्रह की शांति का अचूक उपाय है।
- शनि पीड़ा: मान्यता है कि हनुमान जी ने शनिदेव को रावण की कैद से छुड़ाया था, जिस पर शनिदेव ने वचन दिया था कि वे हनुमान भक्तों को नहीं सताएंगे। 'साढ़े साती' या 'ढैया' के प्रभाव को कम करने के लिए शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर 8 बार इस अष्टक का पाठ करना चाहिए।
- मंगल दोष: मांगलिक दोष या रक्त विकार होने पर मंगलवार को लाल चंदन या सिंदूर अर्पण कर इसका पाठ करने से लाभ होता है।
7. निष्कर्ष
गोस्वामी तुलसीदास कृत 'संकटमोचन हनुमानाष्टक' भारतीय अध्यात्म का एक ऐसा रत्न है जो इतिहास, पौराणिक कथा और व्यक्तिगत भक्ति को एक सूत्र में पिरोता है। यह रचना सिद्ध करती है कि हनुमान जी केवल रामायण के एक पात्र नहीं, बल्कि हर युग के हर भक्त के लिए एक जीवंत रक्षक हैं।
जहाँ 'हनुमान चालीसा' हनुमान जी के व्यक्तित्व का परिचय है, वहीं 'हनुमानाष्टक' उनकी कार्यक्षमता का प्रमाण है। 16वीं शताब्दी में मुगलकालीन भारत की अस्थिरता और व्यक्तिगत पीड़ाओं के बीच रचा गया यह अष्टक आज 21वीं सदी के तनावपूर्ण जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है। चाहे वह बाललीला में सूर्य को निगलना हो (असंभव को संभव करना) या लक्ष्मण के प्राण बचाना हो (जीवन रक्षा), इस अष्टक का हर पद भक्त को यह आश्वासन देता है कि संसार में ऐसा कोई भी संकट नहीं है जो 'संकटमोचन' की दृष्टि मात्र से दूर न हो सके।
अतः, श्रद्धा, पवित्रता और सही विधि से किया गया इसका पाठ न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि लौकिक समस्याओं के समाधान में भी एक सशक्त माध्यम सिद्ध होता है।






