विस्तृत उत्तर
## आत्मा का स्वरूप
आत्मा (आत्मन्) सनातन दर्शन की सबसे मूलभूत अवधारणा है। यह प्रत्येक जीव में विद्यमान वह शाश्वत चेतन तत्व है जो कभी नष्ट नहीं होती।
### भगवद्गीता में आत्मा (2/17-24)
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा का बोध कराते हुए कहा:
> 'अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्' (2/17)
> — जिससे यह सारा संसार व्याप्त है उसे अविनाशी जानो।
> 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्' (2/20)
> — आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
### आत्मा के आठ लक्षण (गीता अनुसार)
| लक्षण | अर्थ |
|-------|------|
| नित्य | सदा विद्यमान |
| अजन्मा | जन्म रहित |
| शाश्वत | सनातन |
| पुरातन | अनादि |
| अविनाशी | कभी नष्ट न होने वाली |
| अच्छेद्य | शस्त्रों से न कटने वाली |
| अदाह्य | अग्नि से न जलने वाली |
| अक्लेद्य | जल से न भीगने वाली |
> 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
> न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥' (गीता 2/23)
### वेदांत के तीन दृष्टिकोण
| मत | आत्मा और ब्रह्म का संबंध |
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| अद्वैत (शंकर) | आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं — 'अहं ब्रह्मास्मि' |
| विशिष्टाद्वैत (रामानुज) | आत्मा ब्रह्म का अंश है — भेद-अभेद |
| द्वैत (मध्व) | आत्मा और परमात्मा सदा भिन्न हैं |
### कठोपनिषद में आत्मा
> 'अणोरणीयान् महतो महीयान्'
> — आत्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है।
### आत्मा और देह का संबंध
> 'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय...' (गीता 2/22)
> — जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करती है।





