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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

तुलसीदासजी ने सत्संग की तुलना पारस पत्थर से क्यों की?

संक्षिप्त उत्तर

पारस लोहे को सोना बनाता — वैसे सत्संग अज्ञानी को ज्ञानी। 'बिनु सतसंग बिबेक न होई' — सत्संग बिना विवेक नहीं।

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विस्तृत उत्तर

जैसे पारस पत्थर लोहे को छूकर सोना बना देता है, वैसे सत्संग अज्ञानी को ज्ञानी बनाता है। 'बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई' — सत्संग बिना विवेक नहीं, सत्संग रामकृपा से मिलता है। सत्संग = पारस, अज्ञानी = लोहा, ज्ञान/भक्ति = सोना।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

तुलसीदासजी ने सत्संग की तुलना पारस पत्थर से क्यों की को संदर्भ सहित समझें

तुलसीदासजी ने सत्संग की तुलना पारस पत्थर से क्यों की का सबसे सीधा सार यह है: पारस लोहे को सोना बनाता — वैसे सत्संग अज्ञानी को ज्ञानी। 'बिनु सतसंग बिबेक न होई' — सत्संग बिना विवेक नहीं।

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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