विस्तृत उत्तर
लिंग पुराण और शिव पुराण के अनुसार, पूर्व काल में एक बार भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी जी के साथ शेष शय्या पर शयन कर रहे थे। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ पहुँचे और स्वयं को जगत का रक्षक और पितामह बताते हुए विष्णु जी को अपना पुत्र कहकर संबोधित करने लगे। विष्णु जी ने भी स्वयं को संपूर्ण जगत का आश्रय और प्रजापति बताया। इस बात पर दोनों देवों के मध्य यह विवाद उत्पन्न हो गया कि दोनों में से श्रेष्ठ और जगत का आदि कारण कौन है। यह विवाद इतना उग्र हो गया कि वे एक-दूसरे पर प्रहार करने को उद्यत हो गए।
इस प्रलयंकारी युद्ध को शांत करने और उनके अहंकार का शमन करने के लिए, उन दोनों के मध्य अचानक एक अत्यंत ऊँचा, प्रखर सूर्य के समान जाज्वल्यमान और विशुद्ध स्फटिक के तुल्य अग्नि का एक विशाल स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हो गया। इस स्तंभ का न कोई आदि था और न कोई अंत।
आश्चर्यचकित होकर ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया और उस अग्नि स्तंभ का ऊपरी छोर खोजने के लिए सहस्रों वर्षों तक ऊपर की ओर उड़ते रहे। दूसरी ओर, भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) का रूप धारण किया और उस स्तंभ का मूल (आधार) खोजने के लिए पाताल की ओर अनंत गहराई तक जाते रहे। दोनों ही उस अनंत ज्योतिर्लिंग का ओर-छोर खोजने में पूर्णतः विफल रहे।
तभी उस अनंत ज्योतिर्लिंग से 'ॐ' की परम पवित्र ध्वनि प्रकट हुई। इसके पश्चात् भगवान शिव उमा (पार्वती) सहित वहां प्रसन्न मुद्रा में प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों को ज्ञान दिया कि वे दोनों (ब्रह्मा और विष्णु) शिव के ही सगुण रूप हैं।
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