विस्तृत उत्तर
## ब्रह्म का स्वरूप
ब्रह्म (ब्रह्मन्) हिंदू (वेदांत और उपनिषद) दर्शन में इस सारे विश्व का परम सत्य और जगत का सार है।
### तैत्तिरीय उपनिषद (2/1) की परिभाषा
> 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'
> — ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है और अनंत है।
### ब्रह्म के मूल स्वरूप
| नाम | अर्थ |
|-----|------|
| सत् | नित्य सत्ता — जो सदा विद्यमान है |
| चित् | शुद्ध चेतना — जो स्वयं प्रकाशमान है |
| आनंद | परम आनंद स्वरूप — दुःखरहित |
इसीलिए ब्रह्म को 'सच्चिदानंद' कहा जाता है।
### ब्रह्म का दोहरा स्वरूप
| निर्गुण ब्रह्म | सगुण ब्रह्म |
|--------------|-------------|
| निराकार, गुणातीत | साकार, गुण सहित |
| परब्रह्म, परम तत्व | ईश्वर, भगवान के रूप में |
### वेदांत के चार महावाक्य (ब्रह्म विषयक)
- 1'तत्त्वमसि' (छांदोग्य) — तू वही (ब्रह्म) है
- 2'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक 1/4/10) — मैं ब्रह्म हूँ
- 3'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य) — यह आत्मा ब्रह्म है
- 4'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐतरेय) — ब्रह्म शुद्ध चेतना है
### अद्वैत वेदांत में ब्रह्म
शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में:
> 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः'
> — ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है।
### ब्रह्म और सृष्टि का संबंध
> 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते...' (तैत्तिरीय)
> — जिससे यह सब जीव उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीते हैं और जिसमें विलीन होते हैं — वह ब्रह्म है।
नोट: ब्रह्म (निर्गुण), परमात्मा (सगुण सर्वव्यापी) और भगवान (साकार लीलामय) — ये तीनों एक ही परम तत्व के तीन स्तर हैं, ऐसा वेदांत मानता है।





