विस्तृत उत्तर
भवानीपति भगवान शिव का एक नाम है, जिसका अर्थ है भवानी यानी पार्वती के पति। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि जो मनुष्य महालय की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपतिरीश्वरः यानी भवानीपति ईश्वर अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
भवानीपति शब्द का व्युत्पत्तिगत विश्लेषण इस प्रकार है। भवानी का अर्थ है देवी पार्वती। भव का अर्थ है जगत् का स्वामी यानी शिव, और आनी उनकी शक्ति को इंगित करती है। इसलिए भवानी का अर्थ है भव यानी शिव की शक्ति। पति का अर्थ है स्वामी, पति। भवानीपति यानी भवानी यानी पार्वती के पति यानी भगवान शिव।
भवानीपति नाम की महिमा विशेष है। यह नाम भगवान शिव के गृहस्थ स्वरूप को दर्शाता है। शिव केवल संन्यासी, योगी और ध्यानमग्न नहीं हैं, बल्कि वे गृहस्थ भी हैं। भवानी यानी पार्वती उनकी पत्नी हैं, और इस नाम से शिव के पारिवारिक स्वरूप की महिमा होती है।
भवानी यानी पार्वती का परिचय देखें। पार्वती पर्वत-राज हिमालय की पुत्री हैं। वे आदि-शक्ति का अवतार हैं। उनके अनेक नाम हैं - पार्वती, गौरी, दुर्गा, काली, सती आदि। भवानी उनका एक विशेष नाम है, जो उनकी सर्व-शक्तिमान स्वरूप को दर्शाता है।
भवानीपति नाम से शिव की प्रसन्नता का विशेष अर्थ है। जब स्कन्द पुराण में कहा गया है कि द्वितीया श्राद्ध से भगवान भवानीपति प्रसन्न होते हैं, तो इसका अर्थ है कि शिव न केवल व्यक्तिगत रूप से, बल्कि पार्वती के साथ मिलकर प्रसन्न होते हैं। शिव और शक्ति दोनों की कृपा मिलती है।
भवानीपति नाम के अन्य संदर्भ भी विशेष हैं। स्तोत्रों और पूजाओं में भगवान शिव को भवानीपति के रूप में सम्बोधित किया जाता है। यह नाम शिव की करुणा और गृहस्थ प्रेम को दर्शाता है। गृहस्थों के लिए भवानीपति विशेष आराध्य देव हैं।
द्वितीया श्राद्ध और भवानीपति का सम्बन्ध विशेष है। द्वितीया तिथि पर यमराज का आधिपत्य रहता है। यमराज शिव के अधीन हैं, क्योंकि शिव महाकाल हैं यानी समय और मृत्यु के परम देवता। जब कर्ता द्वितीया पर श्राद्ध करके यमराज को प्रसन्न करता है, तो शिव यानी भवानीपति भी प्रसन्न होते हैं।
भवानीपतिरीश्वरः शब्द का विश्लेषण और गहरा है। ईश्वरः का अर्थ है परम ईश्वर, सर्वशक्तिमान। भवानीपतिरीश्वरः यानी भवानी के पति जो सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। यह नाम शिव की दो भूमिकाएँ एक साथ बताता है - गृहस्थ पति और परम ईश्वर।
भवानीपति की प्रसन्नता के फल तीन हैं। पहला फल है कैलास धाम की प्राप्ति। स कैलासमवाप्नोति यानी वह कैलास प्राप्त करता है। दूसरा फल है शिव गणों के साथ आनन्द। शिवेन सह मोदते यानी शिव के साथ आनन्द पाता है। तीसरा फल है विपुल सम्पदा। विपुलां सम्पदं तस्मै प्रीतो दद्यान्महेश्वरः यानी प्रसन्न होकर शिव विपुल सम्पदा देते हैं।
इस नाम का भक्ति-सम्बन्धी महत्व भी विशेष है। भवानीपति नाम से शिव की उपासना करने वाले को गृहस्थ जीवन में शिव का आशीर्वाद मिलता है। विवाह, सन्तान, परिवार - सब के लिए भवानीपति की कृपा आवश्यक है।
भवानीपति नाम और शैव पुराण का सम्बन्ध भी विशेष है। स्कन्द पुराण शैव पुराण है, और इसमें शिव के अनेक नामों की महिमा है। भवानीपति उन्हीं नामों में से एक है, जो विशेष रूप से पितृ-कर्म और श्राद्ध के सन्दर्भ में आया है।
द्वितीया श्राद्ध में भवानीपति की प्रसन्नता का व्यावहारिक अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने पितरों के प्रति श्रद्धावान है, और उनके लिए नियमित श्राद्ध करता है, वह स्वयं शिव का प्रिय होता है। शिव अपने भक्तों को कैलास का मार्ग दिखाते हैं।
भवानीपति की महिमा का सर्वोच्च संदेश यह है कि श्राद्ध केवल पितरों के लिए नहीं, बल्कि शिव की प्रसन्नता का भी साधन है। द्वितीया श्राद्ध जब भक्ति से किया जाता है, तो वह एक शैव उपासना का रूप भी ले लेता है, और शिव प्रसन्न होकर अपना परम धाम कैलास प्रदान करते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः भवानीपति भगवान शिव का एक नाम है, जिसका अर्थ है भवानी यानी पार्वती के पति। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध करने से भवानीपति यानी भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और श्राद्धकर्ता को कैलास धाम तथा विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं।
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