विस्तृत उत्तर
जैसे पारस पत्थर लोहे को छूकर सोना बना देता है, वैसे सत्संग अज्ञानी को ज्ञानी बनाता है। 'बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई' — सत्संग बिना विवेक नहीं, सत्संग रामकृपा से मिलता है। सत्संग = पारस, अज्ञानी = लोहा, ज्ञान/भक्ति = सोना।