विस्तृत उत्तर
रौरव और कालसूत्र दो भयंकर नरक हैं, जिनमें द्वितीया श्राद्ध न करने वाले को यातना भोगनी पड़ती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि जो मनुष्य द्वितीया तिथि को अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, मृत्यु के पश्चात् उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
रौरव नरक का वर्णन पुराणों में इस प्रकार है। रौरव शब्द रु से बना है, जिसका अर्थ है चीखना या पुकारना। रौरव यानी वह स्थान जहाँ पापी अत्यंत पीड़ा से चीखते हैं। इस नरक में रौरव नामक सर्प होते हैं, जो पापियों को काटते हैं। यह यातना अत्यंत दीर्घकालीन होती है।
रौरव नरक की यातनाएँ इस प्रकार हैं। पहली यातना है रौरव सर्पों का काटना। ये विशेष सर्प होते हैं, जिनका विष अत्यंत पीड़ादायक होता है। दूसरी यातना है अग्नि की जलन। रौरव में आग भी होती है, जो पापी को जलाती है। तीसरी यातना है यमदूतों का प्रहार। यमदूत अत्यंत रौद्र रूप वाले होते हैं, और वे पापी को यातना देते हैं।
कालसूत्र नरक का वर्णन भी पुराणों में विस्तार से है। काल का अर्थ है मृत्यु या समय। सूत्र का अर्थ है धागा या बंधन। कालसूत्र यानी मृत्यु के बंधनों से जकड़ने वाला नरक। इस नरक में पापी को काल के अदृश्य धागों से बाँधकर यातना दी जाती है।
कालसूत्र की यातनाएँ भी अत्यंत कठोर हैं। पहली यातना है काल-धागों से बंधना। इन धागों से छूटना असम्भव है। दूसरी यातना है अत्यंत गर्मी और सर्दी। कालसूत्र में कभी अत्यधिक गर्मी और कभी अत्यधिक सर्दी होती है। तीसरी यातना है भूख और प्यास। पापी को खाने-पीने का कोई साधन नहीं मिलता।
इन नरकों में जाने का कारण अत्यंत गंभीर है। जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होता है, विशेषकर पितृ-कर्म से, वह इन नरकों की यातना भोगता है। द्वितीया श्राद्ध न करना केवल एक सामान्य भूल नहीं, बल्कि एक गंभीर पाप है।
इन दोनों नरकों का क्रमिक अर्थ देखें। रौरव और कालसूत्र दोनों एक साथ उल्लिखित हैं। इसका अर्थ यह हो सकता है कि पहले रौरव की यातना, फिर कालसूत्र की यातना। या यह हो सकता है कि दोनों नरकों में बारी-बारी से यातना दी जाए।
पुराणों में नरकों की विस्तृत सूची है। गरुड़ पुराण में 28 नरकों का वर्णन है। रौरव और कालसूत्र उनमें से प्रमुख हैं। इनके अलावा महारौरव, कुम्भीपाक, असिपत्रवन, और अन्य नरक भी हैं। रौरव और कालसूत्र की विशेषता यह है कि ये गंभीर पापों के लिए हैं।
इन नरकों से मुक्ति का उपाय भी शास्त्रों में है। यदि कोई व्यक्ति अनजाने में या विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध नहीं कर पाया, तो वह प्रायश्चित कर सकता है। विशेष श्राद्ध, नारायण-बलि, या गया में श्राद्ध से पितृ दोष और इस प्रकार के दोषों का निवारण होता है।
इन नरकों की यातना की अवधि भी विशेष है। यह अनिश्चितकालीन नहीं है। जब तक पाप का भोग नहीं हो जाता, तब तक यातना मिलती है। फिर जीवात्मा पुनः जन्म लेती है।
द्वितीया श्राद्ध का करना और न करना दो विपरीत मार्ग हैं। करने वाले को कैलास धाम, शिव-गण-साहचर्य, और विपुल सम्पदा मिलती है। न करने वाले को ब्रह्म-वर्चस्व का नाश, रौरव नरक, और कालसूत्र नरक मिलते हैं। यह दोनों मार्ग सिद्ध करते हैं कि द्वितीया श्राद्ध की अनिवार्यता अकाट्य है।
इस वर्णन का व्यावहारिक संदेश यह है कि जिनके पितरों की मृत्यु द्वितीया को हुई है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। नियमित रूप से द्वितीया पर श्राद्ध करना उनका अनिवार्य कर्तव्य है। इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही अत्यंत कठोर दण्ड दिलाती है।
यह दण्ड-विधान सनातन धर्म की न्याय-व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रत्येक कर्म का फल निश्चित है। पुण्य-कर्म का फल कैलास और सम्पदा है। पाप-कर्म यानी कर्तव्य से विमुखता का फल नरक की यातना है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द महापुराण नागर खण्ड अध्याय 230 इस सिद्धांत का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है। निष्कर्षतः रौरव और कालसूत्र दो भयंकर नरक हैं। रौरव में रौरव सर्पों की यातना होती है, और कालसूत्र में काल के धागों से बाँधकर यातना दी जाती है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया श्राद्ध नहीं करता, उसे मृत्यु के बाद इन दोनों भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
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